आज सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 35-A पर होने वाली सुनवाई को टाल दिया है। आज यानी 6 अगस्त को बहुचर्चित भारतीय संविधान के आर्टिकल 35-A की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी थी। आर्टिकल 35-A जम्मू और कश्मीर विधानमंडल को स्थायी निवासियों को परिभाषित करने का अधिकार देता है। अब इस मामले पर सुनवाई की अगली तारीख़ 27 अगस्त तय की गई है।

27 अगस्त को होगी मामले की अगली सुनवाई

जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष दर्जा (Special Status) देने वाली भारतीय संविधान के आर्टिकल 35-A को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर होने वाली आज की सुनवाई टाल दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के पीठ ने कहा कि इस मामले पर अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी। इस विवादित आर्टिकल की यथास्थिति बनाए रखने की मांग को लेकर अलगाववादी समूहों द्वारा रविवार को दो दिनों के बंद का आह्वान किया गया था। भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि आर्टिकल 35-A को भंग कर देने से ‘Kashmir For All’ के आइडिया सफ़ल होगी और इससे राज्य को फ़ायदा हो सकेगा।

नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने किया विरोध प्रदर्शन, गरमाई राजनीति

दूसरी तरफ, नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी जैसी सरीखी राजनीतिक दलों और अलगाववादियों का मानना है कि आर्टिकल 35-A को हटाना कश्मीरी जनता के भलाई के खिलाफ़ है। इससे उनके ऊपर नकारात्मक असर पड़ेगा। सुनवाई से दो दिन पहले नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने अलग-अलग विरोध प्रदर्शन किया। इन लोगों की मांग है कि आर्टिकल 35-A को संविधान से नहीं हटाया जाना चाहिए। इस मुद्दे को राज्य में राजनीतिक गरमाहट आ गई है।

क्या है आर्टिकल 35-A? जानें इससे जुड़ी मुख्य बातें

1. आर्टिकल 35-A जम्मू और कश्मीर विधानमंडल को स्थायी निवासियों को परिभाषित करने का अधिकार देता है। यह आर्टिकल स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और सुविधाओं से नवाजता है। इन लोगों को पब्लिक सेक्टर जॉब, स्कॉलरशिप, राज्य में संपत्ति के अधिग्रहण तथा सार्वजनिक सहायता और कल्याण में विशेष अधिकार मिलता है। यह आर्टिकल इस बात कि भी घोषणा करता है कि इस आर्टिकल के तहत आने वाले विधानमंडल के किसी भी एक्ट को संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए या अन्य जमीन के कानून के लिए चुनौती नहीं दिया जा सकता।

2. आर्टिकल 35-A राष्ट्रपति के आदेश द्वारा संविधान में जोड़ा गया था। साल 1954 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई वाली कैबिनेट के सलाह के अनुसार राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने आदेश पारित किया था। जम्मू और कश्मीर के लिए यह कांस्टीट्यूशन ऑर्डर संविधान के आर्टिकल 370 के अनुसार था। माना जाता है कि आर्टिकल 370 और आर्टिकल 35-A की वैधता को चुनौती देते हुए NGO वी द सिटिजंस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसका मानना है कि आर्टिकल 35-A देश की अखंडता की भावना के ख़िलाफ़ है। इस आर्टिकल ने भारतीय नागरिकों में क्लास में भी क्लास का निर्माण किया है।

3. इसके अलावा जम्मू और कश्मीर की निवासी चारु वली खन्ना ने भी जम्मू कश्मीर के विधान के कुछ निश्चित प्रावधानों की रक्षा करने वाली इस आर्टिकल के खिलाफ़ एक याचिका दायर की थी। ये प्रावधान किसी कश्मीरी महिला को संपत्ति के अधिकार से वंचित कर देते हैं जो राज्य के बाहर के किसी पुरूष से शादी करती है। इस तरह से महिला और उसके बच्चे जम्मू कश्मीर में अपने संपत्ति के अधिकार को खो देते हैं।

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