चीखते-चिल्लाते हुए कहे गए सनी देओल को वो 40 डायलॉग, जो आज भी हमारे कानों में गूंजते है!

आज जन्मदिन है, उस नायक का जिसने हिंदी सिनेमा में एक नए किस्म के नायकत्व को जन्म दिया। जिसने 90 के दशक में आक्रमक अंदाज में चीखते-चिल्लाते हुए ऐसे डायलॉग बोले, जो हिंदी सिनेमा के दर्शकों के जेहन में हमेशा-हमेशा के लिए संचित हो गए। जी हां, सही पहचाना आपने…… हम बात कर रहे अपने ढाई किलो के हाथ से विलेन को उठा उठाकर पटकने वाले सनी देओल की। जिस तरह 19 अक्टूबर 1956 को जन्में सनी देओल आज 19 अक्टूबर 2018 को 62 साल के हो जाने के बावजूद एकदम आज भी 90 के दशक वाले सनी देओल जितने की फीट दीखते हैं। उसी तरह उनके चाहने वालों के दिमाग में उनके द्वारा 30 साल पहले बोले गए सभी डायलॉग आज भी एकदम ताजा है। आज भी उन्हें सुनकर एक आम भारतीय की रगों में जोश और जूनून की बिजली कौंध जाती है। सनी ने 1982 में आई फिल्म बेताब से डेब्यू किया था। इसके अलावा उन्होंने मंजिल, अर्जुन, राम-अवतार, त्रिदेव, चालबाज, आग का गोला, घायल, नरसिम्हा, दामिनी, बॉर्डर और गदर जैसी फिल्मों में भी काम किया है। तो चलिए आज हम इन्हीं फिल्मों में सनी देओल द्वारा बोले गए लोकप्रिय 40 डायलॉग पढ़कर उस दौर को दोबारा जीते हैं।
Image result for अजय मेहरा घायल1) झक मारती है पुलिस। उतारकर फेंक दो ये वर्दी और पहन लो बलवंतराय का पट्‌टा अपने गले में यू बा**र्ड। ऑन माई फुट, माई फुट! अंधेर नगरी है ये। बस। ऐसे गरीब, कमज़ोर लोगों पर दिखाओ अपनी मर्दानगी। वर्दी का रौब। इन्हीं हाथों को बांध सकती हैं तुम्हारी हथकड़ियां. बलवंतराय के नहीं। जाकर दुम हिलाना उसके सामने। तलवे चाटना। बोटियां फेंकेंगे बोटियां। अच्छा कर रहे हो इंस्पेक्टर, बहुत अच्छा कर रहे हो तुम। बहुत तरक्की मिलेगी तुम्हे, मेडल्स मिलेंगे। अरे भागकर कहां जा रहे हो बात सुनो मेरी! आई विल ड्रैग यू टू द कोर्ट यू बा**र्ड, यू आर गोना पे फॉर दिस। – अजय मेहरा, घायल (1990)
2) इस चोट को अपने दिल-ओ-दिमाग़ पर क़ायम रखना। कल यही आंसू क्रांति का सैलाब बनकर, इस मुल्क की सारी गंदगी को बहा ले जाएंगे। – अजय मेहरा, घायल (1990)
3) रिश्वतख़ोरी और मक्कारी ने तुम लोगों के जिस्म में मां के दूध के असर को ख़तम कर दिया है। खोखले हो गए हो। तुम सब के सब नामर्द हो। – अजय मेहरा, घायल (1990)
4) तुम्हारी ऊंची शख्सियत और शरीफाना लिबास के पीछे छुपे शैतान को मैं पहचान चुका हूं। ये गीदड़भभकियां किसी और को देना बलवंतराय। अगर मेरे भाई को कुछ हुआ तो मैं तेरा वो हश्र करूंगा कि तुझे अपने पैदा होने पर अफसोस होगा। और तेरे ये पालतू कुत्ते जिन्हें देखकर तूने भौंकना शुरू किया है, ये उस वक्त तेरे आस पास भी नजर नहीं आएंगे। – अजय मेहरा, घायल (1990)
