अन्ना हजारे का वो आंदोलन जिसने भारतीय राजनीति को बदल कर रख दिया।

5 अप्रैल 2011 को दिल्ली के जंतर-मंतर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आवाज बुलंद हुई। इसके बाद जब इस आवाज की गूंज जंतर-मंतर से समूचे भारत में फैली। तब समूचा भारत इस आवाज के केंद्र में स्थित उस आदमी के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो गया जिसे जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़ अन्ना-अन्ना कह रही थी।

भ्रष्टाचार की आग में जलते देश को लेकर उसके नागरिकों के मन में रोष पल रहा था। लोगों के इसी गुस्से को आवाज देने का काम किया जंतर-मंतर पर बैठे 74 वर्षीय छोटे कद के आदमी किसन बाबूराव हजारे उर्फ अन्ना हजारे ने। ‘जन लोकपाल बिल’ को भ्रष्टाचार के खिलाफ ब्रह्मास्त्र बताकर दिल्ली सहित समस्त भारत में चंद दिनों में ही अपने आंदोलन के पक्ष में जनसैलाब इकठ्ठा कर लिया।

5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर पर शुरू हुए अन्ना हजारे के भूख हड़ताल ने देश की सोई हुई चेतना को ऐसा जगाया कि लोग ‘मैं भी अन्ना तू भी अन्ना अब तो सारा देश है अन्ना’ और अन्ना नही ये आंधी है देश का दूसरा गांधी है’ जैसे नारे लगाकर भ्रष्टाचार की जंग को आजादी की दूसरी लड़ाई बतलाकर सड़कों पर उतर आए। शुरू में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने अन्ना के अनशन को नजरअंदाज करना चाहा, लेकिन आंदोलन को लेकर जनता का अंदाज देख सरकार सकते में आ गई। उसने स्थिति को बिगड़ते देख अन्ना हजारे से संवाद स्थापित करने की शुरुआत की।

अन्ना हजारेइस आंदोलन को मिले जनता के अपार समर्थन का ही नतीजा रहा कि अनशन के महज पांच दिन बाद ही सरकार ने सुबह-सुबह जनलोकपाल बिल के लिए संयुक्त समिति बनाने का नोटिफिकेशन जारी कर दिया। इस संयुक्त समिति में सरकार के नुमाइंदे और अन्ना आंदोलन से जुड़े अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरण बेदी, योगेंद्र यादव जैसे शख्स शामिल थे। सरकार के इस फैसले ने जनता को इस बात का एहसास दिलाया कि अगर लोग एकजुट हो जाए तो सरकार से अपनी बात मनवाई जा सकती है। साथ ही इस फैसले ने एक झटके में अन्ना हजारे को देश का हीरो बना दिया।

इसके बाद ऐसा लगा कि अब जनलोकपाल बड़े आसानी से पास हो जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 6 जून 2011 को जब बाबा रामदेव कालाधन के खिलाफ अनशन पर बैठे तब उनके ऊपर हुई पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में टीम अन्ना ने संयुक्त कमेटी का बहिष्कार कर दिया। नतीजतन जनलोकपाल बिल पर बिना किसी सहमति के ही संयुक्त समिति खत्म हो गई। यहां से एक बार फिर अन्ना हजारे और सरकार के बीच अनबन शुरू हो गई। इसके बाद अन्ना हजारे ने सरकार को चेताते हुए कहा कि अगर मानसून सत्र में जनलोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो फिर वह दोबारा अनशन पर बैठेंगे।
अन्ना हजारे
हुआ भी कुछ ऐसा ही। सरकार मानसून सत्र में जनलोकपाल बिल नहीं पास करा पायी और नतीजतन अन्ना को दोबारा आंदोलन के लिए सड़क पर उतरना पड़ा। लेकिन विनाश काले विपरीत बुद्धि के चलते सरकार ने अन्ना हजारे को ‘शांति भंग’ करने के नाम पर गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में बंद कर दिया। अन्ना हजारे जैसे समाजसेवी को कुख्यात अपराधियों के लिए मशहूर तिहाड़ जेल में रखने की घटना ने लोगों के दिलों में सरकार के प्रति भरी विरोध की भावना को विद्रोह में बदल दिया। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली की सड़कों पर लोगों का जनसमुद्र नजर आने लगा।
19 अगस्त को जब अन्ना हजारे अपनी शर्तों पर तिहाड़ से बाहर आकर राजघट के लिए निकले तब बारिश में भींगते और भारत माता की जय के नारों के शोर में झूमते लोगों के जनसैलाब को देखकर सभी के दिमाग में ‘अगस्त क्रांति’ का इतिहास कौंधने लगा। इस बार सरकार के लिए मुश्किलें तिगुनी हो गई थी। पहला तो अन्ना हजारे का कद बहुत ज्यादा बढ़ गया था, दूसरा जंतर-मंतर की तुलना में रामलीला मैदान पर उमड़ी भीड़ के गुण अधिक थी और तीसरी परेशानी यह कि इस बार लोगों की नजर में सरकार की विश्वसनीयता एकदम खत्म हो चुकी थी।
अन्ना हजारे
इन तीनों के अलावा चौथा और सबसे बड़ा सिरदर्द अन्ना हजारे का भूख हड़ताल। जो हर बीतते दिन के साथ जनता में सरकार के खिलाफ गुस्से और जनलोकपाल को लेकर अन्ना हजारे की मांग मानने को लेकर सरकार पर बने दबाव को बढ़ाए जा रहा था। नतीजतन, भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार सरकार को किसी जन आंदोलन के आगे विवश होकर संसद का विशेष सत्र बुलाना पड़ा। यहां देर रात तक चले बहस के बाद जनलोकपाल बिल को ध्वनि मत से पास कर स्थायी समिति के पास भेजने का फैसला लिया गया। इसी के साथ 28 अगस्त 2011 को अन्ना हजारे ने नारियल पानी पीकर भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए ऐतिहासिक जन आंदोलन को समाप्त कर दिया।
उस समय तो यह आंदोलन सफल साबित हुआ। लेकिन अगर हम आज के परिपेक्ष्य में देखे तो आंदोलनकारियों का काम तो बन गया लेकिन जिस चीज के लिए यह आंदोलन शुरू किया गया वह आज तक नहीं बन पाया। अरविंद केरजीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए, किरण बेदी पौंडिचेरी की राज्यपाल बन गई, जनरल वीके सिंह विदेश राज्यमंत्री बन गए। इनके अलावा भी आंदोलन से जुड़े कई लोग जो राजनीति को बदलने आए थे वो खुद उसी राजनीति में शामिल हो गए। लेकिन अगर जो नहीं बना तो वह ‘जनलोकपाल’! अगर ऐसा होता तो अन्ना एक बार फिर दिल्ली में अनशन करने के लिए नहीं जुटे होते।
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