योगी आदित्यनाथ ने किया बुंदेलखंड के किसानों को खून से खत लिखने पर मजबूर

“लघु और सीमांत किसानों का दायरा इस समय सरकारी आंकड़ों में सिर्फ दो हेक्टेयर का है। किसान इसे पांच हेक्टेयर तक बढ़ाने की मांग को लेकर 45 दिनों से धरना दे रहे हैं। अब किसानों ने अपने खून से खत इसलिए मुख्यमंत्री को लिखा है कि शायद किसान हितैषी होने का दंभ भरने वाली केंद्र और राज्य सरकार को तरस आ जाए।”- विमल कुमार शर्मा, अध्यक्ष, बुंदेलखंड किसान यूनियन

बुंदेलखंड किसान यूनियन के अध्यक्ष विमल कुमार शर्मा के इस बयान में “तरस” शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इस शब्द का इस्तेमाल शर्मनाक है। लेकिन जब कोई सरकार अपनी मांगों को लेकर 45 दिनों से धरने पर बैठे किसानों की सुध तक न ले, तब अपनी जुबान से “तरस” जैसे निराश, हताश और बेबसी भरे शब्द का इस्तेमाल मज़बूरी बन जाता है। बुंदेलखंड के किसान भी मजबूर हो गए हैं, इतने कि सरकार तक अपनी बात पहुँचाने के लिए उन्हें अपने खून से खत लिखना पड़ रहा है।

बीतें 45 दिनों में इससे पहले वह अपनी बात सरकार को सुनाने के लिए और भी तरीकों का इस्तेमाल कर चुके हैं। जैसे कभी जल सत्याग्रह करना, कभी पदयात्रा निकालना तो कभी सिर-मुंडन करवा लेना। लेकिन कथित तौर पर रामराज्य लाने की बात करने वाली योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार पर किसानों द्वारा अपनी मांगो को मनवाए जाने के लिए अपनाए गए विरोध के इन तरीकों का कोई असर नहीं हुआ। यहां तक, किसानों के प्रतिनिधि लखनऊ जाकर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से भी मिले आए। फिर भी किसी अधिकारी तक ने  बुंदेलखंड के इन किसानों की सुध नहीं ली है।

बांदा के जिला मुख्यालय में लघु और सीमांत कृषि भूमि का दायरा बढ़ाने की मांग को लेकर पिछले 45 दिनों से जारी अपने आंदोलन का कोई नतीजा न निकलता देख थक-हार कर बुंदेलखंड के किसानों  ने अपनी बात  सूबे के मुख्यमंत्री तक पहुँचाने के लिए, उन्हें अपनी समस्या और मांग से अवगत कराने के लिए अपने खून से लिखा एक खत भेजा है।

खत में लिखा गया है- “उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम-1960 की धारा-4 की उपधारा-2क में बुंदेलखंड की कृषि भूमि को दूसरे जनपदों की अपेक्षा ढाई गुना कम आंका गया है। यानी प्रदेश के दूसरे जनपदों की एक हक्टेयर जमीन की गणना बुंदेलखंड के ढाई हेक्टेयर जमीन के बराबर है। इस लिहाज से मानक भी दोगुना किया जाना किसान हित में होगा।”
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