पढ़िए पंकज त्रिपाठी उर्फ़ ‘कालीन भईया’ के कामयाबी की करिश्माई कहानी

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सिनेमा में यह बात मायने नहीं रखती कि आप पर्दे पर कितने समय तक नजर आए। अहमियत तो इस बात होती है कि जितने भी समय तक आप पर्दे पर रहे, उतने समय में आप अपनी अदाकारी से दर्शकों पर कितना गहरा असर छोड़ पाने में सफल रहे। और बेहतर कलाकार होने के इस मापदंड पर हमारे कालीन भईया अपनी पहली फ़िल्म ‘रन’ में ही एकदम खरे उतरे गए थे। लेकिन हीरा बनने से पहले पंकज त्रिपाठी को भी हर हीरे की तरह संघर्ष की उस आग में जलना पड़ा, जिसके आंच की तपिश भर को आम लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते। वैसे अगर कर लेते, तो हर कोयला हीरा नहीं बन जाता।
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पंकज त्रिपाठी के जीवन के सफर की शुरुआत बिहार के एक ऐसे गांव से हुई जहां 10वीं कक्षा तक उन्हें बिजली के दर्शन नहीं हुए। जिस टीवी और सिनेमाघर पर आज पंकज त्रिपाठी को दुनिया देख रही है, उसे उन्होंने खुद 10वीं कक्षा तक कभी नहीं देखा था। लेकिन जब पंकज 9वीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब ही उनकी भाभी ने उनकी आंखों में उनके उज्ज्वल भविष्य को देख लिया था। और दावा किया था कि उनके देवर में कुछ बात है और वो एक न एक दिन जरूर अपना नाम रोशन करेंगे। पंकज त्रिपाठी ने अपना नाम कितना रोशन किया, इसका अंदाजा आज उनकी सफलता की चमक को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है।
Image result for pankaj tripathi mashanहालांकि, पंकज त्रिपाठी के इस सुनहरे आज के पीछे एक ऐसा अंधकारमय कल है, जिनसे उन्होंने धैर्य के साथ ना सिर्फ बहुत लंबी लड़ाई लड़ी बल्कि कुछ कर गुजरने और खुद को साबित करने की ज़िद के हथियार से उसे पराजित भी किया।
जिस पंकज त्रिपाठी से उनके पिता डॉक्टर बनने की उम्मीद पाल बैठे थे, उस पंकज त्रिपाठी ने पटना में ‘अंधा कुआं’ प्ले देखने के बाद एक्टर बनने की ठान ली थी। और अपने इस सपने के सच में तब्दील करने की प्रेरणा उन्हें बिहार की मिट्टी से निकल कर बॉलीवुड में गर्दा उड़ा रहे ‘मनोज वाजपेयी’ से मिली। इस बात को खुद पंकज त्रिपाठी भी कई बार स्वीकार कर चुके हैं कि अगर उनके सामने बिहार के बेतिया से निकलकर मुंबई में अपने काम से नाम कमा रहे मनोज वाजपेयी का उदाहरण नहीं होता, तो वह शायद ही एक्टर बनने का ख्वाब लेकर बिहार से मुंबई आने की हिम्मत कर पाते।
Related imageएक्टर बनने के लिए मुंबई जाने की बात तो दूर की कौड़ी थी। इससे पहले वह पटना में रहकर ही नौकरी और थियेटर के बीच दिन-रात की चक्की में खुद को दो साल तक पीसते रहें। क्योंकि अगर पैशन को पूरा करने के लिए थियेटर सीखना और करना जरूरी था, तो पेट भरने के लिए पैसों का इंतजाम भी करना था। और मुश्किल यह कि दोनों काम एक साथ करना था। जिसे पंकज त्रिपाठी ने बखूबी अंजाम भी दिया। 1995 से 2001 तक पटना में रहकर ही पंकज त्रिपाठी थियेटर में काम करते रहे और फिर 2001 में उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के लिए उड़ान भर दी। तब पंकज को शायद ही इस बात का आभास रहा हो कि यह उड़ान उनके जीवन को एक नई ऊंचाई देने जा रही थी।
