क्या है भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों में फर्क की परिभाषा!

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देश की सुरक्षा हेतु हमारे देश में भारतीय सेना और सीएपीएफ (Central Armed Police Forces)अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर आज हम अपने आपको सुरक्षित समझ रहे हैं तो यह इनकी ही देन है जो अपनी जान हथेली पर रखकर हमारी रक्षा कर रहे हैं। लेकिन बात जब इनके जिंदगी की आती है तो कुछ चिंताजनक बातें सामने आती हैं। दरअसल, यह समस्या सेना और अर्धसैनिक बलों को लेकर सरकारी नीतियों और उनके लिए अलग-अलग सुविधाओं को लेकर है। कुछ दिनों पहले BSF के एक जवान तेज बहादुर यादव ने शिकायत की थी। उसके बाद CRPF के एक जवान ने अर्धसैनिक बलों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल पूछे थे। इन सवालों ने देश की जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया था। हमारे देश में ऐसे कई लोग हैं जो भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों को एक ही समझते हैं, मगर ऐसा नहीं है। आज हम भारतीय सेना और सीएपीएफ (Central Armed Police forces) के बीच के अंतर को समझने की कोशिश करेंगे।
गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले इन सुरक्षा बलों में मुख्य रुप से CRPF, BSF, ITBP, CISF, Assam Rifles और SSB शामिल हैं। देश में अर्धसैनिक बलों के जवानों की संख्या 9 लाख से थोड़ी सी ज़्यादा है। जबकि Indian Army, Indian Air Force और Indian Navy में शामिल सैनिकों की संख्या साढ़े 13 लाख के करीब है।
भारतीय सेना
देश की सुरक्षा में अर्धसैनिक बल के जवानों का योगदान
1.देश के अर्धसैनिक बलों को बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, चीन, भूटान और नेपाल से सटे सीमाओं पर अपनी ड्यूटी देनी पड़ती है।
2.देश को आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्याओं से बचाने के लिए अर्धसैनिक बलों को पूरे देश में आतंकवाद और नक्सलवाद विरोधी गतिविधियों में शामिल होना पड़ता है।
3.देश में चुनाव के समय या फिर किसी हालात विशेष में क़ानून-व्यवस्था को संभालने के लिए अर्धसैनिक बलों को तैनात किया जाता है।
4.जब बात आती है VIP सिक्योरिटी की तब मुख्यतौर पर अर्धसैनिक बलों के जवान ही इस्तेमाल किये जाते हैं।
5.देश जब प्राकृतिक या मानवकृत आपदाओं से घिर जाता है तब उससे निबटने के लिए तैयार की जाने वाली NDRF टीम में अर्धसैनिक बल के जवानों को ही शामिल किया जाता है।
 आज़ादी के बाद से लेकर वर्ष 2015 तक देश के लिए शहीद होने वाले सैनिकों की संख्या 22 हज़ार 500 से ज़्यादा थी। जबकि वर्ष 2015 तक अर्धसैनिक बल के 31 हज़ार 895 जवानों ने अपनी जान गवांकर देश की रक्षा की है। लेकिन जब इनको लेकर सरकारी नीतियाँ सामने आती हैं तो उनमें अंतर की एक गहरी खाई नजर आती है। अब इस बात से अंदाजा लगाइए कि जब भारतीय सेना और अर्धसैनिक बल दोनों ही देश के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर देते हैं तब इनको दी जाने वाली सुविधाओं में फर्क क्यूँ किया जाता है? 2015-16 में केंद्र सरकार ने बजट में भारतीय सेना के लिए 1 लाख 24 हज़ार 337 करोड़ रुपये आबंटित किए थे वहीं दूसरी तरफ अर्धसैनिक बलों के लिए सिर्फ 38 हज़ार 331 करोड़ रुपये की धनराशि मुहैया कराई गई थी।
