पढ़िए जीडी अग्रवाल ने दम तोड़ने से पहले नरेंद्र मोदी उर्फ ‘चैंपियन ऑफ दी अर्थ’ को तीन खत के जरिए क्या कहा था

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गुरुवार को एक खबर ने भारत को गमगीन और शर्मसार दोनों एक साथ कर दिया। खबर यह थी कि अविरल गंगा के लिए 22 जून से आमरण अनशन कर रहे पर्यवारणविद जीडी अग्रवाल ने अनशन के 112वें दिन अपने प्राण त्याग दिए। 112 दिनों से अन्न और 2 दिनों से जल का भी त्याग करने वाले जीडी अग्रवाल की मेडिकल रिपोर्ट की माने तो जीकी मौत के हृदयाघात से हुई। लेकिन, अगर व्यवहारिक रूप से देखे तो जीडी अग्रवाल की मौत नहीं बल्कि हत्या हुई है और कातिल है हमारी सरकार।
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कदम उठाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से ‘चैंपियन ऑफ दी अर्थ’ का खिताब दिया गया। लेकिन विरोधाभास देखिए, उसी प्रधानमंत्री को जब जीडी अग्रवाल ने अविरल गंगा के लिए खत लिखकर मदद मांगी, तो उन्होंने एक भी खत का जवाब नहीं दिया। शायद यही कारण है कि कल जब जीडी अग्रवाल की 112 दिन तक उपवास के चलते मौत होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने घड़ियाली आंसू बहाने के लिए ट्वीट किया। तब सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग प्रधानमंत्री पर हमवालर हो गए और उन्हें तीखे सवाल करते हुए पूछने लगे कि उन्होंने जीडी अग्रवाल की चिट्ठियों का जवाब क्यों नहीं दिया।
जीडी अग्रवाल ने अविरल गंगा को लेकर एक नहीं बल्कि तीन बार खत लिखा था। लेकिन चैंपियन ऑफ दी अर्थ के कान पर जु तक नहीं रेंगा। जीडी अग्रवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहला खत उत्तरकाशी से 24 फरवरी 2018 को लिखा था। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से उनके अब तक के कार्यकाल को लेकर शिकायत करते हुए 2014 के चुनावों के गंगा को लेकर उनके द्वारा किए गए वायदों और दिखावटी चिंताओं की तरफ उनका ध्यान आकर्षित किया।

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पहला पत्र-
भाई, प्रधानमंत्री तो तुम बाद में बने, मां गंगाजी के बेटो में मैं तुमसे 18 वर्ष बड़ा हूं. 2014 के लोकसभा चुनाव तक तो तुम भी स्वयं मां गंगाजी के समझदार, लाडले और मां के प्रति समर्पित बेटा होने की बात करते थे. पर वह चुनाव मां के आशीर्वाद और प्रभु राम की कृपा से जीतकर अब तो तुम मां के कुछ लालची, विलासिता-प्रिय बेटे-बेटियों के समूह में फंस गए हो और उन नालायकों की विलासिता के साधन (जैसे अधिक बिजली) जुटाने के लिए, जिसे तुम लोग विकास कहते हो, कभी जल मार्ग के नाम से बूढ़ी मां को बोझा ढोने वाला खच्चर बना डालना चाहते हो, कभी ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने के लिए हल का, गाड़ी का या कोल्हू जैसी मशीनों का बैल. मां के शरीर का ढेर सारा रक्त तो ढेर सारे भूखे बेटे-बेटियों की फौज को पालने में ही चला जाता है जिन नालायकों की भूख ही नहीं मिटती और जिन्हें मां के गिरते स्वास्थ्य का जरा भी ध्यान नहीं.
मां के रक्त के बल पर ही सूरमा बने तुम्हारी चाण्डाल चौकड़ी के कई सदस्यों की नज़र तो हर समय जैसे मां के बचे खुचे रक्त को चूस लेने पर ही लगी रहती है. मां जीवीत रहे या भले ही मर जाए. तुम्हारे संविधान द्वारा घोषित इन बालिगों को तो जैसे मां को मां नहीं, अपनी संपत्ति मानने का अधिकार मिल गया है. समझदार बच्चे तो नाबालिग या छोटे रहने पर भी मातृ-ऋण उतारने की, मां को स्वस्थ-सुखी रखने की ही सोचते हैं और अपने नासमझ भाई-बहनों को समाझाते भी हैं. वे कुछ नासमझ, नालायक, स्वार्थी भाई-बहनों के स्वार्थ परक हित-साधन के लिए मां पर बोझा-लादने, उसे हल, कोल्हू या मशीनों में जोतने की तो सोच भी नहीं सकते खूच चूसने की तो बात ही दूर है.
