क्या भारत में बढ़ते बलात्कार के लिए पोर्न है ज़िम्मेदार?

डॉक्टर मोनिका शर्मा जी महिलाओं से जुड़े मसलों पर लिखती रहती हैं। महिलाओं के जीवन से जुड़े रंगों के साथ-साथ उनकी सामाजिक समस्याओं पर समय-समय पर इनके बेहतरीन मर्मस्पर्शी लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। हाल के दिनों में मोनिका शर्मा जी बच्चियों और महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते लेखन कार्य कर रही हैं। इन्हीं में से एक उन्होंने बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के लिए स्मार्टफोन में पोर्न देखने के बढ़ते चलन को जिम्मेदार ठहराया है। तो चलिए मोनिका शर्मा द्वारा लिखे ‘मुठ्ठी मौजूद है गंदगी तो मन-मस्तिष्क साफ कैसे रहेगा?’ नामक शीर्षक वाले उनके लेख के जरिए जानते हैं कि बलात्कार की बढ़ती प्रवृति को लेकर पोर्न की भूमिका पर उनका क्या मत है।

मुठ्ठी मौजूद है गंदगी तो मन-मस्तिष्क साफ कैसे रहेगा?

स्त्री हूँ, बेटी हूँ, माँ हूँ, हमारे ही परिवेश और समाज में बड़ी हुई हूँ | गाँव में भी रही विदेश भी देखा | मासूम बच्चियों से लेकर उम्रदराज़ औरतों के साथ बर्बरता और बेहूदगी क्यों हो रही है … थोड़ा बहुत समझ पा रही हूँ | समझ पा रही हूँ कि क्या बदल रहा है समाज में ? क्या परिवर्तन आ रहे हैं सोच में ? और क्यों गुम हो रही है समझ ?

आजकल छोटे छोटे (टीनएजर्स ) बच्चों की नज़र में भी वो सम्मान और समझ नहीं दिखती जो कुछ साल पहले तक हुआ करती थी | क्योंकि किसी महिला की ओर देखने से कुछ लम्हों पहले तक ही शायद वे अश्लीलता के बाज़ार की सैर करके आये होते हैं | जो मुठ्ठी में ही मौजूद है | स्मार्ट फ़ोन पर एक क्लिक भर में वो सब कुछ सामने आ जाता है जो किसी भी उम्र के इंसान की समझ खोने को काफी है | ऐसे ही किसी एक पल में ये पूरी समझ खो देते हैं और समाज पर एक और दाग, एक और बहस की शुरुआत, एक और मासूम की जिंदगी से खिलवाड़ |

कुछ साल पहले तक सड़क पर सवारी का इंतजार करने वाले ऑटो रिक्शा चालक दोपहर में आराम करते नज़र आते थे | अब फोन में गुम रहते हैं | स्त्री हूँ , समझ पाती हूँ उनके आसपास से गुजरते हुए कि वे देश या समाज में बदलाव लाने वाली कोई जानकारियां नहीं देख रहे हैं | वो जो देख सुन रहे होते हैं वो उनकी आँखों में दिखता है | आये दिन इस गंदगी का डोज़ पीते-पीते किसी दिन वे होश- हवाश खोते हैं तो फिर कोई महिला सवारी हो या आस-पास कचरा बीन रही बच्ची, एक नई घटना समाज को हैरान परेशान करने अख़बारों की हेडलाइन बनती है |

किसी बन रही इमारत के आस-पास से गुजरिये तो मजदूर भी दो पल सुकून के मिलने पर स्मार्ट फ़ोन में ही झाँकते मिलते हैं | क्या देखते हैं ? यह बताती है उनकी विद्रूप हँसी | जो किसी भी महिला के वहां से गुजरने पर सुनाई देती है | घर-परिवार से दूर रहने वाले ऐसे ही किसी चेहरे की सोच और समझ जब पूरी तरह खो जाती है तोफिर क्या एक साल की मासूम और क्या कोई बुजुर्ग महिला ?

ये मात्र कुछ उदाहरण हैं | जो मैंने अपने आस-पास नोटिस किये हैं | बाकि घर-दफ्तर, शादी-ब्याह हर जगह हर, कोई यह कुत्सित सामग्री अपने साथ लिए घूम रहा है | जो टाइम बम से कम नहीं | अफ़सोस कि इसका फटना किसी और की जिंदगीऔर अस्मिता छीनता है |

मैं हमेशा कहती हूँ शराब हो या कोई और लत या कोई नकारात्मकता पुरुष की हर बुरी आदत का खामियाज़ा महिलाओं को भोगना पड़ता है | पोर्न सामग्री ऐसी ही एक बीमारी हो गई है | यह एक बीमार मन समाज बना रही है | जिसमें दिल-दिमाग किसी और का बीमार है और दुःख-दर्द किसी और के हिस्से आता है |

हमारे आस-पास बढ़ रहे( दुष्कर्म , महिला अपराध, छेड़छाड़ ) इस कोढ़ की बड़ी वजह , सबसे बड़ी वजह यह गंदगी ही है | बीमार मानसिकता को खाद -पानी देने वाली यह सामग्री सोच समझ की दुश्मन हो गई है| – मोनिका शर्मा

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