मंदिर-मस्ज़िद मामला: आड़वाणी द्वारा माहौल बनाने और कारसेवकों ने मस्ज़िद गिराने की कहानी

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1989 के चुनावों में जब एक दशक से भी कम पुरानी पार्टी अपने दूसरे ही लोकसभा चुनावों में 2 से सीधा 85 सीटों पर पहुंच गई। तब उसे यह एहसास हुआ की राम मंदिर मुद्दे के रूप में उसके हाथ तुरुप का इक्का लग गया है। अपने इसी कार्ड को और ज्यादा भुनाने के उद्देश्य से बीजेपी के अध्यक्ष लालकृष्ण अडवाणी ने सोमनाथ मंदिर से अयोध्या तक के 10 हजार किलोमीटर के सफर को रथ से तय करने का ऐलान किया। 25 सिंतबर 1990 से सोमनाथ से शुरू होने वाली इस रथयात्रा को 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पहुंचकर कारसेवा करनी थी।
लालकृष्ण अडवाणी की रथयात्रा और इससे भड़के दंगे
राम के नाम पर शुरू की गई अडवाणी की यह रथयात्रा अपने पीछे-पीछे दंगो का काल ढक छोड़ते गई। जहां-जहां से अडवाणी की यह रथयात्रा गुजरी लगभग हर उस जगह हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच दंगे हुए। यही कारण रहा की बिहार के तत्कालिक मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के आदेश पर २३ अक्टूबर 1990 के दिन अडवाणी की रथयात्रा को बिहार में रोक उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अपनी इस बात को आज भी लालू प्रसाद यादव धर्मनिरपेक्षता से जुड़े किसी भी विवाद पर बोलते वक्त बढ़ा चढ़ाकर बताते है।
Image result for आडवाणी की रथ यात्रामुलायम गोलिया ना चलवाते तो 1990 में गिरा दी जाती बाबरी
लालकृष्ण अडवाणी के बिहार में हिरासत में लिए जाने के बावजूद तयशुदा तारीख यानी 30 अक्टूबर को हजारों की संख्या में कारसेवक जमा हो गए। उनके द्वारा रैलियां निकाली गई। इसी बीच विवादित परिसर के पास इकठ्ठा होकर कारसेवको ने उस दिन बाबरी मस्ज़िद को ढहाने की भी कोशिश की। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने हालात को काबू करने के लिए उपद्रवियों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए। नतीजतन कई कारसेवक इस गोलीबारी में मारे गए। अब इस बात को मुलायम आज तक तक अपने धर्मनिरपेक्ष होने के सबूत के तौर पर पेश करते रहे और उनके विरोधी उनके हिंदू-विरोधी छवि के तौर पर।
रथ पर सवार होकर यूपी के सत्ता पर काबिज हुई भाजपा
1984 के धर्म संसद से 1990 के रामरथ यात्रा तक के सफर में भाजपा राम मंदिर भले ना बना पाई हो। लेकिन राम मंदिर बनाने के नाम पर उसने 1991 में हुए यूपी लोकसभा चुनावों में अपनी सरकार जरूर बना ली। विधानसभा की कुल 425 सीटों भाजपा ने अप्रत्याशित रूप से 221 सीटें जीत ली और कल्याण सिंह के नेतृत्व में अपनी पहली सरकार बनाई।
अब हुआ यह कि कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनते ही प्रदेश सरकार ने विवादित ढांचे और उसके आसपास के परिसर को अपने अधीन ले लिया। यह कहकर कि वह इस स्थान पर पर्यटन को बढ़ावा देना चाहते है। लेकिन हुआ यह कि इसके कुछ ही समय बाद विवादित स्थल को ‘जन्मभूमि न्यास ट्रस्ट’ को लीज़ पर दे दिया गया। आपको जानकर यह हैरानी होगी कि यह वही ट्रस्ट था जो पिछले पचास सालों से राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने की मांग को लेकर केस लड़ रहा था।
Image result for नरसिम्हा राव बाबरी मस्जिदकोर्ट द्वारा विवादित परिसर में स्थायी निर्माण पर रोक
इसी बीच अलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में चल रही सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया कि अब ना सिर्फ विवादित स्थल की यथास्थिति बरक़रार राखी जाए बल्कि आसपास के परिसर में किसी भी तरह का कोई पक्का निर्माण ना होने दिया जाए। कल्याण सिंह सरकार ने भी अपनी तरफ से कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर। कोर्ट को आश्वस्त किया कि सरकार कोर्ट के आदेश का सम्मान और पालन करेगी। विवादित स्थल के परिसर में किसी तरह का कोई स्थायी निर्माण कार्य नहीं होगा।
लेकिन कल्याण सिंह थे तो भाजपा के ही और भाजपा का राम मंदिर को लेकर स्टैंड सर्वविदित था। इस वजह से वीएचपी के लोगो ने जुलाई 1992 में एक बार फिर कारसेवको को एक मंच पर इकठ्ठा किया गया। इस कार्यक्रम में कोर्ट के आदेश को नकारते हुए राम चबूतरे के पास ही एक पक्का निर्माण का कार्य आरंभ कर दिया। इसे जैसे तैसे प्रशासन ने रोक तो दिया। लेकिन इस वजह से राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच तनाव काफी बढ़ गया। उस समय केंद्र में कांग्रेस के पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार थी। जिसकी यह शिकायत थी कि जब राज्य सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दायर कर यह स्वीकार कर लिया है कि विवादित स्थल पर किसी नए स्थायी निर्माण को होने नहीं देगा। फिर ऐसे मामलो में ढिलाई क्यों बरत रहा है? ……. क्रमशः
रोशन ‘सास्तिक’

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