रंगभेद – एक सामाजिक अपराध

देश विदेश में रंग भेद का चलन बेहद आम है, लेकिन इसे सही मायने में देखा जाये तो यह एक मानसिक बीमारी है .

विश्वकप जैसे आयोजनों में जब भी इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के बीच कोई मुकाबला होता है तब एक खास तरह का रंगभेदी चुटकुला सोशल मीडिया पर ढेर साले लोगों द्वारा बहुत ज्यादा चटखारे के साथ शेयर किया जाता है। किसी के त्वचा के रंग को मजाक का विषय बनाने वाली मानसिकता की कुरूपता पर चर्चा करने से पहले चलिए वह रंगभेदी चुटकुला जान लेते हैं;

बड़ा मजेदार मैच चल रहा है टीवी पर।
ब्राइटनेस बढ़ाओ तो इंग्लैंड के खिलाड़ी नहीं दिखते।
ब्राइटनेस घटाओ तो वेस्टइंडीज के खिलाड़ी गायब।

यह चुटकुला इसलिए भी ज्यादा मारक जान पड़ता है क्योंकि हम उस भारत के लोग हैं, जिसके राष्ट्रपिता ने दक्षिण अफ्रीका में जाकर वहां के काले लोगों के साथ हो रहे रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। दक्षिण अफ्रीका में काले लोगों के लिए किए गए संघर्ष के दौरान ही गांधी जी ने अहिंसक सत्याग्रह जैसे हथियार को जन्म दिया। फिर इसी हथियार के जरिए भारत की गुलामी की जंजीरों को काटा। काले रंग से जुड़े अपने मूल को भूल जाना भी हमारे अंदर रंगभेद की जड़ों को मजबूत कर रहा है। हम ही वह लोग हैं जो आज भी कभी इंग्लैंड तो कभी ऑस्ट्रेलिया में अपने रंग के कारण अपने साथ होने वाले भेदभाव को लेकर आँसू टपकाते रहते हैं।

कहने का मतलब हम वो लोग हैं जो खुद रंगभेद का शिकार होते रहते हैं। बावजूद इसके हम रंगभेद से जुड़े चुटकुले ही नहीं बनाते बल्कि रंगभेद करते भी हैं। गोरा आदमी काले और सांवले आदमी को अपने सामने गौण मानता है। तो वहीं सांवला आदमी काले रंग के आदमी से खुद को श्रेष्ठ समझता है।

लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि जो सांवला आदमी खुद किसी गोरे आदमी के द्वारा रंगभेद का शिकार होता है वही अपने रंग के प्रति उसके रवैए को गलत ठहराता है। रंगभेद से पीड़ित ऐसा व्यक्ति खुद किसी काले आदमी के समक्ष गोरे आदमी वाली गलती क्यों दोहराता है ? काला आदमी भी किसी गोरे आदमी को देख अपने आप हीन भावना से ग्रसित क्यों हो जाता है?

इसका कारण है, गोरे रंग की श्रेष्ठता का विरोध करने वाले भी हमेशा इस उम्मीद में रहते हैं कि किसी न किसी तरीके से वह भी गोरे हो जाएं । यानी रंगभेद का मूल कारण गोरे व्यक्ति का अपने गोरे रंग पर अभिमान होना नहीं बल्कि काले रंग वाले व्यक्ति का अपने प्राकृतिक रंग को स्वीकार न करना है। कारण? कारण हमारे समाज की मुख्यधारा द्वारा गोरा को खूबसूरती का पर्यायवाची बना देना है। ‘खूबसूरती का सीधा मतलब गोरा होने से है’ यह बात हमारे मन-मस्तिष्क में कुछ इस तरह से ठूँस दी जाती है कि जब भी हमें किसी खूबसूरत आदमी की कल्पना करने के लिए कहा जाता है तो जिस आदमी की तस्वीर हमारे दिमाग में आती है उसका रंग निश्चित ही गोरा होता है।

गोरा हो जाने का जो पागलपन लोगों पर सवार हो गया है उस पागलपन का गोरा करने का दावा करने वाली. ब्यूटी प्रोडक्ट्स  बनानी वाली कंपनियों ने बहुत फायदा उठाया है।

