किसान दिवस पर पढ़िए कवि गाँधी सुभाष द्वारा लिखी गई कविता- ‘किसान का बेटा’

  “किसान का बेटा” 
हाँ ! मैं एक किसान का बेटा हूँ
मेरे पापा मेरे सपने बेचकर
जुटा पाते हैं खेतों के लिए खाद,
धरती के गर्भ में बो कर हर फसल
वे जान नहीं पाए अब तक
कि आखिर कैसा होता है संतुलित भोजन का स्वाद ?
सूखती फसलों के लिए
पानी तो बहुत जरूरी है,
पानी की इसी कीमत पर
मेरे सपनों और मेरी हकीकत में
आकाश पाताल की दूरी है !!
कभी किताबों, कभी कॉपियों तो
कभी फीस की कमी खलती है,
देखता हूँ चेहरे पर उनके चिंता की गूढ़ रेखाएँ
ज्यों-ज्यों उनकी उम्र ढलती है !!
जाड़ों की जमा देने वाली रात हो
या जयेष्ठ के जला देने वाले दिन,
सहकर प्रकृति की इन यातनाओं को
देखा नहीं उनको कभी होते हुए खिन्न !
सोचता हूँ
किताबों से ज्यादा तो कुदाल जरूरी है,
छू लूँ सितारों को
बन जाऊँ अधिकारी
ये चाहतें हैं मेरी भी…..पर क्या करूँ ?
पापा के द्वारा ऐसा हो सकना
उनकी लापरवाही नहीं बल्कि मजबूरी है….
बेटी के ब्याह का कर्ज़
दिन-रात उन्हें सताता है,
कभी बाढ़, कभी सूखा तो कभी रोगों का प्रकोप
फसलों के साथ-साथ उनको भी खाए जाता है !!
ऐसा नहीं कि
वे मेरे लिए सपने नहीं बोते….!
सच्चाई तो यही है
कि मेरे भविष्य की चिंता में
वे रात-रात भर नहीं सोते ….!!
मेरे व्यक्तित्व से महत्त्वपूर्ण है
उनके लिए अपने खेतों का श्रृंगार,
मग़र अर्थ इसका यह भी नहीं
कि उनको नहीं है – मुझसे जरा-सा प्यार !
देखता हूँ भी तार-तार कपड़ों में उनको
लगता है कि
वे खेतों को गोड़कर अपना पसीना बोते हैं,
सहकर जमाने भर की शोषण और बेहयायी
जिंदगी का भार खुशी-खुशी कंधों पर ढोते हैं..।
छूने लगता हूँ जब भी चरण उनके
वे अपनी टाँगों को जीर्ण-शीर्ण कपड़ों में
छुपाते हुए मुस्कुराते हैं,
बेटा खुद को दोषी महसूस करे
वे ऐसा भूलकर भी नहीं चाहते हैं…??
देखकर बदनसीबी उनकी
बैठकर किसी कोने में चुपके से रो लेता हूँ,
माना कुछ कर न सका उनके हित
पर पश्ताताप के आँसुओं से
दाग़ दिल के धो लेता हूँ…..!!
जानकर हाल-ए-दिल मेरा
यह मत समझ लेना कि
मैं महज नफरत का कारक हूँ,
हकीकत तो यही है
कि मैं भी अपने पापा का चहेता हूँ,
पर इसे सौभाग्य कहूँ या दुर्भाग्य
कि मैं एक किसान का बेटा हूँ ….!!
..हाँ ! मैं एक किसान का बेटा हूँ .
 कवी – गाँधी सुभाष  
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