भारत में सड़क हादसों की भयावह तस्वीर

576

सड़क हादसा भारत में कितना विकराल रूप धारण कर चुका है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि एक अनुमान के अनुसार हर साल भारत में लगभग डेढ़ लाख लोग सड़क दुर्घटना में मौत का शिकार हो जाते हैं। इस आंकड़े की भयावहता का पता इस बात से चलता है कि सालभर में इतनी ज्यादा मौतें किसी महामारी तक से भी नहीं होती। भारत में हर मिनट पर एक सड़क दुर्घटना होती है और हर घंटे औसतन 16 लोग इन दुर्घटनाओं में अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा अगस्त 2017 में आई रिपोर्ट, सड़क दुर्घटना-2016 के अनुसार भारत में वर्ष 2005 से वर्ष 2016 के बीच कम से कम 15 से 16 लाख लोगों की मौत सड़क दुर्घटना में हुई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सड़क दुर्घटनाओं का एक महत्वपूर्ण कारण ‘चालकों का दोष’ है। वर्ष 2016 में सड़क पर हुई कुल दुर्घटनाओं में से 4,03,598 या 84 फीसदी मामलों में गलती वाहन चालक की ही रही।

सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार 2016 में देश में हर दिन 1,317 सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें से 413 लोगों की मौत हो जाती है। इसमें थोड़ी सी राहत की बात यह है कि वर्ष 2015 की तुलना में वर्ष 2016 में सड़क दुर्घटनाओं में 4.1% की कमी आई है लेकिन इनमें मरने वाले लोगों की संख्या 3.2%बढ़ी जरूर है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में 4 लाख 80 हजार 652 सड़क दुर्घटनाएं हुई हैं। जिनमें 1 लाख 50 हजार 785 लोगों की मौत हुई और 4 लाख 94 हजार 624 लोग घायल हुए। यानी औसतन हर चार सड़क दुर्घटना में एक आदमी की मौत होती है। इन दुर्घटनाओं में मरने वाले 69 हजार 851 लोग 35 साल की उम्र के थे, जो सड़क दुर्घटनाओं में मरे लोगों का 46.3% है। मृतकों में 18 से 60 साल की उम्र के लोगों की संख्या 83.3% है। देश में होने वाले कुल सड़क दुर्घटनाओं का 86.5% भारत के केवल 13 राज्यों में होता है। कुल दुर्घटना के 12.8% हिस्सेदारी के साथ इस सूची में उत्तरप्रदेश पहले स्थान पर है। इसके बाद 11.4% के साथ तमिलनाडु दूसरे और 8.6% के साथ तीसरे नंबर पर महाराष्ट्र का नाम आता है।
इस रिपोर्ट में सड़क दुर्घटना के कारणों के पीछे ड्राइविंग संबंधित गलतियों को 80% जिम्मेदार बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से 1,21,126 मौत या सभी मौतों का 80% गलत ड्राइविंग की वजह से हुई। चालकों के दोष में सबसे महत्वपूर्ण कारण गाड़ी की तेज गति रही है। जिस कारण कुल 4,03,598 दुर्घटनाओं का 66% या 2,68,341 दुर्घटनाएं हुईं। कुल 1,21,126 मौतों में से 61% या 73,896 तेज गति के कारण हुई है। दुर्घटनाओं का दूसरा बड़ा कारण ओवरटेकिंग है। 7.3% दुर्घटनाओं की वजह ओवर टेकिंग और 7.8% मौत की वजह भी ओवरटेकिंग है। साथ ही सड़क पर गलत तरफ गाड़ी चलाना भी अन्य मुख्य कारण रहा है। इससे 4.4% दुर्घटनाएं और 4.7% मौत हुई है।
सड़क दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कारणों में शराब पीकर गाड़ी चलाना, नौसिखिए द्वारा गाड़ी चलाना, तनावग्रस्त होकर गाड़ी चलाना, तेज रफ्तार के साथ गाड़ी चलाना, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी कर गाड़ी चलाना, सड़कों की खराब गुणवत्ता, वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या, तेज और तीखे मोड़ वाली सड़कें प्रमुख रूप से जिम्मेदार मानी जाती हैं। भारत में मौजूद कुल सड़क मार्ग में राष्ट्रीय सड़कों की हिस्सेदारी केवल 2% है। लेकिन 2016 में सड़क दुर्घटना से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, भारत में हुई कुल सड़क दुर्घटनाओं में से 30% सड़क दुर्घटनाएं राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुईं।