Image result for chhoti ganga scene2001 से 2004 तक नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की आग में खुद को झोंक देने के बाद पंकज त्रिपाठी जैसा सोना जब वहां से कुंदन बनकर निकला, तब उन्हें अभिषेक बच्चन स्टारर ‘रन’ फ़िल्म में एक छोटी-सी भूमिका मिली। जिसमें वह छोटी गंगा बोलकर विजय राज को नाले में कूदा देते हैं। इस दृश्य में पंकज ने लोगों को ऐसा हँसाया की लोग आज भी उस दृश्य को याद कर पेट पकड़कर हँसने लगते हैं। ऐसी अद्भुत अभियन क्षमता होने के बावजूद करियर के शुरुआती दिनों में पंकज त्रिपाठी को पर्दे पर छोटी-मोटी भूमिकाओं से ही काम चलाना पड़ा। अपने इन्हीं अतीत के पन्नों को पलटने पर पंकज त्रिपाठी इस बात पर अफसोस भी जताते है कि मिठाई वाला बनकर सबको हँसा देने और डाकू बनकर सबको रुला देने की काबिलियत होने के बावजूद करियर के शुरुआती दिनों में उनके पास करने के लिए ज्यादा काम नहीं था।
Image result for pankaj tripathi anarkali of aaraअपने संघर्ष के बारे में बताते हुए पंकज त्रिपाठी कहते है कि जिस देश में रेलवे का कंफर्म टिकट मिलना मुश्किल है, उस देश में किसी भी चीज़ को पाने में उतनी ही मुश्किलें है। और वह भी उन सभी मुश्किलें से पार पाकर ही सफलता के इस पार पहुंच पाए है। क्योंकि संघर्ष के दिनों में कई ऐसे मौके आए, जब लगा कि सब छोड़छाड़ कर मुंबई से गाँव लौट जाए। ऐसा ही किस्सा उनके साथ तब हुआ जब किसी सीन पर 3 से 4 रीटेक लेने पर असिस्टेंट डायरेक्टर ने उन्हें सबके सामने गालिया दे दी थी। तब उन्हें ख्याल आया कि असिस्टेंट डायरेक्टर का सिर फोड़कर गांव चल दिया जाए। लेकिन, उनके एक सीनियर एक्टर ने उन्हें समझाया कि गालियों से बौखलाओ नहीं बल्कि इन्हें इकट्ठा करों और काम पर ध्यान लगाओ। भगवान भला करे उस सीनियर एक्टर का जिसने असिस्टेंट डायरेक्टर का सिर और पंकज त्रिपाठी का करियर दोनों एक साथ बचा लिया।
Related imageपंकज ने सीनियर की बात मानी और मंजिल की तरफ एक-एक कदम बढ़ाते रहे। और फिर इसी सफर के एक मोड़ पर उनकी मुलाकात अनुराग कश्यप से हो गई, जिसके बाद पंकज त्रिपाठी की दुनिया 360 डिग्री गोल घूम गई। क्योंकि अनुराग कश्यप ने पंकज त्रिपाठी को अपनी फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के सेंकड पार्ट में ‘सुल्तान कुरैशी’ का रोल ऑफर कर दिया। इस फ़िल्म और सुल्तान कुरेशी के रोल ने भारतीय दर्शकों को इतना ज्यादा प्रभावित किया कि आज भी सोशल मीडिया पर फ़िल्म और सुल्तान के कैरेक्टर को लेकर चर्चा होती रहती है। सुलतान कुरैशी का रोल मिलने के बाद एक्टिंग की दुनिया मे पंकज सच में सुल्तान बनते चले गए।
Image result for pankaj tripathi newtonगैंग्स ऑफ वासेपुर के अलावा मशान, मांझी द माउंटेन मैन, फुकरे, गुड़गांव, अनारकली ऑफ आरा, न्यूटन जैसी फिल्मों में भी उनके काम को बहुत ज्यादा सराहा गया। न्यूटन में उनके काम को देखकर महेश भट्ट इतने गदगद हो गए कि उन्होंने पंकज त्रिपाठी को बाकायदा फोन कर कहा कि अगर वह उनके सामने होते तो उन्हें अपने गले से लगा लेते।
फ़िल्म से शुरू हुआ सफर जब इस साल के अंत में वेब सीरीज़ तक पहुंचा, तब अमेज़ॉन प्राइम पर रिलीज़ हुई क्राइम वेब सीरीज़ ‘मिर्ज़ापुर’ ने पंकज त्रिपाठी ने कालीन भईया का दमदार किरदार निभाकर लोकप्रियता के मामले में अपने ‘सुलतान’ वाले कैरेक्टर को भी पीछे पछाड़ दिया। और किसी भी व्यक्ति के सफलता की सबसे बड़ी निशानी यही होती है कि उसकी आज की सफलता के सामने उसके बीते कल की सफलता कमतर नजर आने लगे। वतर्मान का भूत से बेहतर होना ही एक सुनहरे भविष्य की निशानी है। और पंकज त्रिपाठी के भविष्य में तो इस साल सुपर 30, कागज और मिलन टॉकीज जैसी फिल्में हैं।
रोशन ‘सास्तिक’

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