मुंबई लोकल की “चौथी सीट”

मुंबई लोकल की “चौथी सीट”

कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। लेकिन मेरे आविष्कार के मामले में आवश्यकता की बजाय मजबूरी शब्द ज्यादा मज़बूती से अपनी दावेदारी पेश करते नजर आता है। इस दुनिया में मेरा आगमन आदमी की एडजस्ट करने की प्रवृति के चलते हुआ। जब आप अपनी जांघों के फ़ासलों के बीच की दूरी को समेटने का फैसला लेते हैं तब कहीं मेरे पैदा होने के उम्मीद की किरण अपनी करामात दिखाती है। Hindi Story हिंदी कहानी  Hindi Story हिंदी कहानी 

मेरे जन्म के प्रसव पीड़ा का अंदाजा आप उन तीन लोगों से पूछ कर लगा सकते हैं जो खुद सिर्फ दो लोगों के लिए बनाई बेंच पर बैठे होते हैं और शिष्टाचार के सिपाही की भूमिका निभाते हुए किसी चौथे के आग्रह पर उसे भी उस आसन पर आसीन होने के लिए अपना आशीष देने में आनाकानी नहीं करते। वैसे इनकी यह दरियादिली सिर्फ और सिर्फ दारा सिंह जैसे डीलडौल वालों के सामने ही दिखाई पड़ता है। Hindi Story हिंदी कहानी  Hindi Story हिंदी कहानी 

इन सबके बावजूद जिन्दा होकर भी मुझे जिन्दा होने का एहसास नहीं होता। अस्पताल के आईसीयू में भर्ती किसी मरीज की भांति हर पल हर घड़ी मेरी जान सांसत में ही अटकी रहती है। जैसे वेंटिलेटर पर पड़े व्यक्ति को किसी भी पल अपनी सांसें छीन जाने का डर बना रहता है। ठीक वैसा ही खतरा मेरे अस्तित्व को लेकर बाकी के तीन सीटों पर बैठे लोगों के सब्र के टूटते बांध को लेकर मंडराता रहता है। इधर इनकी टांगों ने अंगड़ाइयां ली और उधर मैं सीबीएसई के इतिहास की किताब के किसी किनारे पर जा छपा। Hindi Story हिंदी कहानी  Hindi Story हिंदी कहानी 

मेरा होना कई लोगों के आँखों को अखरता है। सिर्फ उन्हें ही नहीं जिनके लिए मेरी वजह से अपने जांघों के बीच की दूरी को मज़बूरी में समेटना जरूरी हो गया। उनके साथ-साथ वो खड़े ‘बदनसीब या फिर कहें डरपोक या फिर कहें शर्मीले या फिर कहें दब्बू’ टाइप के लोग जो चाहकर भी अपने बैठने की चाहत को थोड़ी हिम्मत के साथ हमबिस्तर कर मुझे यानी चौथी सीट को पैदा न कर पाएं।  Hindi Story हिंदी कहानी  Hindi Story हिंदी कहानी 

हिंदी की भाषा में कहूँ तो मैं लोगों के बीच बढ़े आपसी प्रेम, स्नेह और समझ की मूर्तरूप हूँ। गणित की भाषा में कहूँ तो टाँगों के बीच की दूरी को घटाकर एक अतिरिक्त तशरीफ़ के लिए निर्माण किया गया क्षेत्रफल हूँ। विज्ञान की भाषा में कहूँ तो तीन सीटों वाली प्राकृतिक संरचना के साथ छेड़छाड़ कर अपनी सुविधा के लिए निर्माण की गई एक कृतिम रचना हूँ। सामाजिक शास्त्र की भाषा में कहूँ तो मैं बढ़ती हुई जनंसख्या का एक स्वाभाविक साईड प्रोडक्ट हूँ। Hindi Story हिंदी कहानी

-रोशन ‘सास्तिक’
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