वो टूटी-फूटी अंग्रेजी भाषा में लिखा गया खत जिसके चलते ट्रेन में शुरू हुई टॉयलेट की व्यवस्था

आज हम भारत में हर घर शौचालय की बात कर रहे हैं। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि 1853 में शुरू होने वाले भारतीय रेल में 1909 तक टॉयलेट की व्यवस्था नहीं थी। साल 1891 में सिर्फ प्रथम श्रेणी के ट्रेन में टॉयलेट की सुविधा उपलब्ध थी। लेकिन पूरी ट्रेन में टॉयलेट की व्यवस्था करने का काम 55 साल बाद एक रेल यात्री द्वारा टूटी-फूटी अंग्रेजी में लिखे खत के जरिए रेल प्रशासन को किये गए शिकायत के बाद आरम्भ किया गया।

शिकायत करने वाले उस सज्जन का नाम था ओखिल चन्द्र सेन। दरअसल, हुआ कुछ ऐसा कि पश्चिम बंगाल के यात्री ओखिल चन्द्र सेन का जब पेट ख़राब हुआ तब वो हल्का होने के उद्देश्य से साहेबगंज के अहमदपुर स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही शौच के लिए चले गए। लेकिन उनके अनुसार उनके शौच से लौटने के पहले ही ट्रेन के गार्ड ने सीटी बजा दी और ट्रेन उन्हें वहीं छोड़कर चल पड़ी।

इसके बाद वो एक हाथ में लोटा तथा दूसरे हाथ से अपनी लुंगी संभालते हुए ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़े। लेकिन गार्ड की बेरुखी के चलते ट्रेन को पकड़ने की उनकी कोशिश नाकाम रही। उलटे ट्रेन को पकड़ने के चक्कर में दौड़ते वक्त उनकी धोती खुल गई और वो सभी के सामने निर्वस्त्र हो गए। उन्हें उस हालत में देखकर वहाँ मौजूद सभी लोग खिलखिलाकर हँसने लगे, जिसके चलते उन्हें बहुत ज्यादा शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। उनकी शिकायत थी कि किसी यात्री की सुविधा के लिए ट्रेन को कुछ मिनटों के लिए क्यों नहीं रोका जा सकता। उन्होंने उनके साथ ऐसे व्यवहार के लिए जिम्मेदार गार्ड पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग अपने खत के जरिए रेल विभाग से की थी।

ओखिल बाबू द्वारा लिखे गए उस मजेदार शिकायती खत की गंभीरता को संज्ञान में लेते हुए रेलवे ने 1909 से ही भारतीय रेल के सभी डिब्बों में शौचालय की व्यवस्था करने का कार्य युद्धस्तर पर शुरू कर दिया था। खैर वो तो उस समय की बात थी लेकिन समय के साथ सामान्य टॉयलेट से होने वाली गंदगी से भी रेल यात्रियों को असुविधा होने लगी। जिसके चलते अब भारतीय रेल में ‘बायो टॉयलेट’ की व्यवस्था की जा रही है। 

पढ़िये ओखिल बाबू के पत्र का जस का तस हिंदी रूपांतरण

प्रिय श्रीमान्,

मैं पैसेंजर ट्रेन से अहमदपुर स्टेशन आया और कटहल की वजह से मेरा पेट फूल रहा था। मैं शौच के लिए वहां एकांत में गया। मैं शौच से निवृत्त हो ही रहा था कि ट्रेन के गार्ड से सिटी बजा दी। ट्रेन जाते हुए देख मैं एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ में धोती पकड़कर दौड़ा, लेकिन धोती उलझने की वजह से प्लेटफार्म पर गिर पड़ा।

मेरी धोती खुल गई और मुझे देखकर वहां मौजूद सभी महिलापुरुष हंसने लगे जिसके चलते मुझे शर्मिन्दा होना पड़ा। मेरी ट्रेन छूट गई और मैं अहमदपुर स्टेशन पर ही रह गया। यह कितनी बुरी बात है कि एक यात्री शौच के लिए गया हो और ट्रेन का गार्ड कुछ मिनट उसका इंतजार भी नहीं कर सकता। इसलिए मेरा विनम्र निवेदन है कि जनता की भलाई के लिए उस गार्ड पर भारी जुर्माना करें।

आपका विश्वसनीय सेवक

ओखिल चंद्र सेन

 

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