इतना ही नहीं सड़क दुर्घटना के चलते भारत भर में होने वाली कुल मौतों में से 37% मौतें राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुई सड़क दुर्घटनाओं के चलते हुई। यानी भारत के केवल 2% सड़कों पर दुर्घटना से जुडी 37% मौतें हुई हैं। अब अगर हम सिर्फ राष्ट्रीय राजमार्ग पर होने वाले सड़क दुर्घटना के कारणों को पहचान कर उस पर लगाम लगा सकें तो हम इन सड़क दुर्घटनाओं से होने वाले जान माल के नुकसान पर काफी हद तक लगाम लगा सकते हैं।
दुनिया में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं और उनके चलते होने वाले नुकसान को कम करने के उद्देश्य से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक रिपोर्ट जारी कर कुछ निर्देश दिए हैं। इनमें सड़क दुर्घटना से जुड़े कानून को मजबूत बनाने, स्पीड मैनेजमेंट पर काम करना, सड़क निर्माण में सुरक्षा मानकों पर ध्यान रखना जैसे सुझाव दिए गए हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा सड़क हादसे कम और मध्यम आय वर्ग वाले देश में देखने को मिलते हैं। इन देशों में होने वाले सड़क हादसे विकसित देशों में होने वाले सड़क हादसों की तुलना में दोगुने होते हैं। इसकी वजह ऐसे देशों में सड़क निमार्ण के समय लागत खर्च को कम रखने के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता करना होता है। लेकिन अनुमान के अनुसार, सड़क दुर्घटनाओं के चलते देशों को जीडीपी का 5% का नुकसान होता है।

सड़क दुर्घटना का शिकार सबसे ज्यादा 15 से 29 साल के युवा होते हैं। यह युवाओं में होने वाली आकस्मिक मौत के कारणों में सबसे बड़ी वजह होती है। इसके बाद दूसरे नंबर पर आत्महत्या के चलते होने वाली आकस्मिक मौते आती हैं। सड़क दुर्घटना में मारे जाने वाले युवाओं से जुड़े मामलों में ज्यादातर यह देखा गया है कि दुर्घटना तेज गति से वाहन चलाने और नियंत्रण खो देने के चलते होती है। सड़क दुर्घटना में ज्यादातर मामले दुपहिया वाहन चला रहे चालकों से जुड़ी होती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुपहिया वाहनों की दुर्घटना में तेज गति से वाहन चलने और बिना हेलमेट के गाड़ी चलाने वाले करीब 35% लोग अपनी जान गवां बैठते हैं।

इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में होने वाले सड़क दुर्घटनाओं में से 35% दुर्घटनाएं दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे के बीच होती हैं। दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे के दरम्यान 17.5% और शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक 17.5% सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए सर्वाधिक दुर्घटना वाले 789 ब्लैक स्पॉट की पहचान की गई है, जिनमें से 651 राष्ट्रीय राजमार्गों पर हैं और 138 राज्यों की सड़कों पर हैं। इनमें से 140 स्थलों को ठीक किया गया है और 283 पर काम चल रहा है। शेष 228 के लिए सर्वेक्षण किया जा रहा है।

सड़क दुर्घटनाओं और उनके चलते होने वाली मौत के आंकड़ों को कम करने के लिए सरकार अपनी तरफ से कई कदम उठा रही है। सरकार ही नहीं बल्कि आज देश में सैकड़ों ऐसी गैर-सरकारी संस्थाएं हैं जो सड़क दुर्घटना को लेकर जनजागरण के माध्यम से इसे कम करने में लगी हुई हैं। हमारा सुप्रीम कोर्ट भी समय-समय पर सड़क दुर्घटनाओं में शिकार हुए लोगों को जल्द से जल्द चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो सके, इसके लिए सरकारी तंत्र को दिशा निर्देश जारी करता रहता है। कहने का मतलब इतना सरकारी और गैर-सरकारी अमले द्वारा इतना सब कुछ करने के बावजूद अगर इतने बड़े पैमाने पर सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं और लोग बेमौत मारे जा रहे हैं तो इसका जिम्मेदार कौन है?

अगर हम नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ही बात मानें तो हर 100 सड़क दुर्घटनाओं में से 80 बार सड़क दुर्घटना चालक की गलती से होती है। यानी अगर हम सरकार पर निर्भरता को छोड़कर सड़क पर वाहन चलाते वक्त सिर्फ अपनी गलतियों को करना और उसे दोहराना छोड़ दें तो सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले में अपने आप 80% की गिरावट दर्ज हो जाएगी। लेकिन शायद हम चाहते ही नहीं कि सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े मामलों में कमी आए। क्योंकि अगर ऐसा होता, तो सड़क पर हर दुपहिया चला रहा चालक हेलमेट पहले हुए दिखता, हर चार पहिया चालक सीटबेल्ट लगाकर गाड़ी चलाता, हर ट्रक ड्राइवर लगातार 15-20 घंटे गाड़ी चलाकर ना खुद की जान को खतरे में डालता और ना ही सड़क पर चल रहे लोगों की।

कुल मिलाकर कहानी उसी जुमले पर आकर खत्म हो जाती है कि अगर कुछ बदलना है तो खुद बदलना होगा। वरना सड़क दुर्घटना से जुड़े मौत के आंकड़ों का लगातार रोना-रोने की खानापूर्ति तो सब कर ही देते

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here