Image result for नरसिम्हा, नरसिम्हा (1991)5) आप का काम मैं देख रहा हूं इंस्पेक्टर। आप शायद ये भूल रहे हैं कि ये वर्दी, ये कुर्सी, आपको हमारी सुनने के लिए मिली है। आप यहां बैठे हैं, हमारे लिए, और ये तरीका है आपका हमसे बात करने का। – अजय मेहरा, घायल (1990)
6) बहुत पछताओगे इंस्पेक्टर, अगर तुमने मुझे ज़िंदा छोड़ दिया तो। – अजय मेहरा, घायल (1990)
7) जाओ बशीर ख़ान जाओ, किसी नाटक कंपनी में भर्ती हो जाओ, बहुत तरक्की मिलेगी तुम्हे, अच्छी एक्टिंग कर लेते हो। – अजय मेहरा, घायल (1990)
8) देखो, ग़ौर से देखो, यही इस देश के हर बापजी का असली रूप है। ये एक ऐसा राक्षस है जो इस शहर के हर नौजवान को, आपके भाई को, आपके बेटे को, एक ऐसा ग़लीज़, गिरा हुआ इंसान बनाना चाहता है जो इसकी ड्योढ़ी पर दो रोटी और एक शराब की बोतल के लिए गिड़गिड़ाए, भीख मांगे। मेरी आप सबसे एक बिनती है। निकाल दीजिए इस बापजी का डर अपने दिलों से। आज से इसके हर फरमान को ठुकरा दीजिए। ताकि इसके दहशत के निजाम को ज़र्रा-ज़र्रा होते हर वो शख़्स देखे जो बापजी है या बापजी होने का मंसूबा रखता है। – नरसिम्हा, नरसिम्हा (1991)
9) क्या आप अपने बच्चों को एक ऐसा शहर विरासत में देना चाहते हैं जो गुंडे, बदमाश और ख़ूनी चला रहे हों। – नरसिम्हा, नरसिम्हा (1991)
Image result for सनी देओल दामिनी10) चड्‌ढा, समझाओ.. इसे समझाओ। ऐसे ख़िलौने बाज़ार में बहुत बिकते हैं, मगर इसे खेलने के लिए जो जिगर चाहिए न, वो दुनिया के किसी बाज़ार में नहीं बिकता, मर्द उसे लेकर पैदा होता है। और जब ये ढाई किलो का हाथ किसी पर पड़ता है न तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है। – गोविंद, दामिनी (1993)
11) चिल्लाओ मत, नहीं तो ये केस यहीं रफा-दफा कर दूंगा। न तारीख़ न सुनवाई, सीधा इंसाफ। वो भी ताबड़तोड़। – गोविंद, दामिनी (1993)
12) अगर अदालत में तूने कोई बद्तमीजी की तो वहीं मारूंगा। जज ऑर्डर ऑर्डर करता रहेगा और तू पिटता रहेगा। – गोविंद, दामिनी (1993)
13) मीलॉर्ड, तारीख़ देने से पहले मैं कुछ अर्ज़ करना चाहूंगा। पहली तारीख़ में ये कहा गया कि दामिनी पाग़ल है, उसे पाग़लखाने भेज दिया गया जहां उसे पाग़ल बनाने की पूरी कोशिश की गई। दूसरी तारीख़ से पहले अस्पताल में पड़ी उर्मी का ख़ून कर दिया गया और केस बना ख़ुदकुशी का। जबकि इस अदालत में मैंने साबित कर दिया कि उर्मी ने ख़ुदकुशी नहीं की, उसका ख़ून हुआ है। और शेखर भी उस दिन सारे सच कहने ही वाला था कि चड्‌ढा साब ने फिर से अपनी चाल चल दी। बीमारी का नाटक करके तारीख़ ले ली। नहीं तो उसी दिन मीलॉर्ड इस केस का फैसला हो जाता। और आज आप फिर से तारीख़ दे रहे हैं। उस तारीख़ से पहले सड़क पर कोई ट्रक मुझे मारकर चला जाएगा और केस बनेगा रोड़ एक्सीडेंट का। और फिर से तारीख़ दे देंगे। और उस तारीख़ से पहले दामिनी को पाग़ल बनाकर पाग़लखाने में फेंक दिया जाएगा। और इस तरह न तो कोई सच्चाई के लिए लड़ने वाला रहेगा, न ही इंसाफ मांगने वाला। रह जाएगी तो सिर्फ तारीख़। और यही होता रहा है मीलॉर्ड तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही है मीलॉर्ड लेकिन इंसाफ नहीं मिला मीलॉर्ड, इंसाफ नहीं मिल। मिली है तो सिर्फ ये तारीख़। कानून के दलालों ने तारीख़ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है मीलॉर्ड। दो तारीख़ों के बीच अदालत के बाहर ये कानून का धंधा करते हैं, धंधा। जहां गवाह तोड़े जाते हैं, ख़रीदे जाते हैं, मारे जाते हैं। और रह जाती है सिर्फ तारीख़। लोग इंसाफ के लिए अपनी ज़मीन जायदाद बेचकर केस लड़ते हैं और ले जाते हैं तो सिर्फ तारीख़। औरतों ने अपने गहने-ज़ेवर, यहां तक कि मंगलसूत्र तक बेचे हैं इंसाफ के लिए और उन्हें भी मिली है तो सिर्फ तारीख़। महीनों, सालों चक्कर काटते काटते इस अदालत के कई फरियादी ख़ुद बन जाते हैं तारीख़ और उन्हें भी मिलती है तो सिर्फ तारीख़। ये केस पूरे हिंदुस्तान के कमज़ोर और सताए हुए लोगों का है। आज उन सबकी नजरें आप पर गड़ी हैं, आप पर। कि आप उन्हें क्या देते हैं। इंसाफ या तारीख़? अगर आप उन्हें इंसाफ नहीं दे सकते तो बंद कीजिए ये तमाशा। उखाड़ फेंकिए इन कटघरों को। फाड़ दीजिए, जला दीजिए कानून की इन किताबों को ताकि इंसाफ के ऐसे चक्कर में और तबाह न हों, बर्बाद न हों। – गोविंद, दामिनी (1993)
14) समझाओ, समझाओ मुझे। आखिर ये राजनीति होती क्या है? ये कुर्सी का नशा होता कैसा है? जिसे पाने के लिए इंसानियत से इतना नीचे गिर जाते हो तुम लोग। कि दोस्त के हाथों दोस्त का घर जला देते हो। भाई के हाथों, भाई का ख़ून करवा देते ह। कभी हड़ताल, कभी दंगा-फसाद, कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर लाशें बिछा देते हो तुम लोग। बोलो ऐसा क्यों करते हो? – अजय, अंगरक्षक (1995)
Image result for अजय, अंगरक्षक (1995)15) ये मज़दूर का हाथ है कात्या, लोहा पिघलाकर उसका आकार बदल देता है! ये ताकत ख़ून-पसीने से कमाई हुई रोटी की है। मुझे किसी के टुकड़ों पर पलने की जरूरत नहीं। – काशी, घातक (1996)
16) फिर मारूंगा, मैं फिर मारूंगा उन्हें, अगर मेरी आंखों के सामने होगा तो मैं फिर मारूंगा उन्हें। मैं नहीं देख सकता ये सब कुछ। नहीं देख सकता। कल अगर बाज़ार में भाभी का कोई हाथ पकड़ ले, तब भी आप मुझसे यही कहेंगे। – काशी, घातक (1996)
17) हलक़ में हाथ डालकर कलेजा खींच लूंगा हरामख़ोर.. उठा उठा के पटकूंगा! उठा उठा के पटकूंगा! चीर दूंगा, फाड़ दूंगा साले! – काशी, घातक (1996)
18) आ रहा हूं रुक, अगर सातों एक बाप के हो तो रुक, नहीं तो कसम गंगा मइय्या की, घर में घुस कर मारूंगा, सातों को साथ मारूंगा, एक साथ मारूंगा, अरे रूक!! – काशी, घातक (1996)
