क्या भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव सांडर्स और ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध अपनी नफरत न भुला पाने के लिए कटघरे में खड़े किए जाएँगे ? – गांधी सुभाष

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एक कहावत है कि यदि तुम मुझे एक बार धोखा देते हो तो तुम पर लानत है .. पर तुम मुझे दूसरी बार धोखा देते हो मुझ पर लानत है .. इस भावना से महरूम लोग जेनेवा संधि के तहत जो तय था उसका श्रेय लेकर इमरानखान भारत में एक धड़े के लिए शांति दूत हो गए .. अगर वे नोबेल कमेटी में हों तो इस बार का ‘नोबेल शांति पुरस्कार पाकिस्तान – इमरान को संयुक्त रूप से देने की घोषणा कर दे .. !!

संयोग यह भी है कि वे इतिहास अनभिज्ञता में इतिहास को टटोल लेने वालों को ‘नफरती सोच’ का प्रमाण -पत्र देने से नहीं चूक रहे हैं .. !!

दिसंबर 2014 का वाकया है .. मेरी एक सहयोगी पुरस्कृत हुई और अपने फेसबुक अकाउंट पर अपनी तस्वीर साझा कर पार्टी बधाइयाँ .. टिप्पणियों में लबरेज थी .. संयोग से यह वही दिन था जब पाकिस्तान के आर्मी स्कूल पर हमले में 132 मासूमों की जान चली गई .. मैंने आहत मन से इस व्यक्तिगत खुशी की आड़ में मानवता के कत्लेआम की संवेदना को भुला देने के लिए कड़ी भर्त्सना की .. संयोग से मेरे शब्दों के प्रहार भारतीय पर थे .. पाकिस्तान के मासूमों की संवेदना स्वरूप !!

खैर इतिहास टटोलते हैं क्या शहीद उधम’सिंह अपनी नफरत न भुला पाने के लिए दोषी कहे जाएंगे जो 21वर्षों के बाद भी जलियांवाले बाग़ के नासूरों को न भुलाकर लंदन जाकर ओ ड्वायर को मौत के घाट उतार देते हैं।

जब उन्हें यह लालच दिया गया कि कह दो न यह गोली मैंने नहीं चलाई तुम्हारे सब गुनाह ‘माफ़ ; तो उधम का जवाब था कैसे कह दूँ .. ओ ड्वायर को मैंने नहीं मारा है जिस पश्चाताप की आग में मैं 21 साल जला हूँ कैसे कह दूँ गोली मैंने नहीं चलाई।

क्या मदन लाल ढींगरा तीसरी सोच के आदमी ही कहलाएंगे ? जिन्होंने ‘कर्जन वायली को मारकर यह कहा कि मेरा यह कार्य उस अंग्रेजी ‘हुकूमत को एक पैगाम है … जिसने पिछले पचास सालों में आठ लाख भारतीयों को दर्दनाक मौत दी है।

क्या भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव सांडर्स और ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध अपनी नफरत न भुला पाने के लिए कटघरे में खड़े किए जाएँगे ?

क्या खुदी राम बोस को किंग्सफोर्ड के प्रति अपनी नफरत न भुला पाने के लिए एक बंददिमागी सोच का परिचायक कहा जाएगा ?

1984 से लेकर 2019 तक भारत में 75 आतंकी हमलों और 4 युद्धों को थोपकर लाशों का अंबार लगाने वाले देश को दोष देने वाले बंद दिमागी सोच के कैसे हो गए ?

जो लोग गाँधी हत्या के लिए एक संगठन को दोष देने में एक कदम भी पीछे नहीं रहते और न ही ‘दूसरे छात्र संगठनों के प्रति अपनी नफरत कभी दूर कर पाए है; बल्कि उन छात्रों को गाँधी हत्यारा कहे और सीमा पार वाले युद्धोन्मदिओं और आतंकी सरगनाओं को दोषमुक्त करार दे दे तो उनकी शांति की अपील के मायने क्या है ?

भान रहे कि चोरी करते समय चोर .. तीर छोड़ते समय कमान हमला करते समय हिंसक जीव .. मतलब निकालने के लिए चापलूस आवश्यकता से ज्यादा झुक जाते हैं .. !!

अब 21 साल वाले उधम हो सकना तो मुनासिब कहाँ है काश 21 दिन पुलवामा के चीथड़ों पर आँसू तरेर लेते .. पर क्या करें हम सिद्धू हो चले हैं .. !!

लेखक- गांधी सुभाष

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