बम और बारूद की गलियों से निकले अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के बनने की कहानी

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अफगानिस्तान की टीम 2009 से 2018 के दरम्यान 9 सालों के अंतराल में 106 एकदिवसीय मैच खेल चुकी है और इन 106 मैचों में से उसे 55 में जीत और 48 में हार नसीब हुई है। क्रिकेट के सबसे छोटे फॉर्मेट टी-ट्वेंटी में 2010 से 2018 तक अफगानिस्तान ने कुल 68 मुक़ाबले खेले और इनमें से 46 में उसे जीत हासिल हुई और सिर्फ 22 बार ही उसे हार का मुँह देखना पड़ा। इसके अतिरिक्त पिछले साल ही अफगानिस्तान की टीम को पहली बार टेस्ट क्रिकेट खेलने का मौका मिला और वो भी भारत जैसी मजबूत टीम के साथ। इस मैच में अफगानिस्तान हार भले गई हो लेकिन जितने कम समय में उसने टेस्ट क्रिकेट खेलने वाली 12वीं टीम का दर्जा हासिल किया, उसके अतीत को देखते हुए उसका यह सफर भी अपने आप में किसी जादू से कम नहीं है।
Related image10 साल पहले ही अपना अतंर्राष्ट्रीय क्रिकेट सफर शुरू करने वाली अफगानिस्तान क्रिकेट टीम की सफलता का सफर बम और बारूद की गलियों से होकर गुजरा है। आज यह टीम जिस मुकाम पर खड़ी है, उसे उस स्थिति में लाने के लिए जिन खिलाड़ियों ने अहम भूमिका निभाई, उन्हें ना जाने कितनी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। अफगानिस्तान के खिलाड़ियों के संघर्ष के बारे में यह कहा जाता है कि उनकी टीम में 11 महेंद्र सिंह धोनी है। यानी क्रिकेटर बनने के लिए जितना संघर्ष महेंद्र सिंह धोनी ने किया, उतना संघर्ष या कहें कि उससे कहीं ज्यादा संघर्ष अफगानिस्तान के हर खिलाड़ी ने अपने जीवन में क्रिकेटर बनने के लिए किया है।
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क्योंकि आज कामयाबी के नए कीर्तिमान स्थापित कर शोहरत की बुलंदियों को छू रहे अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के राशिद खान और मोहम्मद शहजाद जैसे सभी खिलाड़ियों ने अपने अतीत आंगन में बम और बारूद का धुआँ ही उड़ता देखा है।
Related imageअफगानिस्तान में तालिबान, रूस और अमेरिका के बीच हुए सत्ता संघर्ष के चलते यहां के आम लोगों का जीवन तबाह हो गया था। आज अफगानिस्तान की टीम में शामिल होकर वैश्विक स्तर पर चौके-छक्के उड़ाने और विकेट की गिल्लियां बिखरने वाले ज्यादातर खिलाड़ियों का बचपन पाकिस्तान से सटे रिफ्यूजी कैंप में आतंक की धूल फांकते हुए ही बीता है। अभाव और असुविधा के बीच इन्हें हर पल हर वक्त रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा जैसी मूलभूत चीज़ो की आवश्यकता कम और पता नहीं कब कौन-सी गोली सीना छलनी कर दे या फिर कब कौन-सा बम शरीर के टुकड़े कर दे का खौफ़ ज्यादा रहता था। अमेरिका, रूस और तालिबान इन तीनों के बीच जारी सत्ता के खूनी-संघर्ष के बीच अफगानिस्तान क्रिकेट के पितामह कहे जाने वाले ‘ताज मलूक’ के अथक प्रयासों के फलस्वरूप साल 1995 में अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड की स्थापना हुई।
Image result for youth playing cricket in peshawar refugee campयह तो हम सब जानते हैं कि क्रिकेट उन्हीं देशों में फला-फूला जिन देशों में इंग्लैंड ने अपना उपनिवेश स्थापित किया था। चूंकि, भारत और पाकिस्तान की तुलना में अंग्रेज़ो की अफगानिस्तान में पकड़ उतनी ज्यादा मजबूत नहीं थी। यही वजह रही कि यहां पर क्रिकेट भी कभी अपनी मजबूत जगह नहीं बना पाया। अफगानिस्तान को तो क्रिकेट का चस्का लगा अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान को देखकर। और क्रिकेट को लेकर पख़्तून के लोगों का प्यार तब अपने परवान चढ़ा, जब 1992 में पाकिस्तान को वर्ल्डकप में मिली जीत और उस जीत के बाद पाकिस्तान में लोगों की खुशी को इन्होंने बेहद करीब से देखा।
Related imageजब सोवियत सेनाओं का अफगानिस्तान में आगमन हुआ, तब अफगानिस्तान के दक्षिणी और पाकिस्तान से सटे पश्चिमी इलाकों से बड़े पैमाने पर पख़्तून लोगों ने पेशावर की तरफ पलायन किया। अफगानिस्तान के युद्धग्रस्त माहौल के चलते रिफ्यूजी कैंप में रहने वाले पख़्तून लड़कों ने ही क्रिकेट खेलना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे यह खेल उनके लिए ‘सिर्फ खेल’ से कहीं बढ़कर हो गया। इस इलाके में क्रिकेट के पैर पसारने का एक अहम कारण यह भी रहा कि फुटबॉल जैसे खेलों को विदेशी बताकर इससे घृणा करने वाले तालिबानी लड़ाकों ने क्रिकेट को अपनी मौन सहमति दे रखी थी। 1995 में अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड की नींव तो रख दी गई, लेकिन अफगानिस्तान की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम तैयार करना इतना आसान काम नहीं था।
Related imageअफगानिस्तान की राष्ट्रीय टीम बनाने के लिए ताज मलूक अपने तीन भाईयों के साथ लगातर अलग-अलग रिफ्यूजी कैंप्स के चक्कर लगाते रहे। और इस दौरान उन्हें कई बार लोगों की धमकियां भी मिली। क्योंकि गृहयुद्ध के चलते अफगानिस्तान की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था इतनी चरमरा गई थी कि लोग अपने बच्चों से कोई काम-धंधा कर घर बार चलाने की उम्मीद रखते थे ना कि क्रिकेट जैसे खेल में अपना समय बर्बाद करने की। खुद ताज मलूक के घर की हालत भी बहुत ख़स्ता थी और उनके माँ-बाप भी उनसे यही उम्मीद करते थे कि वह क्रिकेट छोड़ कोई रोजगार कर घर चलाने में मदद करें।
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ताज मलूक के हाथ जरूर तंग थे, लेकिन अफगानिस्तान की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम खड़ी करने के सपने को सच में तब्दील करने का जुनून हद से ज्यादा था। उन्हीं के बदौलत ना सिर्फ अफगानिस्तान की राष्ट्रीय टीम खड़ी हुई बल्कि उसने दिन दूनी और रात चौगनी तरक्की भी की। अफगानिस्तान को 2001 में एफिलिएट सदस्य बनाया गया और 2013 में उसे एसोसिएट सदस्य का दर्जा मिला। टीम को 2009 में वनडे और साल 2017 में टेस्ट क्रिकेट खेलने का दर्जा हासिल हुआ। टेस्ट क्रिकेट में खेलने का दर्जा मिलने के साथ ही अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद में 12 पूर्णकालिक सदस्य के रूप में अपनी जगह बना ली। अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के अतीत और उस अतीत को टीम के खिलाड़ियों द्वारा बेहद कम अंतराल में परास्त करके हासिल किया गया यह मुकाम अफगानिस्तान के लोगों के लिए एतिहासिक था।
Image result for rashid khanअगर हम वतर्मान की बात करें तो अफगानिस्तान के कुछ खिलाड़ी दुनियाभर में अपने प्रदर्शन से धमाल मचा रहे हैं। अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के पोस्टर बॉय बन चुके राशिद खान इस समय टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप में नंबर एक गेंदबाज है और एकदिवसीय क्रिकेट में वह सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों की सूची में दूसरे नंबर पर काबिज़ है। राशिद खान कितने खतरनाक गेंदबाज है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि वनडे क्रिकेट इतिहास में सबसे तेज 100 विकेट लेने का कारनामा उनके नाम दर्ज है। राशिद खान जहाँ गिल्लियां बिखेर कर नाम कमा रहे हैं वहीं अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के विकेटकीपर बल्लेबाज मोहम्मद शहजाद अपने चौकों और छक्कों से दुनिया के गेंदबाजों के अंदर खौफ भरने का काम कर रहे हैं। अभी दो महीने पहले ही वह तब चर्चा में आए थे, जब उन्होंने टी-10 लीग में केवल 16 गेंदों में 74 रन बनाकर क्रिकेट की दुनिया में सनसनी पैदा कर दी थी।

