भारत माता के बेटियों का अपमान क्यों? आखिर बेटी बोझ कैसे?

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“भारत में अधिकांश बालिकाओं का गर्भपात कर दिया जाता है, उन्हें मार दिया जाता है, छोड़ दिया जाता है या उनकी मृत्यु के लिए उपेक्षा कर दी जाती है, क्योंकि वे लड़कियां हैं।”

हम उस देश के वासी हैं जिस देश में बेटी को लक्ष्मी का दर्जा दिया जाता है। मगर आज उसी देश में उस लक्ष्मी का घोर अपमान हो रहा है। कभी उसे पैदा होने से पहले पेट में ही मार दिया जाता है, तो कभी पैदा होने के बाद। घर की चीजों पर पहला अधिकार बेटों का होता है। हमारे समाज में बेटी को ‘पराया धन’ कहा जाता है। शायद ‘पराया धन’ होने की वजह से ही उसे अपने ही घर में पराया समझा जाता है। ये तो सच है कि दान में मिली चीजों की कीमत नहीं होती। शायद इसीलिए ‘कन्यादान’ में दी हुई कन्या की ससुराल में कीमत नहीं होती। आज हम एक ऐसी रिपोर्ट का जिक्र करेंगे जो हमारे समाज में बेटियों के साथ होने वाले बर्ताव की दयनीय कहानी बयां करती है।

The Hindu की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लिंगानुपात भले ही कम हुआ हो, लेकिन जब बात आती है गोद लेने की तो गर्ल चाइल्ड ( Girl Child ) पहली पसंद होती है। 2015 और 2018 के बीच देश में गोद लेने ( adoption ) और अंतर-देश में गोद लेने के लिए रखी गई गर्ल चाइल्ड की संख्या मेल चाइल्ड ( Male Child ) की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक है। इस दौरान देश में गोद लेने के लिए 11,649 बच्चों को रखा गया। इनमें से गर्ल चाइल्ड ( Girl Child ) की संख्या 6,962 जबकि, मेल चाइल्ड ( Male Child ) की संख्या 4,687 थी। आपको यह जानकर बड़ी ख़ुशी हुई होगी कि ज्यादा लड़कियों को गोद लिया गया। हमारे दिमाग में पहला विचार आता है कि जब गोद लेने ( adoption ) वाली बात आती है तो गर्ल चाइल्ड ( Girl Child ) को तवज्जो दी जाती है।

लड़कियों को तवज्जो देने वाली बात राहत की साँस तो जरुर देती है। मगर ये आंकड़े उस वक़्त भयावह नजर आते हैं, जब एक कड़वी सच्चाई सामने आती है कि इस देश में हर साल लाखों लड़कियों को उनके परिवारों द्वारा छोड़ दिया जाता है। जब एक गर्ल चाइल्ड ( Girl Child ) को गोद लिया जाता है तो यह जरुरी नहीं है कि उनके लिए हमारी प्राथमिकता होती है। बल्कि यह भारत में बालिकाओं की स्थिति की गंभीर वास्तविकता की याद दिलाता है।

भारत में 11 मिलियन परित्यक्त ( abandoned ) बच्चों में से 90% लड़कियां

यह तथ्य है कि भारत में लड़कों की तुलना में अधिक लड़कियों को अपनाया जा रहा है। लेकिन यह स्थिति पैदा कैसे हुई, इस वास्तविकता को भी जान लेना जरुरी है। तो सच्चाई यह है कि हमारे देश में अधिक से अधिक लड़कियों को छोड़ दिया जा रहा है। ये लड़कियां बाद में गोद ली जाती हैं या फिर बचाव केंद्रों में पनाह लेती हैं। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि भारत में हर 8 मिनट में एक बच्ची लापता हो जाती है। और, सबसे बुरी बात तो यह है कि ज्यादातर समय उनके लापता होने का हिसाब ही नहीं मिलता। लापता होने के बाद इन बच्चियों के शोषण का खेल शुरू होता है। यौन शोषण, वेश्यावृत्ति, जबरन श्रम और बाल विवाह के लिए इन बच्चियों की तस्करी की जाती है।

2017-18 के वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण में पता चला है कि भारत में 21 मिलियन से अधिक ‘अवांछित’ लड़कियां हैं। भारत में अधिकांश बालिकाओं का गर्भपात कर दिया जाता है, उन्हें मार दिया जाता है, छोड़ दिया जाता है या उनकी मृत्यु के लिए उपेक्षा कर दी जाती है, क्योंकि वे लड़कियां हैं। इस समस्या की जड़ें एक मजबूत पितृसत्तात्मक समाज में हैं, जो बेटों और बेटियों के खिलाफ भेदभाव के लिए एक जुनूनी प्राथमिकता में तब्दील हो गई हैं।

जबकि भारत में लिंग अनुपात लड़कों के पक्ष में अत्यधिक झुकाव रखता है। लेकिन यह लोगों के दृष्टिकोण को बदलने की शुरुआत हो सकती है। भारत में शिक्षित, शहरी मध्यम वर्गीय परिवार, बच्चों को न केवल अंतिम उपाय के रूप में अपनाते हैं, बल्कि एक सचेत अंतर भी पैदा करते हैं। यही कारण है कि वे भारतीय लड़कियों को होने वाले सामाजिक नुकसान को ध्यान में रखते हैं। गांवों और छोटे शहरों के लिए स्थिति एक समान नहीं हो सकती है। यहाँ लोग अभी भी बेटियों के मुकाबले बेटों को ही पसंद करते हैं।

~Shravan Pandey

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