मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी मूवी रिव्यू

मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी मूवी रिव्यू

Actor- कंगना रनौत, अतुल कुलकर्णी, जिस्सु सेनगुप्ता, सुरेश ओबेरॉय, अंकिता लोखंडे, डैनी डेंजोग्पा

Genre – Hindi, Drama, Biography, Action

Duration – 2 Hrs 28 Min

Star – 3.5

Review-
‘खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थी’ फ़िल्म की यह लाइन आपके अन्दर जोश भर देगी, ऐसे ही अनगिनत दमदार डाइयलोग से यह फ़िल्म भरी पड़ी है ।अमिताभ बच्चन के वॉइस ओवर के साथ कहानी की शुरुआत होती है। अठारह सौ अट्ठाईस के दशक में मनु उर्फ मणिकर्णिका की हीरोइक एंट्री होती है, जहां वह अपनी अचूक तीरअंदाजी से खूंखार शेर को बेहोश कर देती है।
झांसी के राजा के लिए मणिकर्णिका को चुना जाता है और शादी पर उसका नाम लक्ष्मीबाई हो जाता है. लेकिन बच्चे के निधन होने की वजह से अंग्रेज झांसी को ‘हड़प की नीति’ के तहत हड़पने की कोशिश करते हैं और फिर झांसी की रानी ऐलान कर देती है कि वह अपनी झांसी किसी को नहीं देगी. फिल्म की कहानी और फर्स्ट हाफ में ढेर सारे गाने और स्लो स्टोरी तंग करती है. झांसी की रानी (Jhansi Ki Rani) के बचपन को दिखाया नहीं गया है. दूसरे हाफ में जंग शुरू होने पर फिल्म जोश भरती है.

Direction – निर्देशन की बात करें, तो सभी जानते है कि इसकी जिम्मेदारी राधा कृष्ण, जगरलामुदी के अलावा मुख्य रूप से कंगना ने निभाई है और इसमें कोई शक नहीं कि इस भार को उन्होंने अपने नाजुक कंधों पर बखूबी उठाया है। इंटरवल तक फिल्म धीमी गति से आगे बढ़ती है। अलग-अलग किरदारों को स्टैब्लिश करने की कोशिश में फिल्म खिंच जाती है, मगर सेकंड हाफ में जैसे ही स्वंत्रता संग्राम का बिगुल बजता है, फिल्म का ऐक्शन, टर्न ऐंड ट्विस्ट, रणभूमि की ज्वाला माहौल को रोमांचक बना देती है।

निर्देशक के रूप में कंगना गणतंत्र दिवस के मौके पर देशभक्ति का अलख जगाने में सफल रही हैं। फिल्म में अंग्रेज सरकार और कंपनी के पहलू को सशक्त बनाया जा सकता था। फिल्म में बेहतर स्पेशल इफेक्ट्स का इस्तेमाल होता, तो रोमांच और बढ़ जाता। अब तक ऐतिहासिक फिल्मों को हमने भंसाली और आशुतोष गोवारिकर के नजरिए से देखा है, मगर कंगना के नजरिए में खूबसूरती और बहादुरी दोनों झलकती है। कई दृश्य और संवाद ताली पीटने पर मजबूर कर देते हैं। मातृभूमि के लिए मर-मिटनेवाले प्रसून जोशी के संवाद जोश भर देते हैं।

Acting- पर्दे पर कंगना की फायर ब्रैंड परफॉर्मेंस को देखकर लगता है कि मणिकर्णिका ,झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का रोल उन्हीं के लिए बना था। उनके निर्देशन और अभिनय को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे थे, मगर अपने अभूतपूर्व अंदाज से उन्होंने जता दिया कि उस रोल के लिए वे हर तरह से उपयुक्त हैं। इसे अगर उनके करियर की उत्कृष्ट परफॉर्मेंस कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। किशोरी के रूप में वे निहायत खूबसूरत और दिलकश लगी हैं, मगर रणभूमि पर योद्धा के रूप में उन्होंने उसी चपलता के साथ दुश्मनों से लोहा लिया है। कंगना ने किरदार के बॉडी लैंग्वेज, डायलॉग डिलीवरी और ऐक्शन दृश्यों पर कड़ी मेहनत की है।

झलकारीबाई के रूप में अंकिता लोखंडे का मूवी डेब्यू प्रभावशाली रहा है। उन्हें और ज्यादा स्क्रीन स्पेस दिया जाना चाहिए था। गौस बाबा के रूप में डैनी डेंगजोंग्पा को एक अर्से बाद पर्दे पर देखना अच्छा लगा। अन्य भूमिकाओं में कुलभूषण खरबंदा, सुरेश ओबेरॉय, रिचर्ड कीप, जिस्सु सेनगुप्ता ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। जीशान अयूब को बहुत मौके नहीं मिले।कुलमिलाकर फ़िल्म बेहद अच्छी बन पड़ी है।

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