19) पिंजरे में आकर शेर भी कुत्ता बन जाता है कात्या। तू चाहता है मैं तेरे यहां कुत्ता बनकर रहूं। तू कहे तो काटूं, तू कहे तो भौंकू। – काशी, घातक (1996)
20) डरा के लोगों को वो जीता है जिसकी हडि्डयों में पानी भरा हो। इतना ही मर्द बनने का शौक है न कात्या, तो इन कुत्तों का सहारा लेना छोड़ दे। – काशी, घातक (1996)
Image result for काशी, घातक (1996)21) जो दर्द तुम आज महसूस करके मरना चाहते हो, ऐसे ही दर्द लेकर हम रोज़ जीते हैं। – काशी, घातक (1996)
22) हां हां, जानता हूं। नामर्दों का शहर है ये। बीच बज़ार में एक औरत को घसीटा जाता है, मारा जाता है, बस खड़े होकर तमाशा देखो.. जो मदद करे वो गधा, बेवकूफ। – काशी, घातक (1996)
23) क्यों? अंहिसा से अपना हक मांगने वाला सचदेव सरे-बाज़ार काट कर फेंक दिया गया.. क्यों? उसकी बीवी मालती तुम्हारे ही पुलिस स्टेशन में सर पटक-पटक कर पागल हो गई और उसे इंसाफ नहीं मिला.. क्यों? एक बुज़ुर्ग को चौराहे पर कुत्ता बनाया जाता है, उसका तमाशा बनाया जाता है। पुलिस मुंह फेरकर चली जाती है.. क्यों? 150 परिवार अपनी ज़मीन के लिए, अपनी रोज़ी-रोटी के लिए कभी किसी मिनिस्टर के सामने गिड़गिड़ाते हैं, तो कभी कात्या के दरवाज़े पर अपना माथा टेकते हैं तो कभी तुम्हारी जेबें गरम करते हैं, फिर भी उनके घर में चूल्हे ठंडे पड़े हैं। जानते हो क्यों? क्योंकि कानून और इंसान ताकतवर के घर ग़ुलाम बनकर बैठे हैं। और जब तक ऐसा रहेगा ख़ून यूं ही बहेगा. इस ख़ून के जिम्मेदार तुम हो। तुम जैसे ग़ैर-जिम्मेदार पुलिसवाले एक आम आदमी को घातक बनने पर मजबूर करते हैं। तुम्हारे पापों की कीमत चुकाई है तुम्हारी बेटी ने। – काशी, घातक (1996)
24) अब पुलिस नहीं, पुलिस नहीं। अगर मदद करना चाहते हो तो बाहर रहो। इस लड़ाई से बाहर रहो। मार देंगे उसे (मुन्ना को), मर जाने दो। मार देंगे दुकान वालों को, उन्हें भी मर जाने दो। लेकिन अब पुलिस का सहारा नहीं चाहिए. अब जो जिएगा वो अपने पैरों पर चलेगा, पुलिस की बैसाखी लेकर नहीं। इस लड़ाई में हमारी पूरी जीत होगी, या पूरी हार। जो गुर्दा रखता है, उसे ही जीने का हक़ है. वही जिएगा। – काशी, घातक (1996)
25) नहीं! तुम सिर्फ मेरी हो, और किसी की नहीं हो सकती। हम दोनों के बीच अगर कोई आया तो समझो वो मर गया। काजल! इन हाथों ने सिर्फ हथियार छोड़े हैं, चलाना नहीं भूले। अगर इस चौखट पर बारात आई तो डोली की जगह उनकी अर्थियां उठेंगी और सबसे पहले अर्थी उसकी उठेगी जिसके सर पर सेहरा होगा। लाशें बिछा दूंगा, लाशें! – करण, जीत (1996)