गोरे को गोरा कहने पर लोग नहीं चिढ़ते तो फिर काले को काला कहने पर लोग मुँह क्यों बनाते हैं ? ऐसे बचकाना तर्कों के सहारे रंगभेदी लोग अपनी सोच को सही साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। लेकिन इन्हें इतनी समझ नहीं कि गोरे रंग के व्यक्ति को जब कोई गोरा कहता है, तब वह उसके रंग का महिमामंडन करता है। लेकिन जब कोई किसी काले रंग के व्यक्ति को काला कहता है, तब वह या तो उसके रंग का उपहास उड़ा रहा होता है या फिर उसके काले रंग को लेकर उसे अपमानित कर रहा होता है।

गोरा हो जाने का जो पागलपन लोगों पर सवार हो गया है उस पागलपन का गोरा करने का दावा करने वाली ब्यूटी प्रोडक्ट्स बनानी वाली कंपनियों ने बहुत फायदा उठाया है। अकेले भारत में सालाना 9000 करोड़ रुपए का सौंदर्य बाजार है।  लेकिन जब इन सबसे भी कोई खास असर नहीं हुआ तो लोगों ने खुद को अपने फोन से खींची गई तस्वीरों में गोरा करने के लिए ब्यूटी कैमरा, यू कैम परफेक्ट जैसे एप्लिकेशन का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। आज की तारीख में अगर आप गूगल प्ले स्टोर पर जाएं तो तस्वीर को गोरा करने के लिए बनाए गए एप्लिकेशन को 10-10 करोड़ लोगों ने अपने मोबाइल में डाउनलोड किया हुआ है। हमारे-आपके मोबाइल फोन में मौजूद ऐसे एप्लिकेशन इस बात का सबूत हैं कि रंगभेद का शिकार हम लोगों को गोरा रंग कितना पसंद है।

हाल ही में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, “हमारे यहां काले रंग को लेकर हीन भावना है अपने सांवले रंग पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि बचपन से ही उन्हें हर बार इस बात का एहसास दिलाकर नीचा दिखाने की कोशिश की गई कि उनका रंग बाकियों से कुछ कम है।

हमारे समाज पर हमारी फिल्में बहुत गहरा असर डालती हैं। किसी विषय को लेकर किसी फिल्म में जैसा दिखाया जाता है, हमारे समाज में उस विषय के संबंध में काफी हद तक वैसी ही अवधारणा बन जाती है। अब आप बताइए कि आपने अब तक ऐसी कितनी भारतीय फिल्में देखी हैं जिनमें हीरोइन की त्वचा का रंग गोरा नहीं बल्कि काला होता है। एक? दो? मुश्किल से उँगलियों पर गिनने भर जितनी होंगी। यानी हमारा फ़िल्म जगत भी रंग को लेकर अन्य लोगों जितना ही बीमार है। अभिनेत्री नंदिता दास ने हाल ही में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, “हमारे यहां काले रंग को लेकर हीन भावना है”। अपने सांवले रंग पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि बचपन से ही उन्हें हर बार इस बात का एहसास दिलाकर नीचा दिखाने की कोशिश की गई कि उनका रंग बाकियों से कुछ कम है।

नंदिता का मानना है कि समाज की मुख्यधारा के अनुसार अगर आप गोरी नहीं हैं, तो आप सुंदर नहीं हैं, क्योंकि जितनी फ़िल्में हैं, जितने विज्ञापन हैं, जितनी ब्यूटी मैग़ज़ीन्स हैं और टीवी सीरियल हैं, सब आपको किसी न किसी तरह से कहते रहते हैं कि आप पर्याप्त सुंदर नहीं हैं। विज्ञापनों में सिर्फ रंग के चलते जॉब ना मिलने, दोस्त ना बनने, शादी ना होने तक कि बात दिखाकर समाज में रंग को लेकर ऐसी सोच को और ज्यादा गाढ़ा करने का खतरनाक खेल चलता रहता है। ऐसे विज्ञापनों के चलते जो लोग अपने रंग को लेकर परेशान ना हों, उनके अंदर भी अपने रंग के लिए हीन भावना भरने लगती है।

फ़िल्म ही नहीं बल्कि रंगभेद से जुड़े ऐसे मामले, समाज की सोच को सही दिशा देने के लिए जिम्मेदार राजनीति से जुड़े लोगों के द्वारा भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं। साल 2015 में रंगभेद से जुड़ा ऐसा ही एक मामला खबरों की सुर्खियां बना था। साल 2015 में भारतीय जनता पार्टी के नेता गिरिराज सिंह ने रंग के संबंध में एक ओछा बयान दिया था। बकौल गिरिराज, “अगर राजीव जी ने किसी नाइजीरियन महिला से शादी की होती, जिसकी गोरी चमड़ी ना होती तो क्या कांग्रेस पार्टी उसका नेतृत्व स्वीकार करती”। इस बयान को लेकर काफी हंगामा हुआ था। यहां तक की नाइजीरिया के प्रतिनिधिमंडल ने भी भारत से इस बयान के संबंध में शिकायत तक दर्ज कराई थी।

