गंगा में स्नान करना खतरे से खाली नहीं

गंगा में स्नान करना खतरे से खाली नहीं

गंगा के पवित्र जल में स्नान करने को लेकर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया है। बोर्ड के आँकड़ों के मुताबिक़, इलाहाबाद के संगम (गंगा और यमुना का मिलन) में डुबकी लगाना स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो सकता है। बोर्ड द्वारा जारी 2017 के आधिकारिक  आँकड़ों के अनुसार, संगम के पानी में फेसल कोलीफार्म(FC) की मात्रा सामान्य अनुमत स्तर से 5-13 गुना ज्यादा बढ़ गया है। यह सीमा स्नान के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। पवित्र नदी के आसपास प्रदूषण का बोलबाला तो पहले से ही है मगर बढ़ी हुयी जनसँख्या और उसके दैनिक क्रियाकर्मों की वजह से इसमें और इजाफा हो गया है।

गंगा नदी में प्रवाहित होने वाली नालियों के गंदे पानी में मलमूत्र भी होता है। मलमूत्र में ई-कोलाई नामक फेसल कोलीफार्म(FC)बैक्टीरिया पाया जाता है। इस पानी का उचित निवारण न हो पाने के कारण यह गंगा के पवित्र जल को दूषित कर देता है। आँकड़ों के मुताबिक़, फेसल कोलीफार्म(FC) की उच्चतम अनुमत स्तर 2,500 MPN(Most probable number)/100 ml है। अगर बात करें वांछित स्तर की तो यह 500 MPN/100 ml है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड(CPCB) के आँकड़ों पर एक नजर,
  • उत्तर प्रदेश में फेसल कोलीफार्म(FC) के लिए जारी 2018 के आंकड़े के अनुसार, 16 स्थानों में से 8 स्थानों ने उम्मीद के मुताबिक़ प्रदर्शन नहीं किया। मतलब 50 प्रतिशत स्थानों से वांछित मानक को हासिल नहीं किया जा सका।
  • उत्तर प्रदेश में कानपुर, इलाहबाद और वाराणसी का इलाका सर्वाधिक प्रदूषित इलाकों में शुमार है।
  • कानपुर के जाजमऊ पम्पिंग स्टेशन से 2017 में फेसल कोलीफार्म(FC) का स्तर सामान्य से 10-23 गुना अधिक था। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। इससे पहले 2011 में भी यहाँ यह स्तर 4,000 से 93,000 MPN/100 ml तक था।
  • वाराणसी के मालवीय ब्रिज के पास 2017 में FC का स्तर 9-20 गुना तक था। वहीँ 2011 में यह स्तर 13 से लेकर 19 गुना तक था।
  • वहीँ दूसरी तरफ बिहार में 88 प्रतिशत स्थानों ने वांछित मानक को हासिल नहीं किया। यह कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के मुकाबले बिहार में यह स्थिति काफ़ी गम्भीर है।
  • बिहार के बक्सर में यह स्थिति काफ़ी चिंताजनक पायी गई। यहाँ रामरेखाघाट में अगस्त 2017 के आँकड़े के मुताबिक, FC स्तर 160,00,000 तक पहुँच गया। यह सामान्य स्तर से 6,400 गुना अधिक है।
  • बिहार में कोई भी ऐसा स्थान नहीं रहा जिसने संतोषजनक परिणाम दिया हो।
  • पश्चिम बंगाल के लिए 2017 के आंकड़े तो मौजूद नहीं हैं मगर 2016 के आँकड़े भी संतोषजनक नहीं कहे जा सकते।
  • झारखण्ड के 94 स्थान गंगा से जुड़े हुए हैं। 94 में से 76 स्थानों के आँकड़े उपलब्ध कराये जा सके हैं। झारखण्ड में मात्र एक स्थान ऐसा रहा जहां जल की गुणवत्ता संतोषजनक पाई गई।
  • जैसा कि गंगा का उद्गम उत्तराखंड से होता है। इसलिए उत्तराखंड के हर स्थान पर गंगा की शुद्धता कायम रहती है।
5 बड़े राज्यों में गंगा की पवित्रता पर सवालिया निशान

2017 के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आँकड़ों के एक विश्लेषण की बात करें तो, 5 राज्यों उत्तराखंड, उत्तर-प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में जल की गुणवत्ता अच्छी नहीं मिली। बता दें कि गंगा नदी इन पाँचों राज्यों से होकर बहती है। इनमें से बिहार और उत्तर प्रदेश का जल की गुणवत्ता के मामले में संतोषजनक प्रदर्शन नहीं रहा। इसके पीछे मलमूत्र के त्याग का बड़ा हाथ माना जाता है। विगत वर्षों में सेवरेज के निराकरण के लिए कई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई मगर अभी तक कोई परिणाम सामने नहीं आ सका है।

नाम न बताये जाने के शर्त पर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया कि हवा की गुणवत्ता के लिए अनुक्रमणिका(Index) बनाई गई है मगर जल के लिए अनुक्रमणिका(Index) बनाना मुश्किल काम है। फेसल कोलीफार्म मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए घातक है।

उत्तर-प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी अनिल कुमार सिंह के मुताबिक़, प्रदूषण के उच्च स्तर के लिए अनुपचारित घरेलू कचरा जिम्मेदार है। यह भारी मात्रा में नालों के माध्यम से नदी में प्रवेश करता है। वाराणसी में उपचार क्षमता पूरे घरेलू कचरे का लगभग एक तिहाई है। सच्चाई यह है कि 97 बड़े शहरों में नदियों पर मलजल उपचार क्षमता पूरे छोड़ी जाने वाली मलजल से आधी ही है। बड़े पैमाने पर जल प्रवाह की दिशा को मोड़ने की वजह से यह समस्या और भी गंभीर हो गयी है। प्रवाह गति धीमी पड़ जाने की वजह से जलजमाव के कारण जल प्रदूषण में वृद्धि हुई है।

कारगर साबित नहीं हुआ ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम

गंगा को स्वच्छ बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने नमामि गंगे कार्यक्रम को चलाया मगर निर्धारित लक्ष्य को नहीं पाया जा सका है। साल 2015 में गंगा नदी के जीर्णोद्धार के लिए 20,000 करोड़ रुपये के लागत को मंजूरी दी गई। यद्यपि 192 प्रोजेक्ट्स के लिए 19,630 करोड़ रूपया पास हो चुका है फिर भी केवल 49 प्रोजेक्ट्स ही पूर्ण हुए हैं।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी के मुताबिक़ मानसून के दौरान और बाद में जल प्रवाह तेज होने के कारण प्रदूषण का स्तर चढ़ता-उतरता रहता है। मगर प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ चुका है कि यमुना जैसी नदी पूरे साल प्रदूषित रहती है।

पर्यावरण कार्यकर्ता आर. के. सिन्हा के मुताबिक़, गंगा की सफाई से जुड़े आँकड़े अधूरे और स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हैं। आँकड़े संदिग्ध हैं मगर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अलावा कोई और इन आँकड़ों को इकट्ठा नहीं करता अतः इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। बता दें कि आर. के. सिन्हा बिहार के रहने वाले हैं। सिन्हा गंगा जल गुणवत्ता पर 30 साल से भी अधिक समय से कार्य कर रहे हैं। उनके मुताबिक़ नियामक प्राधिकरण और निगरानी प्राधिकरण एक जैसे नहीं हो सकते।

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