Image result for करण, जीत (1996)26) क्या चाहता है? क्या चाहता है तू? मौत चाहता है? तेरे सारे कुत्तों को मैंने मार दिया, मगर वो राजू को कुछ नहीं कर सके, वो जिंदा है। कोई भी बारूद, कोई भी हथियार उसे मार नहीं सकता। आज के बाद तेरी हर सांस के पीछे मैं मौत बनकर खड़ा हूं। – करण, जीत (1996)
27) चिल्लाओ मत इंस्पेक्टर, ये देवा की अदालत है, और मेरी अदालत में अपराधियों को ऊंचा बोलने की इजाज़त नहीं। – देवा, ज़िद्दी (1997)
28) तेरा गुनाहों का काला चिट्‌ठा मेरे पास है इंस्पेक्टर। तुझे कानून की ठेकेदारी का लाइसेंस मिले छह साल हुए, और उन छह सालों में तूने अपने लॉकअप में, पांच लोगों को बेहरमी से मौत के घाट उतार दिया। – देवा, ज़िद्दी (1997)
29) जिस वकील को मारने के लिए तूने अपने आदमी भेजे थे वो अशोक प्रधान.. देवा का बाप है। अगर दोबारा तूने ऐसी ग़लती की तो तेरा वो हश्र करूंगा कि तुझे अपने हाथों से अपनी ज़िंदगी फिसलती हुई नज़र आएगी। – ज़िद्दी (1997), देवा
Image result for देवा, ज़िद्दी (1997)30) लाल सिंह तुमने अपनी गुंडागर्दी की बदौलत ज़मीनों पर नाज़ायज क़ब्जे करके बहुत बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी कर दी हैं। तेरी भूख़ इतनी बढ़ गई है कि अब तू स्कूल और शमशान जैसी जगहों को भी हड़प लेना चाहता है। ये कलीना वाले प्लॉट के पेपर्स हैं लाल सिंह। आज के बाद इस ज़मीन पर तेरी कोई दख़लअंदाज़ी नहीं होगी। इन पेपर्स पर साइन कर, तेरी ज़िंदगी के पांच साल मैं बख़्श देता हूं। – देवा, ज़िद्दी (1997)
31) नहीं कुलकर्णी मैं तुमको यहां से जाने की इजाज़त नहीं दे सकता, मैं यहां ऊंचाई पर बैठा ज़रूर हूं, मगर इस कोर्ट के फैसले नीचे बैठे ये लोग करते हैं। – देवा, ज़िद्दी (1997)
32) कुलकर्णी तूने मेरे दो आदमी मारे, उनकी मौत तो मैं तुझे बख़्श भी सकता हूं मगर जिन तीन बेगुनाह लोगों को तूने मारा है उनका तो गुनाह की दुनिया से कोई वास्ता ही नहीं था। उन्हें मारकर तूने उनके परिवारों को भूख, गरीबी और तकलीफों में झोंक दिया। उनमें से एक अपने बूढ़े मां-बाप का इकलौता सहारा था। और जिस मज़दूर पर तूने गोलियां दाग़ी वो बारह लोगों का पेट भरता था। और अंसारी की विधवा की गोद में तीन महीने का बच्चा है। और ये सारे पाप तूने अपनी इस वर्दी पर एक और स्टार बढ़ाने के लिए किए हैं। – देवा, ज़िद्दी (1997)
33) मथुरादास जी, आप ख़ुश हैं कि आप घर जा रहे हैं। मगर ख़ुशी का जो ये बेहूदा नाच आप अपने भाइयों के सामने कर रहे हैं.. अच्छा नहीं लगता। आपकी छुट्‌टी मंज़ूर हुई है क्योंकि आपके घर में प्रॉब्लम है। दुनिया में किसे प्रॉब्लम नहीं? ज़िंदगी का दूसरा नाम ही प्रॉब्लम है। बताओ! अपने भाइयों में कोई ऐसा भी है जिसकी विधवा मां आंखों से देख नहीं सकती और उसका इकलौता बेटा रेगिस्तान की धूल में खो गया है। कोई ऐसा भी है जिसकी मां की अस्थियां इंतजार कर रही हैं कि उसका बेटा जंग