मंदिर-मस्ज़िद मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट से निकलकर भगवान राम के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की कहानी

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साल 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण(ASI) से विवादित परिसर में खुदाई कर उस स्थान की ऐतिहासिकता के बारे में पता लगाने को कहा। कोर्ट ने आदेश एएसआई को देकर कहा कि विभाग खुदाई के दौरान मिलने वाले अवशेषों की जांच कर यह पता लगाए की वहां मस्ज़िद मंदिर था या नही।
कोर्ट के आदेश के बाद एएसआई ने तीन चार महीने उस स्थान पर खुदाई का काम किया। और अगस्त 2013 में अपनी जांच की रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष रखा।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की बेनतीजा रिपोर्ट
इस रिपोर्ट में यह बात कही गई कि खुदाई के दौरान विवादित स्थल ले नीचे हिंदू धर्म से संबंधित कुछ स्तंभ मिलें है। जिनपर हिंदू धर्म के निशान बने हुए है। इंसान, जानवर, फूल जैसी कलाकृतियां। लेकिन इस्लाम मे किस भी इंसान या फिर जानवर को आकृति को दीवार पर अंकित नही करवा सकते। यानी यह स्पष्ट है कि वहां मस्ज़िद से पहले किसी हिंदू मंदिर का अस्तित्व था।
अपनी रिपोर्ट में एएसआई ने यह साफ कहा कि मस्ज़िद से पहले वहां दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में एक बहुत बड़ा हिंदू मंदिर अस्तित्व में था। लेकिन क्या वह मंदिर राम मंदिर था? इस सवाल का जवाब देने से एएसआई साफ बच गई। यही कारण रहा कि इस रिपोर्ट को विवादित और बेनतीजा बताया गया।
Image result for अयोध्या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षणएएसआई की रिपोर्ट को लेकर इतिहासकारों में बहुत वाद-विवाद है। अलग-अलग इतिहासकारों में ने इस रिपोर्ट के बारे में अपना अलग-अलग नज़रिया पेश किया। विवाद के और भी कारण थे। क्योंकि उस स्थान पर 2003 में जो खुदाई हुई, वह पहली बार नही थी। उससे पहले भी 1900वीं शताब्दी में दो बार खुदाई हुई। फिर बीसवीं शताब्दी के 20 और 30 के दशक में खुदाई हुई। इसके बाद 70 के दशक में भी उस स्थान पर खुदाई की गई।
19वीं शताब्दी में हुई खुदाई के दौरान हुई खुदाई में वहां से बौद्ध धर्म से संबंधित कई मूर्तिया मिली थी। जिस वजह से बौद्ध धर्म से संबंधित लोगों ने भी उस स्थान को लेकर अपना अलग दावा ठोक दिया। जिससे यह मामला सुलझने की बजाय और भी ज्यादा उलझता गया।
इस रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसने भले स्थान पर किसी राम मंदिर के होने के दावे को स्वीकारा या नकारा ना हो। लेकिन रिपोर्ट में साफ-साफ शब्दों में यह कहा गया कि वहां मस्ज़िद से पहले मध्यकालीन मंदिर का अस्तित्व था। इस रिपोर्ट की इसी बात को प्रमुखता से उठाकर मंदिर समर्थक आए दिन अपना पक्ष रखते है।
Related imageविवादित ढांचे का संपूर्ण संक्षिप्त न्यायिक पक्ष
तीस-चालीस साल लोकल कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चलती रही। इसके बाद करीब बीस साल यह मसला इलाहाबाद हाईकोर्ट में चला। यानी हाईकोर्ट द्वारा इस मसले पर कोई फैसला सुनाए जाने के पहले यह विवाद 60-70 सालों तक न्यायालय के बीच ही झूलता रहा।
आखिरकार 30 सिंबतर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाया।
अपने फैसले में न्यायालय ने विवादित स्थल को तीन भागों में विभाजित किया;
१) विवादित स्थल का केंद्रीय हिस्सा जहां अस्थायी राम मंदिर बना हुआ, उसे राम जन्मभूमि न्यास को दिया गया।
२) सीता रसोई और राम चबुतरे वाली जमीन का कब्जा निर्मोही अखाड़ा को सौंपने का फैसला किया गया।
३) विवादित स्थल की बाकी बची हुई ज़मीन को सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के हिस्से देने का आदेश जारी किया गया।
यहां सबसे अहम बात यह रही कि पहली बार कानूनी तौर पर इस बात को स्वीकार किया गया कि विवादित स्थल पर मूलतः राम जन्मभूमि मंदिर का था। यही कारण रहा कि विवादित स्थल का केंद्रीय हिस्सा राम जन्मभूमि न्यास को दिया गया।
Image result for सुप्रीम कोर्टहाईकोर्ट से सुप्रीमकोर्ट पहुंचा विवाद
हाईकोर्ट के फैसले से तीनों ही पक्ष असहमत हुए। उनका कहना था कि विवादित स्थल का आधा-अधूरा हिस्सा नही बल्कि समूचा अधिग्रहण करना मिलना चाहिए। इसलिए तीनों ही पक्ष इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट चले गए।
2010 से लेकर 2017 की शुरूआत तक इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में किसी तरह की कोई सुनवाई नही हुई। आखिरकार इसी साल मार्च-अप्रैल में इस संबंध में थोड़ी हलचल शुरू हुई। नतीजा अगस्त 2017 में केस के सुनवाई की तारीख तय की गई। लेकिन इससे पहले ही इस मामले से जुड़े पक्षधरों ने विवाद से संबंधित अलग-अलग भाषाओं में मौजूद दस्तावेजों के अनुवाद लिए दो से तीन महीनों के समय मांगा गया। नतीजा केस की सुनवाई की तारीख को अगस्त से टालकर 5 दिसंबर 2017 तय कर दी गई। ……. क्रमशः
रोशन ‘सास्तिक’

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