वह डॉन जिनके डर के साये में जीती थी माया नगरी मुंबई 

कभी ना थमने वाली देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में ना जाने कितने लोग रोज़ाना सपने लेकर आते हैं, और मुंबई भी काबिल लोगों को उनका हक़ ज़रूर देती है। मगर कुछ ऐसे लोग भी मुंबई की पाक ज़मीन पर आये जो अपना हक़ मेहनत से नहीं बल्कि लालच और बुरे कामके जरिये हासिल करने की कोशिश की। इस माया नगरी को अपने दहशत से कई बार तोड़ने की कोशिश की गयी। मगर मुंबईकरों ने हर बार एकजुट होकर इन माफियाओं का सामना किया। अंडरवर्ल्ड हमेशा से मुंबई पर हावी रहा है। गैंगवार, एनकाउंटर, हफ्ता वसूली करने वाले आपको कई सारे डॉन मुंबई में मिल जायेंगे। आइये देखते हैं कुछ ऐसे डॉन के बारे में जिनका नाम पूरे दुनिया में मशहूर है।

1.करीम लाला

एक ऐसा नाम जिसने मुम्बई में दहशत की शुरुआत की। अफगानिस्तान के पस्तुन परिवार में 1911 में जन्मा अब्दुल करीम शेर खान 1930 के दशक में मुम्बई आ गया। करीम लाला पठानों के साथ मिलकर झगड़ों का निपटारा करता था। बाद में उसने जुआ का अड्डा चलाना शुरू किया। करीम के अंदर लालच हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती गई। उसने सोने,चांदी और इलेक्ट्रॉनिक के तस्करी में भी हाथ लगाया। उसने ड्रग्स का व्यापार किया।करीम लाला को हाजी मस्तान और वरदराजन का भी जबरदस्त साथ मिला। इन तीनों दहशतगर्दों की तिकड़ी ने 70 के दशक तक मुंबई पर अपना धाक जमा लिया। 1985 में भतीजे शमद खान की हत्या के बाद से करीम लाला का पतन शुरू हो गया। लाला के भतीजे को दाऊद इब्राहिम ने अपने बड़े भाई शब्बीर कसकर के मौत के बदले में मारा था। 90 वर्ष की आयु में 2002 में करीम लाला नाम के आतंक का परिंदा इस दुनिया से चला गया।

2. वरदराजन मुदलियार:

वर्धा भाई के नाम से विख्यात वरदराजन का जन्म 1 मार्च 1926 को तमिलनाडु के वेल्लोर में हुआ था। तमिलनाडु का यह डॉन 1945 में मुम्बई आया और वी टी स्टेशन पर बोझा ढोने का काम शुरू किया। जल्द ही मस्तान की मदद से बंदरगाह से कार्गो चुराना शुरू कर दिया। काले कारनामों से हो रही कमाई ने वरदराजन को अपराध की दुनिया में धकेल दिया। वर्धा भाई ने धारावी, माहिम, माटुंगा, सायन-कोलीवाड़ा, और चूनाभट्टी से लेकर घाटकोपर,और चेंबूर तक अपना दबदबा बनाया और आतंक का माहौल बनाकर लोगों के दिल में खौफ पैदा कर दी। लोगों में अपनी पहचान बनाये रखने के लिए वर्धा ने गरीबों की मदद भी की। यही वजह रहा कि दक्षिण भारतीय समाज के लिए वो भगवान गया था। 80 के दशक के शुरुआत में ही पुलिस ऑफिसर वाय. सी. पवार के साथ वर्धा की खटक गयी। अब एक पुलिस अधिकारी ने आतंक के दुनिया को तबाह करने की कोशिश की। जिसकी वजह से वर्धा के साथियों को या तो जेल में डाल दिया गया या फिर वो डर से बिखर गए। ऐसे में वर्धा अकेला पड़ चुका था जिसकी वजह से अवैध जुए और शराब के अड्डे बंद हो गए। 1983 के अंत में अंडरवर्ल्ड का साम्राज्य प्रतिबंधित हो गया इसलिए वो मुंबई छोड़ने को मजबूर हो गया। मुंबई को छोड़ने से पहले उसने मुंबई को जी भर के लूटा। 61 साल की उम्र में 2 जनवरी 1988 को हार्ट अटैक की वजह से उसकी मौत हो गई।