भारतीय सेना
वे सवाल जो आपको यह बता देंगे कि देश की सेना और अर्धसैनिक बल में किस तरह का फर्क किया जाता है
जैसा कि आपने ऊपर के लाइनों को पढ़ा तो अब आपको यह समझ में आ ही गया होगा कि जितना योगदान भारतीय सेना देश की रक्षा के लिए दे रही है उतना ही योगदान अर्धसैनिक बल के जवान भी दे रहे हैं तो फिर इनके बीच फर्क क्यूँ? जब सीमा पर युद्ध या हमले के दौरान दुश्मन की गोली इनमें फर्क नहीं करती तो हमारी सरकार इनमें फर्क क्यूँ कर रही है? भारतीय सेना को जो सुविधाएं मिलती हैं वह सुविधाएं अर्धसैनिक बल के जवानों को नहीं मिलती। अफ़सोस तो इस बात पर भी होता है कि देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अर्धसैनिक बल के जवानों को ‘शहीद’ की श्रेणी में नहीं रखा जाता। बड़ी विडम्बना की बात है कि आज आजादी के 71 साल बाद भी ‘शहीद’ शब्द हमारे सिस्टम में आधिकारिक तौर पर जगह बनाने में नाकाम रहा है। एक सवाल के जवाब में संसद में केंद्र सरकार यह कह चुकी है, कि हमारे सिस्टम में शहीद शब्द की कोई परिभाषा है ही नहीं। यानी शहीद शब्द सिर्फ बातचीत और नारेबाज़ी के दायरे में सिमट कर रह जाता है।
हमारे देश में शहीद शब्द से जुड़ा यह मुद्दा अक्सर चर्चा का विषय बना रहता है। लोग अक्सर यह सवाल पूछते रहते हैं कि देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की बलि देने वाले अर्धसैनिक बल के जवानों को मरणोपरांत शहीद का दर्जा क्यों नहीं दिया जाता? लोग अपनी बातों के समर्थन में कहते हैं कि सीमा पर देश के लिए अपनी जान देने वाले सेना के जवान अगर शहीद हैं, तो फिर नक्सली हमलों, आतंकवादियों और देश के भीतर बैठे दुश्मनों का मुकाबला करने वाले जवानों को बलिदान के बाद शहीद का दर्जा क्यों नहीं मिल सकता? यह सवाल बहुत गंभीर है। इन तीखे सवालों का जवाब किसीके पास मौजूद भी नहीं है। यही वजह है कि आज अर्धसैनिक बल की तकलीफ और उनकी पीड़ा पूरे देश के समक्ष सवाल पैदा करती है।
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कुछ दिनों पहले CRPF के कॉन्स्टेबल जीत सिंह ने गृह मंत्रालय को 9 पन्नों की एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें उन्होंने खाने से लेकर, कपड़े, रहने की सुविधा, और ड्यूटी के घंटों पर कुछ चुभने वाले सवाल पूछे थे। कॉन्स्टेबल जीत सिंह ने  लिखा था कि खाने के लिए अलॉट किए गए पैसे खाने पर नहीं, बल्कि दूसरी चीज़ों पर खर्च किए जाते हैं। उनके अनुसार, नियमों के मुताबिक आठ घंटे की ड्यूटी करना अनिवार्य है, लेकिन उन्हें लगातार 20-20 घंटों की ड्यूटी पर तैनात किया जाता है। वहीं BSF के तेज बहादुर यादव ने आरोप लगाया था, कि उन्हें मिलने वाली दो वक्त की रोटी जली हुई होती है। और आरोप ये भी था, कि खाने में मिलने वाली दाल में भी भ्रष्टाचार का पानी मिला हुआ है। इस जवान के आरोप के बाद बड़े पैमाने पर जांच भी की गई। ये एक दुखद विडंबना है, कि जब भी देश में सुरक्षा व्यवस्था की बात आती है, तो अक्सर लोगों के दिमाग में सबसे पहले भारतीय सेना का नाम आता है। लेकिन कोई Central Armed Police forces की बात नहीं करता। जबकि लोगों को समझना चाहिये की देश की सुरक्षा में अर्धसैनिक बलों की भूमिका सेना से कम नहीं होती।

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