उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की 102वीं जयंती

कुछ हस्तियां ऐसी होती हैं जिनका वजूद उनके शरीर का मोहताज नहीं होता। क्योंकि ये शरीर के नष्ट हो जाने के बावजूद अपनी कला में और लोगों के ज़ेहन में जिंदा रहते हैं। ऐसे ही कुछ चुनिंदा लोगों में मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब का नाम भी शुमार है। 21 मार्च 1916 को जन्मे बिस्मिल्लाह खान की आज 102वीं जयंती है। जिसे समूचे भारत के साथ-साथ दुनिया का नंबर वन सर्च इंजन गूगल भी अपने डूडल के जरिए मना रहा है।
बिस्मिल्लाह खान के नाम के पीछे की यह कहानी है कि उनके पैदा होने की खुशी पर उनके दादा जी ने अल्लाह को शुक्रिया करते हुए ‘बिस्मिल्लाह’ कहा और फिर यह शब्द उनके नाम में तब्दील हो गया। मात्र 14 साल की उम्र से सार्वजनिक स्थल पर शहनाई वादन करने वाले बिस्मिल्लाह बहुत कम उम्र में ही ठुमरी, छैती, कजरी और स्वानी जैसी कई विधाओं को सीख लिया था। बाद में उन्होंने ख्याल म्यूज़िक की पढ़ाई भी की और कई सारे राग में निपुणता हासिल कर ली।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान
कला के कुएं में गहरे उतरे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जीवन अवार्ड्स से भरा हुआ रहा। इधर कला के क्षेत्र में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी क़ूवत और देश का सम्मान बढ़ाते गए उधर भारत सरकार उनके सम्मान का स्तर। यही वजह रहा कि सबसे पहले 1961 में भारत सरकार की तरफ से उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके ठीक सात साल बाद साल 1968 में उन्हें पद्म भूषण से नवाजा गया। इसके उपरांत साल 1980 में उन्हें पद्मविभूषण और 2001 में सर्वश्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।
कहने को उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म बिहार के डुमराव में हुआ लेकिन जल्द ही वह बेहद कम उम्र में अपने चाचा अली बख्स के संग बनारस आ गए। बनारस में आकर बिस्मिल्लाह खान इसकी मिट्टी में ऐसे रच बस गए कि जीवन भर के लिए यहीं के होके रह गए। 21 अगस्त साल 2006 के एक मनहूस दिन संगीत का यह सरताज 90 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह गया।
आज के उस दौर में जहां बात-बात पर कुछ लोगों द्वारा देशभक्ति को लेकर सवाल उठाए जा रहा है और कुछ लोगों को समय-समय पर अपनी देशभक्ति साबित करनी पड़ रही है। तब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से जुड़ा एक किस्सा आज हम सभी को जानना चाहिए। दरअसल, एक बार एक अमेरिकी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की कला पर मंत्रमुग्ध होकर उनके पास आया और उनसे अपने साथ अमेरिका चलने की जिद करने लगा। इसके बदले में वह उस्ताद को मुंहमांगी कीमत तक अदा करने को तैयार हो गया। लेकिन बनारस में बस कर उसे अपने रोम-रोम में बसा लेने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने दो टूक कहा, क्या अमेरिका में माँ गंगा मिलेंगी ? गंगा को भी ले चलो, तभी चलूँगा।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान
हालाँकि, यह इस देश का दुर्भाग्य ही है कि अथाह पैसों के बावजूद अपनी धरती को ना त्यागने वाले बिस्मिल्लाह खान का परिवार आज आर्थिक तंगी में अपना जीवन गुजर-बसर करने के लिए मजबूर है। दुनियाभर में अपनी कला का परचम लहराकर भारत का नाम रोशन करने वाले बिस्मिल्लाह खान का खुद का परिवार आज ग़ुरबत के अंधेरे में जी रहा है। घर की हालत इतनी खराब है कि परिवार बिस्मिल्लाह खान द्वारा जीते गए अवार्ड्स तक की ठीक तरीके से देखभाल नहीं कर पा रहा है।
15 अगस्त 1947 के ऐतिहासिक दिन भारत के प्रथम स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से झंडा फहराने के बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने अपनी शहनाई की तान छेड़ सभी को अपने सुरों से मंत्रमुग्ध कर दिया था। काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े रहे बिस्मिल्लाह का जीवन गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक था। वह सदा सभी समुदायों के बीच संगीत के सहारे स्नेह साधने में लगे रहे। यही वह कारण है कि मजहब के परे बिस्मिल्लाह खान को सभी धर्म-संप्रदाय के लोगों का प्यार मिलता रहा। उनके शख्सियत के कायल आम से लेकर खास लोग सभी थे। इंदिरा गांधी तक बिस्मिल्लाह खान को आमंत्रण देकर उनकी शहनाई की सुनती थी।
No Comments Yet

Leave a Reply

Your email address will not be published.

युवा देश से जुड़ी समाजिक सरोकार रखने वाली खबर, आम आदमी से जुड़े खास मुद्दों के करीब, बेवज़ह और बेतुके के ड्रामे से दूर, हवा हवाई बातों के इतर जमीनी हकीकत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए सब्सक्राइब करे हमारा चैनल युवायु। Contact us: info@uvayu.com