क्या है गगनयान मिशन का ‘राजनीतिक’ महत्व? आख़िर इसरो के लिए आश्चर्य की बात क्यों बनी घोषणा?

15 अगस्त को लालकिले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी घोषणा की जिसने न सिर्फ़ दुनिया को बल्कि विडम्बनात्मकरूप से इसरो(ISRO) को भी चौंका दिया। इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि भारत अपने अंतरिक्ष यात्रियों को 2022 तक अंतरिक्ष में भेज देगा। इस आकस्मिक घोषणा ने स्पेस एजेंसी इसरो(ISRO) को मेगा प्रोजेक्ट के लिए आवश्यक व्यवस्था मुहैया कराने के लिए अफरातफरी वाले हालात में पहुंचा दिया। यह वास्तव में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण कदम को चिह्नित करेगा।
हालांकि, यह अब भी बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है कि इतने बड़े कदम के लिए इसरो से परामर्श क्यों नहीं किया गया था? पीएम मोदी के इस घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए इसरो चीफ़ के. सिवान ने कहा था कि, “यह हमारे लिए एक बड़ा आश्चर्य है।” फिर भी, सवाल यह है कि क्या यह इसरो को लिए एक बड़े आश्चर्य के रूप में आना चाहिए था? तार्किक तौर पर तो बिल्कुल नहीं। इतने बड़े घोषणा से पहले भारत के सभी अंतरिक्ष मिशनों के लिए जिम्मेदार एजेंसी होने के नाते इसरो के साथ आदर्श रूप से परामर्श तो कर ही लेना चाहिए था। लेक़िन पीएम मोदी ने इन बातों को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ना उचित समझा और हैरान कर देने वाली घोषणा कर बैठे।
तो आइए इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से जुड़े कुछ पहलुओं को समझने की कोशिश करें-
◆ समयसीमा:- अब किसी भी प्रोजेक्ट के लिए एक समयसीमा तैयार की जाती है। तो ऐसे में इस मिशन के लिए भी समयसीमा का होना स्वाभाविक है। जानकारों की मानें तो तय समयसीमा के भीतर इस घोषणा को अमलीजामा पहनाने में इसरो को काफ़ी मसक्कत करनी पड़ेगी।
नोटिस की कमी को देखते हुए, इसरो अब अंतरिक्ष यात्रियों की भर्ती, मौजूदा तकनीक में सुधार लाने और मोदी द्वारा निर्धारित समय सीमा को पूरा करने के लिए नई तकनीक विकसित करने के उत्तेजित प्रयासों में लगा हुआ है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसरो ने फ्रेंच स्पेस एजेंसी CNES को अपना पार्टनर भी बनाया है। विशेष रूप से, कई विशेषज्ञों का मानना ​​है कि तकनीकी कमियों के कारण तय समयसीमा के भीतर अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए ISRO को काफ़ी संघर्ष करना पड़ सकता है।
◆ मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान:-
मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान में आमतौर पर दीर्घकालिक योजना शामिल होती है। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि अंतरिक्ष में मनुष्य को भेजना कोई आसान काम नहीं होता है। इसके लिए काफी तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है। इसमें भारी मात्रा में जोखिम भी शामिल होता है, और जो भी कहा और किया जाता है वह आदर्श रूप से एक अच्छी तरह से विचार-विमर्श, गणना, लंबी अवधि की योजना के तहत होना चाहिए। इस तरह के एक मिशन से जुड़े कठिनाइयों और जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए, इसरो को अंधेरे में रखना शायद ही कभी मददगार साबित हुई हो।
◆ वर्तमान स्थिति:-
इस मिशन के लिए ₹10,000 करोड़ की राशि निर्धारित की गई है। लेक़िन क्या इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए यह राशि पर्याप्त होगी? बहरहाल, इस मिशन के लिए ₹10,000 करोड़ की राशि तो निर्धारित कर दी गई है। औऱ इसरो का दावा है कि उसके पास पहले से भी कुछ तकनीक मौजूद हैं जो इस मिशन को हासिल करने में मददगार साबित होंगे और जरूरी भी थे। फिर भी, शेष आवश्यक तकनीकी उन्नयन के साथ ही अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण के लिए इसरो को काफी प्रयास करने की आवश्यकता होगी। इसके लिए उसे भारतीय और विदेशी दोनों तरह के संस्थानों के साथ काम भी करना होगा।
◆ महत्ता:- क्या एक मानवयुक्त अंतरिक्ष यान भारत के लिए महत्वपूर्ण है?
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम भले ही मजबूत हो फ़िर भी अभी भी युवा है। इसने भारत की विकास और रक्षा आवश्यकताओं में सहायता के लिए सैटेलाइट लॉन्च पर काफी हद तक ध्यान केंद्रित किया है। बेशक, इसरो ने मंगलयान और चंद्रयान -1 मिशनों जैसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक मूल्यों के मिशन भी लॉन्च किए हैं। लेकिन, किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण कदम होने के साथ पृथ्वी की लो-ऑर्बिट में एक मानवयुक्त अंतरिक्ष यान, न तो अभूतपूर्व है और न ही विकास संबंधी आयात है।
◆ राजनीतिक संदर्भ:-
मानवयुक्त अंतरिक्ष यान बीजेपी के कथा में काफ़ी चुस्ती के साथ फिट बैठता है। सच्चाई को ध्यान में रखते हुए इसका राजनीतिक संदर्भ भी मायने रखता है। अंतरिक्ष ने लंबे समय से अपना आकांक्षात्मक मूल्य बरकरार रखा है। अक्सर देश की तकनीकी उपलब्धियों को ही प्रमुखता दी जाती है। पीएम मोदी ने पहले ही इसरो की उपलब्धियों को बढ़चढ़ कर गिनाया है। उपयोगिता के मामले में मानवयुक्त अंतरिक्ष यान कार्यक्रम भले ही व्यर्थ हो सकता है, लेकिन यह 2019 के चुनावों से पहले भाजपा के ‘हमारे शासन में बढ़ते हुए भारत’ की कथाओं में चुस्ती से फिट बैठता है।
Shravan Pandey
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