आजादी के आगाज़ से अब तक “हमारा राष्ट्रवाद”

आजादी के आगाज़ से अब तक “हमारा राष्ट्रवाद”

ब्रिटिश काल’ में सर जॉन स्ट्रेची ने भारत में कई वर्ष बिताने के बाद ‘इंडिया’ नामक पुस्तक लिखी…. यह उन नौकरशाहों के लिए थी जो कैम्ब्रिज की पढ़ाई के बाद अधिकारियों के रूप में भारत आने वाले थे…प्रशासक के तौर पर।

स्ट्रेची ने अपने पुस्तक में बयां किया कि यूरोप के राष्ट्रों के बीच इतना फर्क नहीं है जितना कि हिंदुस्तान के दो राज्यों के बीच? स्ट्रेची ने दावा किया कि ‘भारत’ महज एक ‘सुविधाजनक नाम मात्र है बल्कि यहाँ कई राष्ट्र बसते हैं इसलिए न तो यहाँ पहले कोई राष्ट्रीय भावना थी और न भविष्य में इसकी संभावना नज़र आती है ..!!

1857 की जंग को किसी ने क्रांति कहा तो किसी ने विद्रोह, पर वीर सावरकर ने इसे प्रथम स्वतंत्रता राष्ट्रीय युद्ध कहा। यहां जो बात अहम है, वह है राष्ट्रीयता। स्ट्रेची ने भारतीयों में इस भावना का ह्रास देखा और सावरकर ने विकास।

पर तार्किकता क्या कहती है? नाना साहब बगावत पर तब ही उतरे जब उनकी पेंशन बंद कर दी गई। रानी झाँसी का पदार्पण तब हुआ जब उनके गोद लिए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इनकार करते हुए हड़प नीति लागू कर दी गई..हिंदू सैनिकों को गाय की चर्बी वाले कारतूसों ने विद्रोह से भर दिया और मुस्लिम सैनिकों को सूअर की चर्बी वाले कारतूसों ने। जफ़र को लाल किला छोड़ने की ‘चिंता और भविष्य के उत्तराधिकारियों के सम्राट की जगह शहजादे की संज्ञा उन्हें चिंतित कर रही थी। अपनी-अपनी शंकाओं ने सभी को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया..न कि राष्ट्रीय भावना ने ( हाँ, कालांतर में यह राष्ट्रीय भावना का बीज रोपण करने में कारक सिद्ध हुई) पर रही सही राष्ट्रीयता की बात तब सामने आ गई जब ‘इस क्रांति का नेतृत्व बहादुरशाह को दे दिया गया .. उन्हें राष्ट्रीय चिंतक की बजाय महज एक मुग़ल ही माना गया और पूरा भारत अंग्रेजों के विरुद्ध लामबंद न होने से ‘कतराता रहा .. और एक अंकुरित होती राष्ट्रीय भावना को पैरों तले कुचल दिया ..!!

पटियाला, जींद, ग्वालियर, हैदराबाद के राजाओं ने विद्रोह को दबाने में सहायता की..लार्ड कैनिंग ने कहा – ‘इन शासकों एवं सरदारों ने तरंगरोधों का कार्य किया अन्यथा इस क्रांति ने हमें एक झोंके में बहा दिया होता..!

मीर जाफर और जयचंद तो गद्दारी के लिए बदनाम हैं..वर्ना इतिहास के पन्नों में तो न जाने कितने ऐसे नाम हैं जिन्होंने अंकुरित होती हुई राष्ट्रीय भावना को कुचलकर स्ट्रेची के कथन को नई चेतना प्रदान की।

खैर ..जेएनयू..जाधवपुर..के अफजल हम शर्मिंदा हैं..तेरे कातिल जिंदा हैं .. को दो वर्ष पूर्व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सांचे में ढालने वालों की राष्ट्रीयता चरमोत्कर्ष पर थी और दुःख यह रहा कि इसके विरोधी छद्म राष्ट्रवादियों के रूप में नामित किए गए..!!

डेढ़ साल पूर्व ऐसे दौर में नव वर्ष के आगाज़ के कुछ समय बाद ..पाकिस्तान नहीं युद्ध की अनुगूंज ने राष्ट्रीयता को फिर से कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया.. देश यहाँ भी स्ट्रेची के ही कथन को दोहरा रहा था ..!!

..नववर्ष पर हर जन सद्भावना से लबरेज लग रहा था ..मैं आशंकित था .. हुआ भी वही जिसकी आशंका थी कोरेगांव भीमा (महाराष्ट्र) में जश्न मनाया गया ..नए साल का नहीं ..बल्कि 1 जनवरी, 1818 के आंग्ल-मराठा युद्ध की 200वीं बरसी पर …. जिसमें पेशवा बाजीराव की मराठा सेना को ब्रिटिश कम्पनी की सेना ने परास्त करके दक्षिण भारत ब्रिटानी सत्ता को पांव जमाने में मदद की।