रंग को लेकर हमारी मानसिकता को आप गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर के बयान को याद कर भी समझ सकते हैं। एक बार जब नर्सों की हड़ताल चल रही थी, तब पारसेकर ने  उनके मुद्दों को लेकर अपनी राय रखने के  बजाय यह बयान जारी किया था कि नर्स धूप में बैठकर हड़ताल ना करें। इससे उनका रंग ‘डार्क’ हो जाएगा।नतीज़तन उनकी शादी में इससे अड़चने पैदा हो सकती हैं। लक्ष्मीकांत का यह बयान गलत तो था, लेकिन इसमें कुछ नया नहीं था। अगर आप मेरी बात से सहमत नहीं हैं तो आपअखबारों के रविवार को छपने वाले अंक में शादी के इश्तिहारों से संबंधित कॉलम को पढ़ना शुरू कर देना चाहिए। जिसमें लड़की का रंग कैसा होना चाहिए वाले कॉलम में बोल्ड में गोरा लिखा होता है।

आज सोशल मीडिया का जमाना है। कहने को तो इन साइट्स पर कथित रूप से जागरूक और प्रोग्रेसिव लोग रहते हैं। लेकिन सोशल मीडिया का ‘वैश्विक नागरिक’ भी आपको अफ्रीका की किसी काली रंग की लड़की पर बने Meme पर Laughing रिएक्शन देता हुआ मिल जाएगा। मतलब आपको इस बात का जरा भी अंदाजा है कि जिस तरह आप अफ्रीकी लड़के-लड़कियों की तस्वीरों पर ‘इससे शादी करूंगी’, ‘उससे दोस्ती करूंगी’ जैसे Meme बनाकर दिनभर उनका मजाक उड़ाते रहते हैं। अगर ठीक उसी तर्ज पर अमेरिकी और यूरोपीय देशों में रहने वाले ‘गोरे’ लोग आपकी भूरे रंग की माँ-बीवी-बहन की तस्वीरों को बदसूरती की मूरत कहकर मजाक उड़ाएँ तो?

लेकिन रंगभेद भारत में सनातन से चली आयी समस्या है। अगर ऐसा नही होता तो कान्हा यशोदा मैया से यह सवाल कभी नही करते, “राधा क्यों गोरी…..मैं क्यों काला?

हम सभी को यह समझना होगा कि क्या हम इंसानों ने अपने वजूद को इतना सिकोड़ लिया है कि आज वह सिर्फ शरीर और उसके रंग तक सिमटकर रह गया है। हम किस’से बात करेंगे, किस’से दोस्ती करेंगे, किस’से प्यार करेंगे यह सब सिर्फ इस आधार पर तय करेंगे कि उस ‘किस’ का रंग कैसा है? किसी को किसी के रंग को लेकर अपना नहीं सकते तो मत अपनाइए। लेकिन उसकी त्वचा के रंग को आधार बनाकर कम से कम उसका अपमान तो मत कीजिए।

रंगभेद कोई आज की नई समस्या नहीं है। यह समस्या बहुत पुरानी है। चलिए आपको फ्रांस के एक ऐसे यात्री के बारे में बताते हैं जिसने अपनी किताब ‘ट्रवेल्स इन द मुग़ल एम्पायर’ में भारत मे गोरे रंग को लेकर श्रेष्ठता भरी सोच का वर्णन किया है। फ्रांसुआ बेर्नियर 1656 में दिल्ली आए थे। वो 1668 में अपने देश वापस लौटे। भारत से लौटकर जब उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ट्रवेल्स इन द मुग़ल एम्पायर’ में कई बार इस बात को लिखा है कि वो जहाँ भी जाते थे उनका स्वागत खूब होता था। उनके अनुसार इसकी एक वजह भी थी उनका ‘श्वेत’ होना।
यह तो रही मध्यकाल की बात। लेकिन रंगभेद भारत में सनातन से चली आयी समस्या है। अगर ऐसा नही होता तो कान्हा यशोदा मैया से यह सवाल कभी नही करते, “राधा क्यों गोरी…..मैं क्यों काला?

 

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