तुम्हारा अग्रज होने, तुम से विद्या-बुद्धि में भी बड़ा होने और सबसे ऊपर मां गंगा जी के स्वास्थ्य-सुख-प्रसन्नता के लिए सब कुछ दांव पर लगा देने के लिए तैयार होने में तुम से आगे होने के कारण गंगा जी से संबंधित विषयों में तुम्हें समाझाने का, तुम्हें निर्देश देने का जो मेरा हक बनता है वह मां की ढेर सारी मनौतियों और कुछ अपने भाग्य और साथ में लोक-लुभावनी चालाकियों के बल पर तुम्हारे सिंहासनारूढ़ हो जाने से कम नहीं हो जाता है. उसी हक से मैं तुम से अपनी निम्न अपेक्षाएं सामने रख रहा हूं.
लेकिन खुद को गंगा पुत्र कहने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने गंगा मैया को बचाने के लिए लिखे गए इस खत की तरफ ध्यान नहीं दिया। जिसके बाद जीडी अग्रवाल ने हरिद्वार के कनखाल से 13 जून 2018 को गंगा नदी को बचाने के मसले पर सोई सरकार को जगाने के लिए दोबारा एक खत लिखा। इस खत में पहके तो जीडी अग्रवाल ने पहले खत का कोई जवाब न मिलने की शिकायत दर्ज कराई और फिर अविरल गंगा को लेकर अपनी मांगों को खत में एक बार फिर दोहराया।
जब 13 जून को लिखे गए दूसरे खत का भी जवाब नहीं आया, तो थक हार कर जीडी अग्रवाल को 22 जून से आमरण अनशन पर बैठना पड़ा। इस दौरान उनसे मिलने के लिए उमा भारती आई और नितिन गडकरी ने उनसे बात की। लेकिन दोनों में से कोई उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाया। नतीज़तन एक बार फिर जीडी अग्रवाल ने 5 अगस्त के दिन अनशन स्थल से ही प्रधानमंत्री मोदी को अविरल गंगा के संबंध तीसरा खत लिया। इसमें उन्होंने अपने अनशन का उद्देश्य बताते हुए संयुक्त राष्ट्र के चैंपियन ऑफ दी अर्थ के सामने अपनी चार मांगे रखी। लेकिन नतीजा इस बार भी ढांक के तीन पात ही निकला। नतीजतन अविरल गंगा के लिए 22 जून से उपवास पर बैठे पर्यवारणविद जीडी अग्रवाल की 11 अक्टूबर को मौत हो गई।
Image result for modi and gd agrawalतीसरा पत्र
आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
मैंने आपको गंगाजी के संबंध में कई पत्र लिखे, लेकिन मुझे उनका कोई जवाब नहीं मिला. मुझे यह विश्वास था कि आप प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगाजी की चिंता करेंगे, क्योंकि आपने स्वयं बनारस में 2014 के चुनाव में यह कहा था कि मुझे मां गंगा ने बनारस बुलाया है, उस समय मुझे विश्वास हो गया था कि आप शायद गंगाजी के लिए कुछ करेंगे, इसलिए मैं लगभग साढ़े चार वर्ष शान्ति से प्रतीक्षा करता रहा.
आपको पता होगा ही कि मैंने गंगाजी के लिए पहले भी अनशन किए हैं तथा मेरे आग्रह को स्वीकार करते हुए मनमोहन सिंह जी ने लोहारी नागपाला जैसे बड़े प्रोजेक्ट रद्द कर दिए थे जो कि 90 प्रतिशत बन चुके थे तथा जिसमें सरकार को हजारों करोड़ की क्षति उठानी पड़ी थी, लेकिन गंगाजी के लिए मनमोहन सिंह जी की सरकार ने यह कदम उठाया था.
इसके साथ ही इन्होंने भागीरथी जी के गंगोत्री जी से उत्तरकाशी तक का क्षेत्र इको-सेंसिटिव जोन घोषित करा दिया था जिससे गंगाजी को हानि पहुंच सकने वाले कार्य न हों. मेरी अपेक्षा यह थी कि आप इससे दो कदम आगे बढ़ेंगे तथा गंगाजी के लिए और विशेष प्रयास करेंगे क्योंकि आपने तो गंगा का मंत्रालय ही बना दिया था. लेकिन इन चार सालों में आपकी सरकार द्वारा जो कुछ भी हुआ उससे गंगाजी को कोई लाभ नहीं हुआ.