जश्न का स्वरूप इतना वैमनस्य भरा था कि ब्रिटिश कम्पनी की जिस सेना ने मराठों को परास्त किया उसमें ‘बॉम्बे नेटिव इंफेंट्री की टुकड़ी भी थी जिसमें महार जाति के सैनिक बहुतायत थे। यानि वे इस देश पर ब्रिटिश हुकूमत के पैर जमने और देश को गुलामी की जंजीरों में जकड़े जाने से दुखी न होकर उस ब्रिटिश सेना की जीत पर जश्न मना रहे थे जिसमें अपनी जाति के लोग सैनिकों के तौर पर सेवारत थे यानि वे इसे राष्ट्र की हार से कहीं ज्यादा इसे जाति की जीत से जोड़कर देख रहे थे ..!! यहाँ पर भी स्ट्रेची की ‘इण्डिया’ सही साबित होती है।

महार बनाम मराठा की यह जंग जो आंग्ल-मराठा युद्ध में ब्रिटिश सेना की ‘फूट डालो राज करो की नीति’ का हिस्सा था आज भी यथावत है..अगर यही नया साल है तो 200 सालों में हमने क्या सीखा ?

मैंने हमेशा सामाजिक विषमता पर चोट करने वाली विचारधारा को सिर माथे पर रखा है.. भले ही वे कबीर हों या ग़ालिब? या फिर रहीम हों या गांधी.. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर हों, ज्योतिबा फुले या फिर मुंशी प्रेमचंद। पर आंग्ल-मराठा युद्ध में एक वर्ग विशेष की जीत न होकर एक राष्ट्र द्वारा उपनिवेशवाद का बीजरोपण था ..जिसके काँटों से भविष्य के 130 साल हर भारतीय को लहूलुहान करते रहे.. काला पानी .. फाँसी .. जेल और लाखों यातनाएँ .. जिसके नासूर थे .. फिर यह कैसी जीत और कैसा जश्न .. ? .. और यह जीत है .. स्वाभिमान है तो फिर जयचंद और मीर जाफर गद्दार क्यों ?

जिन्ना तस्वीर विवाद को लेकर दो खेमों में बंटा राष्ट्र, कठुआ-साहिबाबाद बलात्कार कांड .. हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मदरसों में बंटा राष्ट्र ? न्यायालय की वैधानिकता पर संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ाने को उतारू भारत बंद .. पद्मावती पर राजपूतों का गौरव गान करता उपद्रव .. और उन्हीं गौरव वालों का जातीय आधार पर गैंगस्टर के साथ लामबंद नज़र आना .. भिंडरांवाला .. राजोआना के लिए लामबंद पंजाब .. अभिव्यक्ति की आज़ादी के मद्देनजर आतंकियों के जनाजे में जश्न मनाते आतंकी और उनके लिए कल्चर इवनिंग का आयोजन करते विश्वविद्यालय..स्वर्ण दलित अल्पसंख्यक बहुसंख्यक की पत्रकारिता .. राष्ट्रीयता के कफ़न की कीलें साबित हुई हैं !!

हाँ, ओलंपिक खेलों में हर विजेता खिलाड़ी की जाति ढूंढ लेने वाले हम .. प्रतिभाओं में जाति तलाश कर लेने वाले हम .. अपने देश की हार में जाति की जीत तलाशकर जश्न मनाने वाले हम भला स्ट्रेची को कैसे गलत साबित हो जाने दें क्योंकि राजनीति वोटबैंक, सत्ता अपने स्वार्थ के लिए इसे सींचता रहेगा और मीडिया जगत इसे “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” कहकर काँटों को छितराता रहेगा.. जो भावी पीढ़ी के लिए नासूर बनता रहेगा और स्ट्रेची का इंडिया .. शायद ही राष्ट्रीयता के मुकाम को छू सकेगा ?

गांधी का रामराज्य .. कलाम का विजन 20-20 और भगत सिंह की अच्छे दिनों की अभिलाषा घायल है .. और घायल है कविप्रदीप की रचना आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिन्दुस्तां की का राष्ट्रीय स्वाभिमान के भाव सिखाने वाला हर अंतरा ..!!

पर अफ़सोस। बलिदानों की धरती आज जातीयता के लहू से रक्तरंजित है .. हिंसा .. आगजनी .. सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाकर .. दुर्भावना से हर दिन का स्वागत किया जाता है.. मानवता शर्मशार है .. प्रेम कराह रहा है .. विद्वेष खिलखिला रहा है .. !! दिलोदिमाग में स्ट्रेची की पुस्तक ‘इंडिया’ का हर शब्द चोट कर रहा है जिसे भावना दुत्कारना चाहती है पर हकीकत है कि उसे स्वीकार कर लेने को बाध्य है …!!

संयोग से आज 1857 की क्रांति के आगाज दिवस के साथ ही कैफ़ी आज़मी साहब का जन्म दिन है .. उनकी कलम से जन्मे भारत ही भावी पीढ़ी को राष्ट्रवाद सिखाता गीत .. कर चले हम फ़िदा जान ओ तन साथियो .. अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो याद आ रहा है .. पर कुर्बानियों की राह वीरान हो चली है और रावण सीता के दामनों को तार-तार कर रहे हैं .. सिर पर कफ़न बांधने वाले नदारद हैं .. और रावणों के हाथ तोड़ देने वाले लक्ष्मण मजहबी खेमों में बंट चुके हैं .. जॉन स्ट्रेची का ‘भारत’ फलक पर है और कैफ़ी आज़मी का भारत हाशिये पर !!

-गाँधी सुभाष

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