जाने कैसे एक अनपढ़ मां के संघर्ष बूते उसके बेटे ने खड़ा किया अस्पताल

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​कोलकाता के एक छोटे से गांव हँसपुकुर में रहकर सब्जी बेचने वाले 35 वर्षीय साधन चंद्र मिस्री की आज से 47 साल पहले एक छोटी सी बीमारी के चलते मौत हो गई थी। छोटी सी बीमारी के बावजूद मौत के आगोश में समा जाने का कारण था उचित चिकित्सा का उपलब्ध न होना। ऐसा होना लाजमी भी है उस देश मे जहां के डॉक्टरो की आबादी का 2% उस ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है जहां भारत की 68% आबादी रहती है। मरने के बाद साधन चंद्र मिस्त्री अपने पीछे 23 वर्षीय निरक्षर पत्नी सुभाषिनी और चार बच्चे छोड़ गए। चार बच्चे भी ऐसे की सबसे छोटे बच्चे की उम्र उस समय चार साल की थी और सबसे बड़े बच्चे की आठ साल।

कुल मिलाकर यह एक ऐसा समय था जब पति की मौत के बाद चार छोटे बच्चों की विधवा निरक्षर मां को अपनों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी। लेकिन उनका कोई अपना उस दौरान अपनापन दिखाने के लिए सामने नही आया। नतीजतन पति की मृत्यु के एक महीने के भीतर सुभाषिनी को घर चलाने और चार बच्चों का पेट भरने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा। घर के बाहर कमाने के लिए कदम रखने का कारण क्या था? पति की मृत्यु। पति की मृत्यु के लिए जिम्मेदार कौन था? गांव में स्वास्थ सुविधाओं का अभाव। बस इतना समझने की देर भर थी कि उस दिन सुभाषिनी ने कसम खाई कि वह एक दिन अपने गांव में बेहतर सुविधाओ से संपन्न अस्पताल बनाएगी। ताकि जिन मामूली कारणों से उसके पति की मृत्यु हुई और तत्पश्चात उसे और उसके बच्चों को यह सब भोगना पड़ रहा हैं, बाकियों को ऐसे नरक दिनों का सामना न करना पड़े।

सपने जब बड़े हो और खास कर देखे छोटो के द्वारा जाए तो हंसी छूट ही जाती। सुभाषिनी के मामले में भी ऐसा ही हुआ। शुरू में उसकी अस्पताल बनाने की प्रतिज्ञा पर लोगो की प्रतिक्रिया उसका मजाक उड़ाने तक ही सीमित रही। सुभाषिनी के सपनों पर हंसने के पीछे का कारण यह था कि वह बेहद गरीब और निरक्षर थी। अनपढ़ होने के चलते सब्जी बेचने के शुरुआती दिनों में उसे पैसे गिनने तक में दिक्कत होती थी। मजाक उड़ाने वाले यह कहकर तंज कसा करते थे कि जो महिला अपने घर की ठीक से मरम्मत नही कर पा रही है, वो अस्पताल क्या बना पाएगी। वो भी ऐसा वैसा नही बल्कि सारी सुविधाओं से संपन्न अस्पताल। लेकिन इन सबका सुभाषिनी के संकल्प पर रत्ती भर भी असर नही हुआ और वह अपने सपनों को साकार करने की धुन में लगी रही।

उसके प्रयास परिणाम में तब्दील भी होने लगे। वह एक नामी डॉक्टर को हर हफ्ते अपने गांव के लोगो का इलाज करने के लिए बुलाने में सफल रही। उस डॉक्टर के द्वारा हर हफ्ते आर्थिक खर्चे के चलते इलाज कराने में असमर्थ रहे वाले गांव के लोगो का इलाज किया जाने लगा। इस तरह सुभाषिनी ने जल्द ही अपने सपनों के महल के लिए एक मजबूत नींव तैयार कर ली। इसी बीच सुभाषिनी के जीवन का संघर्ष और परिवार दोनों साथ-साथ आगे बढ़ते रहे। समय के साथ उसकी दोनों बेटियों की शादी हो गई और सबसे बड़ा वाला बेटा खेत मे काम करने लगा। लेकिन अपने दूसरे नंबर के बेटे अजय मिस्त्री को उसने अपने सपनों का सारथी बनाना तय किया।

अजय मिस्त्री ने भी अपनी मां की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए माध्यमिक शिक्षा के साथ ऑल इंडिया मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट पास कर लिया। इसके बाद वह जर्मन स्कॉलरशिप की मदद से मेडिसिन की पढ़ाई करने के लिए कलकत्ता मेडिकल कॉलेज चला गया। अजय ने बचपन से अपनी मां को अपने सपने को साकार करने के लिए लगातार संघर्ष करते हुए देखा था। इसलिए वह अपने स्तर पर अपनी मां के सपने को हकीकत में तब्दील करने के प्रयास करने लगा। कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में उसने अपने स्तर पर लोगो से मदद मांग कर करीब 80 हजार रुपये जमा कर लिए। उन्हीं 80 हजार रुपये की मदद से आखिरकार उसकी मां की वह प्रतिज्ञा धरातल पर उतरी। जो उसने अपने पति की मृत्यु के पश्चात ली थी।