3. हाजी मस्तान

1 मार्च 1926 को तमिलनाडु में जन्मे हाजी मस्तान का पूरा नाम मस्तान मिर्ज़ा हैदर था। यह आकिब हुसैन, बावा और सुल्तान नाम से भी प्रसिद्ध था। ये संयोग ही था कि मुंबई से बाहर जन्मे लोगों ने मुंबई को जी भरके लूटा। 1934 में भी एक 8 साल का मस्तान अपने पिता के साथ मुम्बई आया। किसीको यह नहीं पता था कि 8 साल का यह लड़का मुंबई में ही बड़ा होकर मुंबई को तबाह करेगा। 18 साल की उम्र में बंदरगाहों पर कुली का काम करने के दौरान उसने घड़ी, सोना, और ट्रांज़िस्टर की तस्करी भी शुरू कर दी। कुछ समय बाद अवैध शराब के दुनिया में भी उतर गया। बुरे कामों में लिप्त इस मस्तान का सितारा चमकता गया।इसने सिर्फ अपराध में ही नहीं बल्कि फ़िल्म प्रोड्यूसर, फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर, नेता के तौर पर भी अपनी पहचान बनाई। मस्तान मुंबई का पहला ऐसा गैंगेस्टर था जिसने एक सेलिब्रिटी के तौर पर अपनी पहचान बनाई। माटुंगा, सायन, धारावी और कोलीवाड़ा में रहने वाले गरीब तमिल लोगों के बीच इसे बड़ा सम्मान मिला। यह बड़ा ही शौकीन आदमी था। अक्सर सफेद पोशाक और जूते पहनने वाला मस्तान महंगी सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए सफेद रंग की मर्सडीज़ बेंज से चलता था। 70 के दशक में आपातकाल के दौरान गिरफ्तार होने के बाद से ही उसकी चमक ख़त्म हो गई। जेल से छूटने के बाद अपने गुनाहों से छुटकारा पाने के लिए वो हज करने मक्का चला गया। हज से लौटने के बाद से ही उसे हाजी मस्तान के नाम से जाना जाता है। मक्का से लौटने के बाद उसने राजनीति में कदम रखा और 1985 में दलित मुस्लिम सुरक्षा महा संघ की स्थापना की। अंत में 9 मई 1994 को 68 साल की उम्र में मुंबई पर बोझ बन चुका मस्तान दुनिया से उठ गया ।

4. अरुण गवली:

17 जुलाई 1955 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कोपरगाँव में जन्मे अरुण गवली का पूरा नाम अरुण गुलाब अहीर है। गवली ने जिंदगी के शुरूआती दिनों में मुंबई के परेल, चिंकपोकली, भायखला, और कॉटन ग्रीन इलाकों में टेक्सटाइल मिल में काम किया। मिलों के बंद होने की वजह से परेशान गवली ने ज्यादा पैसा कमाने का शॉर्टकट ढूंढा और मटका गैम्बलिंग और हफ़्ता वसूली का काम शुरू कर दिया। अपराध की दुनिया में कदम रखने से पहले अरुण गवली मध्य मुंबई के भायखला में दगड़ीचाल के आसपास दूध बेचता था। यह पेशा इसका पारिवारिक पेशा था। 80 दशक में इसने गैंगस्टर रामा नाईक का दामन थामा और भायखला कंपनी को ज्वाइन किया।और दाऊद के खेप को सुरक्षा दिया। पुलिस ने नाईक एनकाउंटर कर दिया। 90 के दशक में गवली का आतंक इतना गहरा गया था कि शरद शेट्टी, छोटा राजन, छोटा शकील जैसे डी-कंपनी के गैंगस्टर मुम्बई छोड़कर दुबई भाग गए। गवली ने खुद को बचाने के लिए राजनीति को चुना। राजनीति में घुसने के बाद उसने अपनी पार्टी अखिल भारतीय सेना बनाई और 2004 में चिंकपोकली निर्वाचन क्षेत्र से एमएलए बना। मगर 2007 में शिव सेना के विधायक की हत्या के बाद उसकी चमक ख़त्म हो गई। 2012 में उसे अपराध के लिए दोषी करार दिया गया और आजीवन कारावास की सजा काट रहा है

5. दाऊद इब्राहिम:

मायानगरी मुंबई को खून के आँसू रुलाने वाला मोस्टवांटेड डॉन दाऊद इब्राहिम 27 दिसंबर 1955 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में जन्मा। इस कुख्यात गैंगेस्टर ने मुंबई को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ा। दाऊद का बाप एक पुलिस कांस्टेबल था जिसे हाजी मस्तान बहुत परेशान करता था। इसी वजह से उसने अपने बाप का बदला लेते हुए मस्तान को पीछे छोड़ते हुए शहर पर अपनी पकड़ बनाई और सबसे बड़े डॉन के नाम से चर्चित हो गया। दाऊद ने पुलिस के साथ चाल खेली और करीम लाला के गैंग को खत्म कर दिया। 80 के दशक में दाऊद का नाम मुम्बई अपराध जगत में तेजी से उभरा और जल्द ही उसकी पहुंच सट्टे से लेकर फ़िल्म जगत तक हो गई। रंगदारी और हवाला के जरिए दाऊद ने दुनिया के कई कोने में अच्छी खासी प्रोपर्टी बनाई। दाऊद ही वह आतंकी है जिसने 1993 में मुंबई सीरियल ब्लास्ट करवाकर निर्दोष लोगों को मौत की नींद सुला दी। 1993 में दाऊद ने मुंबई को तहस नहस करने के हर पैंतरे को आजमाया और काफी हद तक अपने नापक मनसूबे में सफल भी रहा। 1984 में दाऊद मुम्बई छोड़कर दुबई चला गया था।भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कोई है तो वह है दाऊद। आज भी पकिस्तान के कराची में बैठा दाऊद अपने इशारे पर भारत पर हमले करवाता रहता है। 2001 में फोर्ब्स द्वारा जारी की गई भगौड़ों की सूची में दाऊद का चौथा स्थान है। इसके सर पर 25 मिलियन यूएस डॉलर के इनाम हैं। आज भी दाऊद का साम्राज्य दुनिया में फैला हुआ है।

6. अबू सलेम:

इसका पूरा नाम अबू सलेम अब्दुल कय्यूम अंसारी है। जैसे इसके नाम अनेक हैं वैसे इसके काम भी अनेक हैं। अकील अहमद आज़मी, कैप्टन और अबू समान के नाम वाला, 1968 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में जन्मा अबू सलेम शुरुआती दिनों में  दिल्ली में कैब ड्राइवर था। मगर मुंबई की चमक ने उसे इस तरह अपनी ओर आकर्षित किया कि बाद में वह मुंबई आकर अंधेरी में एक टेलीफोन बूथ चलाने लगा। इस दौरान उसने पैसा कमाने के लालच में छिटपुट अपराध को भी अंजाम देना शुरू कर दिया।तभी 80 के दशक में उसका संपर्क दाऊद के भाई अनीश से हुआ। अनीश से मुलाकात के बाद सालेम दाऊद गैंग का बंदूक धावक बन गया। दाऊद गैंग में शामिल होने के बाद अबू सालेम के सपनों को पंख लग गया। अब वो बड़े बड़े कारनामों को अंजाम देने लगा। 1993 में मुंबई को खून के आँसू रुलाने वाले सिलसिलेवार बम धमाके में अबू सालेम भी शामिल था। सलेम ने बॉलीवुड इंडस्ट्री में भी दहशत फैलाई। सुभाष घई और राजीव राय जैसे फ़िल्म निर्माताओं को धमकी देने के नाते सलेम का कद बढ़ता चला गया। अब सलेम उस पागल कुत्ते की तरह हो चुका था जो किसीको भी काट ले। टी-सीरीज के मालिक गुलशन कुमार की हत्या के पीछे सलेम का भी हाथ माना जाता है।1998 में सलेम, दाऊद से दूर हो गया। अब सलेम खुद में एक डॉन बन चुका था। मुंबई ब्लास्ट के बाद से ही फरार चल रहा सलेम सन 2002 में लिस्बन में अपनी गर्लफ्रेंड-अभिनेत्री मोनिका बेदी के साथ गिरफ्तार हो गया। बाद में सन 2005 में उसका भारत में प्रत्यर्पण हो गया।1995 में बिल्डर प्रदीप जैन की हत्या मामले में दोषी सलेम आज आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। आसमान में उड़ने की ख्वाहिश रखने वाला परिंदा आज बंद पिंजड़े में फड़फड़ा रहा है।

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