महिलाओं की सुरक्षा हर पुरूष की जिम्मेदारी, इनके अधिकारों के लिए लड़ रहे ये पुरूष

हमारे देश में एक चलन है कि बेटियों को बेटों की तरह पालें। लेक़िन क्या आपने कभी किसी पैरेंट के मुंह से ऐसा सुना है कि वो अपने बेटे को बेटी की तरह पालेंगे या पालते हैं। अक्सर लड़कों को कहा जाता है कि लड़के नहीं रोते। लड़कियों को कमजोर और संवेदनशील माना जाता है।

व्यवहार का यह पैटर्न पितृसत्ता से ही उपजी है। कमजोरी की यह विकृत धारणा न केवल हमारी महिलाओं को बल्कि हमारे पुरुषों को भी नुकसान पहुंचा रही है। एक सोच ऐसी भी है कि अगर हम समानता के लिए लड़ रहे हैं तो फ़िर सिर्फ़ महिलाओं के लिए ही एक एक्सक्लुसिव आईडिया क्यों? क्यों पुरूष महिलाओं के साथ खड़े होकर पितृसत्ता के खिलाफ नहीं लड़ सकते? उनके मुद्दे हमारे मुद्दे भी होने चाहिए।

भारत महिलाओं के लिए एक डिफरेंट प्लेस हो सकता था मग़र राजाराम मोहन रॉय के लिए नहीं।

राजा राम मोहन रॉय को इस देश में पहला मेल फेमिनिस्ट माना जाता है। उन्होंने महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ कदम उठाया। उन्होंने उन परम्पराओं औऱ मान्यताओं को कुचल डाला जिन्होंने महिलाओं को दबाकर रखा था। उनके प्रयासों की ही देन है कि आज भी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाया जा रहा है।

समाज सुधारक राजा राममोहन राय ने निडर होकर अपने अथक प्रयासों से 19वीं सदी में महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी। उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह और बहुविवाह जैसे कुप्रथाओं का समूल नाश करने की दिशा में जी जान से काम किया।

राजा राममोहन राय की एक महान उपलब्धि थी उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की। यह क़दम निरर्थक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों को ख़त्म करने के लिए एक आंदोलन के रूप में था। इन निरर्थक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों ने व्यक्तियों के किसी भी विशेष वर्ग, विशेषकर महिलाओं के अनफेयर ट्रीटमैंट को बढ़ावा दिया था।

राजा राम मोहन रॉय जैसे ही कुछ भारतीय पुरूष हैं जिन्होंने महिलाओं के मुद्दे पर आवाज उठाई है।

1. हरीश सदानी ( Harish Sadani) :- 1993 में स्थापित हरीश की संस्था उन कुछ चुनिंदा संस्थाओं में से है जो भारत में महिलाओं के खिलाफ होने वाले वायलेंस को रोकने पर फ़ोकस करता है।

जेंडर बायस के कॉन्सेप्ट को उलटते हुए उनकी संस्था, MAVA ( Men Against Violence and Abuse) ने लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा या दुर्व्यवहार को रोकने के लिए पुरुषों को सशक्त बनाया है।

हरीश का लक्ष्य है कि पुरुषों के एक ऐसे मूवमेंट को आकार दे सकें जिसमें यूथ भी शामिल हों, जो जेंडर बायस्ड आउटलुक को चेंज करने और उसे प्रोटेक्ट करने की रिस्पांसिबिलिटी ले सकें। वे सुपरिओरिटी के किसी भी सेंस को डिस्कार्ड कर सकें। उस सोशल कंडीशनिंग से निपट सकें जो पुरुषों और महिलाओं के बीच विभाजन को जन्म देता है।

2. अरुणाचलम मुरुगनंतम (Arunachalam Muruganantham) :- यह पैडमैन ऑफ इंडिया के नाम से जाने जाते हैं इस नाम को किसी इंट्रोडक्शन की जरूरत ही नहीं पड़ती। साल 1998 में अरुणाचलम का मेंस्ट्रुएशन के उस डार्क रियलिटी से फेस टू फेस सामना हुआ जिसका सामना भारतीय महिलाएं कर रही थी खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।

उन्होंने महसूस किया कि उनकी पत्नी और आसपास के या फिर कहें की बहुत सी महिलाएं पुराने लत्ते का इस्तेमाल करती थीं, जो अत्यधिक अस्वच्छ और खतरनाक था, जिससे इंफेक्शन होने का खतरा बहुत ज्यादा रहता था।

उसके मेंस्ट्रूअल साइकिल के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित होकर उन्होंने कम लागत वाली सेनेटरी पैड बनाने वाली मशीन का आविष्कार किया। इसने देश भर में हजारों महिलाओं को प्रभावित किया और जमीनी स्तर पर पारंपरिक अनहेल्दी प्रथाओं के दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता फैलाई।

हालांकि उनकी यात्रा तिरस्कार और सामाजिक बहिष्कार से भरी हुई थी क्योंकि उन्होंने महिलाओं के पक्ष में खुलकर बात की और उन रूढ़ीवादी विचारों पर आघात किया जो अपना पैर जमा चुकी थी। ग्रामीणों द्वारा बहिष्कृत किए जाने से लेकर परिवार द्वारा अस्वीकार किए जाने तक अरुणाचलम ने एकदम सही सेनेटरी पैड बनाने अपनी खोज जारी रखी।