कुछ इस तरह 1993 में ‘Humanity Hospital’ की नींव पड़ी। इसके बाद एक साल बीतते बीतते अस्पताल को मिलने वाला फंड बढ़ते बढ़ते दस गुना हो गया। नतीजा यह रहा कि उन पैसों से अस्पताल की पहली इमारत बनकर खड़ी हो गई। आगे जैसे-जैसे मदद के रुप मे प्राप्त धनराशि बढ़ती रही। वैसे-वैसे ह्यूमैनिटी अस्पताल का दायरा बढ़ता रहा। आज की तारीख में 45 सामान्य बेड, 10 ICU बेड वाले इस अस्पताल में रोजाना हजारो ग़रीबो का इलाज मुफ्त में हो रहा है। वो लोग जो आर्थिक रूप से स्वास्थ्य का खर्चा उठाने के असमर्थ है उनका यहां निःशुल्क इलाज किया जाता है। डॉक्टर अजय मिस्त्री का कहना है,”आज उनकी मां गर्व के साथ यह कह सकती है कि आज से सालों पर उन्होंने जो सपना देखा था, उसे पूरा करने की प्रतिज्ञा ली थी। आज उसे उन्होंने पूरा कर दिया।जरूरमंद की मदद करने का भाव डॉक्टर अजय मिस्त्री को बचपन मे ही अपनी मां से सीखने को मिल गया था। यही कारण रहा कि जब भी उन्होंने किसी को मदद की गुहार लगाते देखा। फौरन उसकी मदद के लिए तत्पर हो गए। जब 2009 में सुंदरबन के तट पर एक भयानक तूफान ने दस्तक दी। तब डॉक्टर अजय मिस्त्री तुरंत अपनी एक मेडिकल टीम के साथ प्रभावित क्षेत्र में पीड़ितों की मदद के लिए दौड़ पड़े। शांतिगाची इनमे से ही एक ऐसा सुदूर इलाका था जहां के लोग एक लंबे अरसे से स्वास्थ से जुड़ी उचित सुविधाओं के लाभ से वंचित थे।

डॉक्टर अजय मिस्त्री के अनुसार इस गांव के लोगो के द्वारा इनके गांव में अस्पताल बनाने की मांग जोर शोर से उठाई जाने लगी। गांव वाले चाहते थे कि उनके यहां एक ऐसा अस्पताल खुले जो मूलभूत सुविधाओं से सपन्न हो और जहां आर्थिक रूप से असमर्थ आदमी भी अपना इलाज करा पाए। डॉक्टर अजय मिस्त्री के इतिहास को देखते हुए लहरीपुल ग्राम पंचायत के उप प्रधान चिरंजीव मंडल और उनकी पत्नी श्रीमती करुणा मंडल द्वारा अस्पताल के लिए आवश्यक जमीन दान में दी गई। इसके बाद प्राथमिक स्तर पर बांबू और प्लास्टिक के सहारे बने काम चलाऊ क्लिनिक के जरिए डॉक्टर अजय स्थानीय लोगों का इलाज करने लगे। समय के साथ साथ यहां भी अस्पताल के दायरे और सुविधाओं में बढोत्तरी हुई। इतना ही नही तो अजय मिस्त्री ने स्थानीय लोगो को स्वास्थ से जुड़ी मूलभूत शिक्षा देना भी शुरू कर दिया। इससे हुआ यह कि जो लोग तक खुद किसी न किसी बीमारी से समस्याग्रस्त से वह अब खुद दूसरों का इलाज करने लगे।

डॉक्टर अजय का कहना है,”आजादी के 68 साल बीत जाने बावजूद इन इलाकों के लोगो ने अब जाकर यहां अस्पताल खुल जाने के बाद आजादी का असल अहसास किया है। वरना अब तक ना तो इनकी सरकार ने सुध ली थी और ना किसी गैर सरकारी संस्थान ने ही इनके बेहतरी के लिए कली कदम उठाने को ज़हमत तक उठाई। ये लोग सोचते थे कि इनका जीवन यूँ ही हमेशा की तरह स्वास्थ सुविधाओं की कमी के चलते असमय काल का ग्रास बन जाएगा। लेकिन मेरी मां का सपना ऐसे ही लोगो के जीवन का उद्धार करना था।”

आज एक सब्जी बेचने वाली मां के डॉक्टर बेटे के चमत्कार का ही नतीजा है कि सुंदरबन के जिन लोगो को पहले किसी भी मेडिकल इमरजेंसी में अपने घर से 150 किलोमीटर दूर गोसाबा जाना पड़ता था। अब उन्हें स्वास्थ से संबंधित सारी सुविधाएं अपने इलाके में ही उपलब्ध हो जाती है। डॉक्टर अजय मिस्त्री द्वारा सुंदरबन के शांतिगाची इलाके में स्थापित यह अस्पताल 20 बिस्तर वाला है। इसके साथ ही यहां सोनोग्राफी, एक्स-रे मशीन, स्कैनर के साथ साथ स्टेट ऑफ दी आर्ट ऑपरेशन थेटर की सुविधाएं भी है। हाल ही में दानदाताओं द्वारा एंबुलेंस की गाड़ी मुहैया कराए जाने से अब आपातकाल में लोगो को घर तक से ले जाया जा सकता है। इस सुदूर इलाके में जल्द ही यहां काम करने वाले डॉक्टर और नर्स के लिए घर बनाने की भी पहल चल रही है।

डॉक्टर अजय मिस्री के अनुसार वह रोजाना नई-नई मुसीबतों का सामना करते रहते है। लेकिन जो सबसे मुश्किल काम है, वो है अस्पताल को बिना किसी रुकावट के चलाते रहना। यातायात के साधनों का अभाव, पीने के साफ पानी की कमी, बिजली की अनुपलब्धता के साथ-साथ यहां का नम मौसम भी काम को और ज्यादा मुश्किल बना देता है। इतने सब कुछ के बावजूद डॉक्टर अजय मिस्त्री का कहना है कि जैसे-जैसे उनका जीवन आगे बढ़ते रहेगा वह अपने मदद का दायरा भी बढ़ाते रहेंगे। इस तरह वह अपनी मां की प्रतिज्ञा को हर रोज थोड़ा-थोड़ा पूरा करते रहेंगे।

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