जानिए उत्तर प्रदेश के गांव को क्यों कहा जाता है- ‘अफसरों का गांव’

43
भारत में ज्यादातर लोगों के लिए सरकारी नौकरी का लगना किसी सपने के सच होने जैसा होता है। और तो और सरकारी नौकरी जब आईएएस और आईपीएस के स्तर की हो तो क्या ही कहने। क्योंकि इस स्तर की सरकारी नौकरी के लिए हर साल कोशिश तो लाखों लोग करते हैं लेकिन सफलता चुनिंदा लोगों के हाथ ही लगती है। ऐसे में अगर हम आपको बताए कि भारत में एक ऐसा गांव भी है जहां हर एक घर में एक आईएएस या फिर आईपीएस अफसर है। जी हां, भारत का यह अनोखा गांव उत्तर प्रदेश राज्य के जौनपुर जिले में स्थित है। और गांव का नाम है माधोपट्टी।
इस गांव को आसपास के गांव ‘अफसरों वाला गांव’ के नाम से जानते हैं। कहा जाता है कि इस गाँव में सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी ही जन्म लेते हैं। पूरे जिले में इसे अफ़सरों वाला गाँव कहते हैं। इस गाँव में महज 75 घर हैं, लेकिन यहाँ के 47 आईएएस अधिकारी उत्तर प्रदेश समेत दूसरे राज्यों में सेवाएँ दे रहे हैं। अफ़सरों वाला गाँव कहने पर यहां के लोग ख़ुशी से फूले नहीं समाते हैं। माधोपट्टी के डॉ. सजल सिंह बताते हैं, “ब्रिटिश हुकूमत में मुर्तजा हुसैन के कमिश्नर बनने के बाद गाँव के युवाओं को प्रेरणास्त्रोत मिल गया। उन्होंने गाँव में जो शिक्षा की अलख जगाई, वह आज पूरे देश में नज़र आती है।”
जानकारी के मुताबिक, साल 1914 में पहली बार इस गाँव के युवक मुस्तफा हुसैन (जाने-माने शायर वामिक़ जौनपुरी के पिता) पीसीएस में चयनित हुए थे। इसके बाद 1952 में इन्दू प्रकाश सिंह का आईएएस की 13वीं रैंक में चयन हुआ। इन्दू प्रकाश के चयन के बाद गाँव के युवाओं में आईएएस-पीसीएस के लिए जैसे होड़ मच गई। इन्दू प्रकाश सिंह फ्रांस सहित कई देशों में भारत के राजदूत भी रहे। इंदू प्रकाश के बाद गाँव के ही चार सगे भाइयों ने आईएएस बनकर रिकॉर्ड कायम किया। वर्ष 1955 में देश की सर्वश्रेष्ठ परीक्षा पास करने के बाद विनय सिंह आगे चलकर बिहार के प्रमुख सचिव बने। तो वर्ष 1964 में इनके दो सगे भाई छत्रपाल सिंह और अजय सिंह एक साथ आईएएस के लिए चुने गए।
जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित माधोपट्टी गाँव में रहने वालों की आबादी 800 के आसपास है। और 800 की आबादी वाले इस गांव की खास बात हर घर के सामने खड़ी लाल और नीली बत्ती वाली गाड़ी। वैसे इस गाँव की महिलाएँ भी पुरुषों से पीछे नहीं हैं। आशा सिंह 1980 में, ऊषा सिंह 1982 में, कुवंर चंद्रमौल सिंह 1983 में और उनकी पत्नी इन्दू सिंह 1983 में, अमिताभ 1994 में आईपीएएस बने तो उनकी पत्नी सरिता सिंह 1994 में आईपीएस चुनी गईं। इस गांव में साक्षरता की दर भी कहीं ज्यादा है। यहाँ हर घर में एक से अधिक लोग ग्रेजुएट हैं। पढ़ाई के मामले में महिलाएँ भी पीछे नहीं हैं। गाँव का औसतन लिटरेसी रेट 95% है, जबकि यूपी का औसतन लिटरेसी रेट 69.72% है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here