उसकी जगह कॉरपोरेट सेक्टर और व्यापारिक घरानों को ही लाभ दिखाई दे रहे हैं. अभी तक आपने गंगा से मुनाफा कमाने की ही बात सोची है. गंगाजी को आप कुछ दे नहीं रहे हैं. ऐसा आपकी सभी योजनाओं से लगता है. कहने को आप भले ही कहें कि अब हमें गंगाजी से कुछ लेना नहीं है, उन्हें देना ही है.
दिनांक 03.08.2018 को मुझसे केंद्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती जी मिलने आई थीं. उन्होंने नितिन गडकरी जी से मेरी फोन पर बात करवाई थी, किन्तु समाधान तो आपको करना है, इसलिए मैं सुश्री उमा भारती जी को कोई जवाब नहीं दे सका. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरी नीचे दी गई चार मांगों को, जो वही हैं जो मेरे आपको 13 जून 2018 को भेजे पत्र में थी, स्वीकार कर लीजिए, अन्यथा मैं गंगाजी के लिए उपवास करता हुआ आपनी जान दे दूंगा.
मुझे अपनी जान दे देने में कोई चिंता नहीं है, क्योंकि गंगाजी का काम मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है. मैं आईआईटी का प्रोफेसर रहा हूं तथा मैं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं गंगाजी से जुड़ी हुई सरकारी संस्थाओं में रहा हूं. उसी के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आपकी सरकार ने इन चार सालों में कोई भी सार्थक प्रयत्न गंगाजी को बचाने की दिशा में नहीं किया है. मेरा आपसे अनुरोध है कि मेरी इन चार मांगों को स्वीकार किया जाए. मैं आपको यह पत्र उमा भारती जी के माध्यम से भेज रहा हूं.
मेरी चार मांगे निम्न हैं…
1. गंगा जी के लिये गंगा-महासभा द्वारा प्रस्तावित अधिनियम ड्राफ्ट 2012 पर तुरन्त संसद द्वारा चर्चा कराकर पास कराना (इस ड्राफ्ट के प्रस्तावकों में मैं, एडवोकेट एम. सी. मेहता और डा. परितोष त्यागी शामिल थे ), ऐसा न हो सकने पर उस ड्राफ्ट के अध्याय–1 (धारा 1 से धारा 9) को राष्ट्रपति अध्यादेश द्वारा तुरन्त लागू और प्रभावी करना.
2. उपरोक्त के अन्तर्गत अलकनन्दा, धौलीगंगा, नन्दाकिनी, पिण्डर तथा मन्दाकिनी पर सभी निर्माणाधीन/प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना तुरन्त निरस्त करना और गंगाजी एवं गंगाजी की सहायक नदियों पर सभी प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं को भी निरस्त किया जाए.
3. उपरोक्त ड्राफ्ट अधिनियम की धारा 4 (डी) वन कटान तथा 4(एफ) खनन, 4 (जी) किसी भी प्रकार की खुदान पर पूर्ण रोक तुरंत लागू कराना, विशेष रुप से हरिद्वार कुंभ क्षेत्र में.
4. एक गंगा-भक्त परिषद का प्रोविजिनल (Provisional) गठन, (जून 2019 तक के लिए). इसमें आपके द्वारा नामांकित 20 सदस्य, जो गंगा जी और केवल गंगा जी के हित में काम करने की शपथ गंगा जी में खड़े होकर लें और गंगा से जुड़े सभी विषयों पर इसका मत निर्णायक माना जाए.
प्रभु आपको सदबुद्धि दें और अपने अच्छे बुरे सभी कामों का फल भी. मां गंगा जी की अवहेलना, उन्हें धोखा देने को किसी स्थिति में माफ न करें.
मेरे द्वारा आपको भेजे गए अपने पत्र दिनांक 13 जून 2018 का कोई उत्तर या प्रतिक्रिया न पाकर मैंने 22 जून 2018 से उपवास प्रारंभ कर दिया है. इसलिए शीघ्र आवश्यक कार्यवाही करने तथा धन्यवाद सहित।
~ रोशन ‘सास्तिक’

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