खिड़कियां आंखों की मेरी ~ पियूष कुमार सिंह

खिड़कियां आंखों की मेरी,
कब खुलेगी क्या पता? कब सुनेंगे कान मेरे, कुछ कहा कुछ अनकहा।।
देखी है दुनिया ये पूरी, फिर लगे क्यों ये अधूरी।
हर जरूरी चीज देखी, बच गया फिर भी जरूरी ।
उस बचे को मन ये मेरा, ढूंढता हर पल रहा ।
कब सुनेंगे कान मेरे, कुछ कहा कुछ अनकहा ।।
बात जो सुननी थी मुझको,
कानों तक पहुंची नहीं। बात दिल की दिल में ही,
ठहरी रही सहमी रही। समझा हूं मैं आज जाकर ,
इस दिल ने है कितना सहा
कब सुनेंगे कान मेरे, कुछ कहा कुछ अनकहा।।
कुछ तो चीजें थी बदलनी ,
खुद ही मैं बदला गया। कोशिशें की संभलने की ,
और मैं गिरता गया ।और मैं गिरने संभलने को,
बयां करता रहा ।
कब सुनेंगे कान मेरे कुछ कहा कुछ अनकहा।।

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