मंदिर-मस्ज़िद मामला: 6 दिसंबर को कारसेवकों द्वारा मस्ज़िद को शहीद करने की कहानी

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 राज्य सरकार के गैर जिम्मेदाराना रवैये और न्यायालय द्वारा जल्द किसी नतीजे की उम्मीद ना आने के चलते पहली बार इस मामले में खुद देश के प्रधानमंत्री द्वारा मामले के दोनों ही पक्षकारो के बीच मध्यस्थता की गई। इस विवाद के 40 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा था कि मामले को सुलझाने के लिए दोनों ही पक्ष न्यायालय के बार बातचीत करने को तैयार हुए थे। लेकिन बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमिटी और विश्व हिंदू परिषद के बीच हुई यह वार्ता पूर्णतः विफल रही। करने दोनों ही पक्ष ना तो एक दूसरे की बात को सुनने के लिए ही राजी थे और ना ही अपने कथन से एक भी कदम पीछे हटने के लिए।
6 दिसंबर: बाबरी मस्ज़िद गिराने का दिन
बीच का रास्ता निकालने की बातचीत के बीच वीएचपी ने 30 अक्टूबर 1992 को दोबारा धर्म संसद बुलाई। इस धर्म संसद में यह तय किया गया कि आगामी 6 दिसंबर को कारसेवक दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन बड़ी संख्या बम कारसेवक अयोध्या में जुटकर कारसेवा करेंगे।
इस ऐलान के बाद नरसिम्हा राव की सरकार चिंतित हो गई। कानून-व्यवस्था के बिगड़ने के डर से गृहमंत्री ने तो राव को उत्तरप्रदेश सरकार को भंग कर, राष्ट्रपति शासन लागू करने तक की सलाह दी थी। लेकिन नरसिम्हा राव तब उनके इस सुझाव से सहमत नही हुए। उन्होंने कल्याण सिंह को यह आश्वासन मांगा कि वह 6 दिसंबर को होनेवाले कारसेवा दिवस के दिन विवादित स्थल के आसपास किसी भी तरह का उपद्रव,तोडफ़ोड़ या स्थायी निर्माण नही होने देंगे।
Image result for कल्याण सिंह  बाबरी मस्जिदकल्याण सिंह ने किया कारसेवकों पर गोली नहीं चलाने का ऐलान
कल्याण सिंह ने एक तरफ प्रधानमंत्री को 6 दिसंबर के दिन प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखने का आश्वासन दिया। लेकिन दूसरी तरफ यह ऐलान भी कर दिया कि वह कारसेवकों पर किसी भी सूरत में गोली नही चलाएंगे। कल्याण सिंह ने किसी भी सूरत में गोली ना चलाने का ऐलान कर ना सिर्फ उपद्रवियों के अंदर का डर ख़त्म कर दिया। बल्कि कारसेवकों की संभावित करतूत को दबी जुबान में या फिर कहे कि मौन रहकर अपने समर्थन का संकेत भी दे दिया।
सरकारी द्वारा ढिलाई बरते जाने ले संकेत का नतीजा यह रहा कि 6 दिसंबर 1992 के दिन अयोध्या में देशभर से तकरीबन 2 लाख लोग जमा हो गए। आग में घी डालने का काम किया उससे एक रा पहले 5 दिसंबर 1992 को कारसेवकों को संबोधित करता लालकृष्ण अडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी का जोशीला/भड़काऊ भाषण।
भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला दिन
नतीजा 6 दिसंबर की सुबह 10 बजे कार सेवको ने जो हथियार या औजार हाथ आया उसे लेकर बाबरी मस्ज़िद पर चढ़ना शुरू कर दिया। अब जैसा कि कल्याण सिंह ऐलान कर ही चुके थे कि किसी भी हालत में पुलिस कारसेवकों पर गोलियां नही चलाएगी। तो नतीजा यह रहा कि उपद्रवी शाम 6 बजे तक ईंट दर ईंट तोड़ते हुए कारसेवकों ने बाबरी मस्ज़िद ढांचों को जमींदोज कर दिया। इतना ही नही तो आनन-फानन में वहां एक छोटे से राम मंदिर की स्थापना भी कर दी। आजाद भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का यह सबसे काला दिन था।
इस दिन कहने को एक मस्ज़िद ढहाई गई थी। लेकिन असल में उस दिन भारत संघराज्य के स्थापना के मूल संकल्पनाओं की समाधि बना दी गई थी। लोकतंत्र ने बड़ी बेबसी से उस दिन भीड़तंत्र के आगे घुटने टेक दिए थे। आगे हुई जांच में लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा कि कारसेवकों को संबोधित करते हुए अशोक सिंघल, लालकृष्ण अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार, उमा भारती, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं द्वारा दिए गए भड़काऊ भाषण बाबरी मस्ज़िद ढहाने के लिए उसके गुंबद पर चढ़े कारसेवकों के लिए प्रेरणास्रोत बने थे।
Image result for कल्याण सिंह  बाबरी मस्जिदयूपी के तत्कालीन को जेल में गुजारनी पड़ी एक रात
इतना सब हो जाने के बाद शाम को जब यह तय हो गया कि केंद्र सरकार कल्याण सिंह की सरकार को भंग कर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर देगी। तो ऐसा होने के कुछ घँटे पहले उसी रात कल्याण सिंह ने स्वयं बाबरी मस्ज़िद ढहाए जाने कि नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। इस तरह राम के नाम पर सत्ता में आई कल्याण सिंह की सरकार राम के नाम पर ही सत्ता से बेदखल भी हो गई। अगले दिन बाकायदा कल्याण सिंह ने पूरे विवाद पर एक पत्रकार सभा कार्यक्रम रखा। जिसमे उन्होंने मामले की नैतिक जिम्मेदारी लेने की बात कही। अब क्योंकि कल्याण सिंह ने कोर्ट को यह आश्वासन दिया था कि वह कारसेवा के नाम पर किसी तरह का उपद्रव नही होने देंगे। तो न्यायालय की अवमानना करने के लिए उन्हें एक दिन की जेल की सजा भी काटनी पड़ी थी। …… क्रमशः
रोशन ‘सास्तिक’

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