यहां तक ​​कि उन्होंने जानवरों के खून से भरे एक रबर मूत्राशय का उपयोग करके एक नकली गर्भाशय के निर्माण की सीमा तक पहुंचाया और पैड की गुणवत्ता का परीक्षण करने के लिए इसे अपने कूल्हे से जोड़ दिया। उनके अथक प्रयासों को न केवल उनके गाँव में बल्कि पूरे विश्व में पहचान मिली है।

3. सचित पुराणिक (Satchit Puranik) :- नेहा सिंह और देवीना कपूर ने 2013 में सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए विशेष कार्यक्रम का आयोजन करना शुरू किया। वे शिल्पा फड़के, समीरा खान और शिल्पा रानाडे के बुक Why Loiter से प्रेरित हुए थे।

अवधारणा से प्रेरित होकर सचित पुराणिक शामिल होना चाहते थे लेकिन उन्हें घटनाओं की विशिष्टता की याद दिला दी गई। उनका सॉल्यूशन था: क्या होगा अगर मैं एक महिला की तरह कपड़े पहनूं? इसकी शुरुआत एक इवेंट से हुई इसका नाम था ‘वॉक लाइक अ वुमन’। इस इवेंट ने एक महिला की तरह चलने की अवधारणा को चित्रित किया।

इसके परिणाम स्वरूप 20 से ज्यादा पुरुषों का एक ब्रिगेड सामने आया जिसने क्रॉस ड्रेस पहनी और मुंबई की सड़कों पर पृथ्वी थियेटर से जूहू बीच तक कदमताल की। यह सब दुनिया को महिलाओं की समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाने और उस विचारधारा को खत्म करने के लिए किया गया था जो यह सोचता है कि ये समस्याएं सिर्फ महिलाओं की अपनी हैं।

एक थिएटर कलाकार, सचित ने बेहतर और अधिक समान भविष्य के वादे के साथ, उत्पीड़ितों और उत्पीड़कों के कंधों से दुनिया को हिंसा की पीढ़ियों की मदद करने का लक्ष्य दिया। तब से, उनका नाटक Loitering सार्वजनिक स्थानों में महिलाओं के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के दौरान पुरुषों के खिलाफ पितृसत्ता कैसे काम करता है, इस बारे में विभिन्न शहरों और देशों में यात्रा कर रहा है।

4. दीपेश टांक (Dipesh Tank) :- निर्भया बलात्कार मामले ने देश को हर गाँव, कस्बे या यहाँ तक कि हर कोने पर अंधेरी छाया के नीचे घोर वास्तविकता में जागृत कर दिया। कई हैरान भारतीयों में से थे दीपेश टांक। उस समुदाय और जेंडर का हिस्सा होने के नाते वह शर्मिंदा थे जिनके सदस्यों ने राक्षसीता को भी लांघ दिया था। उन्होंने एक मजबूत स्टैंड लेने का फैसला किया।

इसलिए 2013 में उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के प्रति हर तरह की यौन और भावनात्मक हिंसा के खिलाफ उठने वाले संगठन वार अगेंस्ट रेलवे रोवडीज़ (WARR) की स्थापना की।

ईव-टीज़र के खिलाफ एक स्पष्ट आह्वान करते हुए भीड़-स्रोत वाली पहल तब से सरकारी सुरक्षा बलों की मदद कर रही है, जैसे मुंबई के रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ), इन स्थानों को महिला यात्रियों के लिए सुरक्षित रखते हैं।

5. शक्ति वाहिनी ( Shakti Vahini) :- तीन भाई, निशि, ऋषि और रविकांत ऐसे माहौल में बड़े हुए जहाँ महिलाओं के खिलाफ हिंसा आम थी। जहां एक ओर, उन्होंने पश्चिम बंगाल के कोयला क्षेत्र में घरेलू हिंसा की घटनाओं को देखा, वहीं दूसरी ओर, उनके माता-पिता उन्हें इसके विपरीत महिलाओं के साथ समान व्यवहार करने की सीख देते थे।

जैसे ही ये लड़के बड़े होकर पुरुष हुए, उन्होंने महिलाओं और बच्चों को दुर्व्यवहार और हिंसा से बचाने के लिए एक एनजीओ, शक्ति वाहिनी की स्थापना की।

एचआईवी / एड्स के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए काम करने से लेकर, ऑनर किलिंग, ह्यूमन ट्रैफिकिंग को रोकने, युवा लड़कियों और महिलाओं को वेश्यालय से छुड़ाने के लिए, यह संगठन राज्य में महिलाओं के लिए एक बेहिचक समर्थन कर रहा है।

ऋषि कांत ने द बेटर इंडिया को बताया, “यह समस्या संस्कृति में इतनी गहराई से निहित है कि पुरुषों को यह एहसास ही नहीं होता कि वे किसी महिला के साथ मारपीट करते हुए अपराध कर रहे हैं। इसलिए जब हम उन्हें महिलाओं का सम्मान करना सिखाते हैं, असंतुलित लिंग अनुपात के हानिकारक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाते हैं और उन्हें बालिकाओं को शिक्षित करने के लाभों के बारे में बताते हैं, तो वे समझने लगते हैं। कई लोगों ने हमें धन्यवाद दिया है और कहा है कि किसी ने भी हमारे साथ इन मुद्दों पर चर्चा नहीं की है।”

अपने लगातार प्रयासों के कारण, NGO ने पूरे देश में छह राज्यों तक विस्तार किया है, और आगे आने का लक्ष्य है! हम आशा करते हैं कि इन पुरुषों के अनुकरणीय कार्य उन्हें आवश्यक ध्यान दिलाएंगे और आदर्श बन जाएंगे।

~Shravan Panadey

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