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जिस विषम परिस्थितियों के चलते शुरुआती दौर में अफगानिस्तान में क्रिकेट को पनपने में अड़चनों का सामना करना पड़ा था, उन्हीं परिस्थितियों को सामान्य करने में खुद अफगानिस्तान क्रिकेट अब अहम भूमिका निभा रहा है। जैसा कि ऊपर बताया गया कि अफगानिस्तान में क्रिकेट की शुरुआत पख़्तून समाज के लोगों द्वारा की गई। इसलिए पख़्तून, ताजिक, उजबेक और हजारा समुदाय के खाँचे में बंटे इस देश में क्रिकेट को पख्तूनों का खेल समझा और कहा जाने लगा। और आरंभ में अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के ज्यादातर खिलाड़ी भी पख़्तून समाज से ही संबंध रखते थे। लेकिन जैसे-जैसे क्रिकेट में अफगानिस्तान टीम की कामयाबी और देशभर में इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई, वैसे-वैसे समाज के बाकी तबकों से निकले खिलाड़ी भी राष्ट्रीय टीम में शामिल होने लग गए। इससे हुआ यह कि समुदाय के आधार पर बंटा यह देश क्रिकेट के चलते अब एकजुट होने लगा है।
Related imageइस बात को पहली बार तब महसूस किया गया, जब अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम 2015 वर्ल्ड कप में खेलने के लिए क्वालीफाई कर गई और इस एतिहासिक लम्हें के जश्न में अफगानिस्तान की सड़कों पर सिर्फ पख़्तून लोग ही नहीं तो ताजिक, उजबेक और हजारा समुदाय के लोग भी शामिल हुए। चलते-चलते आपको यह बताते चले कि बीसीसीआई और आईसीसी की मदद के चलते खड़ी होने वाली अफगानिस्तान क्रिकेट टीम के पास आज अपना कोई विश्वस्तरीय घरेलू क्रिकेट ग्राउंड भले ना हो, लेकिन इस टीम के पास अंतर्राष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ियों की ऐसी फौज खड़ी हो गई है, जो जल्द अफगानिस्तान को एशिया में क्रिकेट की नई शक्ति के रूप में स्थापित कर देंगे।
रोशन ‘सास्तिक’ 

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