जीतकर आएगा और उन्हें गंगा में बहा देगा। किसी का बूढ़ा बाप अपनी ज़िंदगी की आखिरी घड़ियां गिन रहा है और हर रोज़ मौत को ये कहकर टाल देता है कि मेरी चिता को आग देने वाला, दूर बॉर्डर पर बैठा है। अगर इन सब ने अपनी प्रॉब्लम्स का बहाना देकर छुट्‌टी ले ली तो ये जंग कैसे जीती जाएगी? बताओ! मथुरादास.. इससे पहले कि मैं तुझे गद्दार क़रार देकर गोली मार दूं.. भाग जा यहां से। – मेजर कुलदीप सिंह, बॉर्डर (1997)
34) जिसे आप पागलपन कह रहे हैं वो विश्वास से पैदा होता है। और मेरा विश्वास ये है कि ज़िंदगी और मौत वाहेगुरु के हाथ में है। और मेरा वाहेगुरु दुश्मन के साथ नहीं, मेरे साथ है। क्योंकि मैं सदा उसी की ओट में रहता हूं। – मेजर कुलदीप सिंह, बॉर्डर (1997)
Image result for मेजर कुलदीप सिंह, बॉर्डर (1997)35) ओए तू ग़ुलाम दस्तग़ीर है ना? लहौर दा मशहूर गुंडा! गंदे नाले दी पैदाइश! ऐ तां वक्त इ दस्सेगा कि मेरी अंतिम अरदास हूंदी ए या तेरा इना इलाही पढ़ेया जांदा ए। हुण तू इन्ना चेत्ते रख कि तू इक कदम वी बाहर निकलेया तां मैं तैन्नू ओही गंदे नाले दे विच्च मार सुट्‌टांगा जिस्सों तूं आया सी। ओए चोप्प क्यों हो गया! – मेजर कुलदीप सिंह, बॉर्डर (1997)
36) जवानो, दुश्मन सामने खड़ा है। हम 120 हैं, वो पूरे टैंक रेजीमेंट के साथ है। कमांड ने हमें पोस्ट छोड़कर पीछे हट जाने के लिए कहा है। मगर फिर भी आखिरी फैसला मुझ पर छोडा है। और मैंने फैसला ये किया है कि मैं मेजर कुलदीप सिंह, अपनी पोस्ट छोड़कर नहीं जाऊंगा। अब तुम लोगों का फैसला मैं तुम पर छोड़ता हूं। जो लोग ये पोस्ट छोड़कर जाना चाहते हैं, जा सकते हैं। – मेजर कुलदीप सिंह, बॉर्डर (1997)
37) भैरों सिंह, आज मरने की बात की है, दोबारा मत करना। दुनिया की तारीख़ शाहिद है कि मरकर किसी ने लड़ाई नहीं जीती। लड़ाई जीती जाती है दुश्मन को ख़तम करके। – मेजर कुलदीप सिंह, बॉर्डर (1997)
Related image38) अशरफ अली! आपका पाकिस्तान ज़िंदाबाद है, इससे हमें कोई ऐतराज़ नहीं लेकिन हमारा हिंदुस्तान ज़िंदाबाद है, ज़िंदाबाद था और ज़िंदाबाद रहेगा! बस बहुत हो गया। – तारा सिंह, गदर: एक प्रेम कथा (2001)
39) किन हिंदुस्तानियों को गोली से उड़ाएंगे आप लोग, हम हिंदुस्तानियों की वजह से आप लोगों का वजूद है। दुनिया जानती है कि बंटवारे के वक्त हम लोगों ने आप लोगों को 65 करोड़ रुपये दिए थे तब जाकर आपके छत पर तरपाल आई थी। बरसात से बचने की हैसियत नहीं और गोलीबारी की बात कर रहे हैं आप लोग! – तारा सिंह, गदर: एक प्रेम कथा (2001)
40) बाप बनकर बेटी को विदा कर दीजिए, इसी में सबकी भलाई है, वरना अगर आज ये जट बिगड़ गया तो सैकड़ों को ले मरेगा। – तारा सिंह, गदर: एक प्रेम कथा (2001)
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