जानिए इस साल के पाँच भारतीय अविष्कार, जिन्होंने दुनिया में लहराया परचम

इस साल 2018 में भारतीय वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों ने नैनोटेक्नोलॉजी से लेकर अंतरिक्ष मौसम विज्ञान तक विविध क्षेत्रों में हो रहे वैज्ञानिक विकास, नई तकनीकों और उन्नत प्रौद्योगिकियों से जुड़ी खबरें लगभग पूरे साल सुर्खियां बनती रही हैं। तो चलिए जानते है इस साल के वो पांच भारतीय अविष्कार जिनका लोहा दुनिया मान रही है।
किसानों को जहरीले कीटनाशकों से बचाने वाला जैल
इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल बायोलॉजी ऐंड रीजनरेटिव मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने त्वचा पर लगाने वाला “पॉली-ऑक्सीम” नामक एक सुरक्षात्मक जैल बनाया है, जो जहरीले रसायनों को ऐसे सुरक्षित पदार्थों में बदल देता है, जिससे वे मस्तिष्क और फेफड़ों जैसे अंगों में गहराई तक नहीं पहुंच पाते हैं।
Image result for किसानों को जहरीले कीटनाशकों से बचाने वाला जैलउत्कृष्ट तकनीक से बना दुनिया का सबसे पतला पदार्थ
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने नैनो तकनीक की मदद से एक ऐसा पतला पदार्थ बनाया है, जो कागज के एक पन्ने से भी एक लाख गुना पतला है। उन्होंने मैग्नीशियम डाइबोराइड नामक बोरॉन यौगिक द्वारा सिर्फ एक नैनोमीटर (मनुष्य के बाल की चौड़ाई लगभग 80,000 नैनोमीटर होती है) मोटाई वाला एक द्विआयामी पदार्थ तैयार किया है। इसे दुनिया का सबसे पतला पदार्थ कहा जा सकता है।
केले के जीनोम का जीन संशोधन
राष्ट्रीय कृषि-खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, मोहाली के शोधकर्ताओं ने जीन संशोधन की क्रिस्पर/सीएएस9 तकनीक की मदद से केले के जीनोम का संशोधन किया है। भारत में किसी भी फल वाली फसल पर किया गया अपनी तरह का यह पहला शोध है। सकल उत्पादन मूल्य के आधार पर गेहूं, चावल और मक्का के बाद केला चौथी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल मानी जाती है।
जीका, डेंगू, जापानी एन्सेफ्लाइटिस और चिकनगुनिया से निपटने के लिए की गईं खोजें
हरियाणा के मानेसर में स्थित राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र (एनबीआरसी) के वैज्ञानिकों ने शिशुओं में माइक्रोसिफेली या छोटे सिर होने के लिए जिम्मेदार जीका वायरस की कोशिकीय और आणविक प्रक्रियाओं का पता लगाया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जीका वायरस के आवरण में मौजूद प्रोटीन मनुष्य की तंत्रिका स्टेम कोशिकाओं की वृद्धि दर को प्रभावित करता है और दोषपूर्ण तंत्रिकाओं के विकास को बढ़ावा देता है।
Image result for केले के जीनोम का जीन संशोधनतपेदिक की शीघ्र पहचान करने वाली परीक्षण विधि
ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, फरीदाबाद और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने फेफड़ों और उनके आसपास की झिल्ली में क्षयरोग संक्रमण के परीक्षण के लिए अत्यधिक संवेदनशील, अधिक प्रभावी और तेज विधियां विकसित की हैं। बलगम के नमूनों में जीवाणु प्रोटीन का पता लगाने के लिए एंटीबॉडी आधारित वर्तमान विधियों के विपरीत इन नयी विधियों में बलगम में जीवाणु प्रोटीन का पता लगाने के लिए एपटामर लिंक्ड इमोबिलाइज्ड सॉर्बेंट एसे (एलिसा) और इलेक्ट्रोकेमिकल सेंसर (ईसीएस) का उपयोग होता है।
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