शादी के प्रतीक सिर्फ महिलाओं पर ही क्यों होते हैं? सवालों का ढेर जिनके जवाब ढूंढ रही एक आधुनिक महिला

एक शादीशुदा महिला अपने जहन में उठने वाले कुछ सवालों के जवाब ढूंढ रही है। ये तो सच है कि शादी से पहले और शादी के बाद की ज़िन्दगी में अंतर आ ही जाता है। एक बेटी होते हुए एक महिला को शादी से पहले तो कुछ हद तक आज़ादी थी मग़र शादी के बाद रस्मों-रिवाजों की एक लंबी लिस्ट उसके सामने होती है, जिसे निभाना एक पतिव्रता स्त्री के लिए अत्यंत आवश्यक होता है।

एक महिला की शादी हुए एक साल बीत गए हैं। उसे समाज के कई हिस्सों से उठने वाले सवालों का सामना करना पड़ता है। इन सवालों में कुछ सवाल हैं, जैसे- शादीशुदा अवतार में क्यों नहीं हो? अभी तक कोई ‘गुड न्यूज’ क्यों नहीं सुनाया?…अगैरह-वगैरह। शुरुआत में तो कुछ सवालों ने उसे विस्मित कर दिया। जबकि, कुछ सवालों ने उसे विचार करने पर मजबूर कर दिया कि गहना धारण करना और अपनी वैवाहिक स्थिति को साबित करना आवश्यक क्यों है?

उस महिला को भारत के पूर्वी भाग में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इसे अंग्रेजी में बंगाल और बंगाली में बांग्ला कहते हैं। यह महिला बचपन से आज तक यही देखते हुए बड़ी हुई है कि औरतें अपनी मांग में सिंदूर या कुमकुम लगाती हैं। माथे पर एक बड़ी लाल बिंदी और हाथ में कांच की चूड़ियां पहनती हैं।

उस महिला के लिए महानगरीय परिवेश में पाले जाने के बाद, यह देखना दिलचस्प था कि असम की विवाहित महिलाओं की भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। जबकि, बिहार की महिलाएं अपने बालों के रंग में नारंगी रंग का कुमकुम लगाती हैं।

पंजाब की नवविवाहित महिलाएं चुड़ा पहनती हैं, जो उनकी बाहों तक होता है। जबकि नेपाली महिलाएं हरे रंग का मंगलसूत्र पहनती हैं। दूसरी ओर, बंगालियों और असमियों के पास कोई मंगलसूत्र नहीं होता है, जो उस महिला के छोटे से दिमाग को असंख्य सवालों से भर देता है।

अब वह महिला भारत के दक्षिणी हिस्से की हो गई है, क्योंकि उसने एक तमिल व्यक्ति से शादी जो कर ली है। यहां उसे कुछ अनोखा दिखाई पड़ा। विवाहित तमिल महिलाएं अपने धर्म के अनुसार मोटी सोने की चेन, पायल और पैर की अंगुली के छल्ले पहनती हैं।

एक ही आस्था का पालन करने के बावजूद महिलाओं के पीछे कई तरह के रीति-रिवाज क्यों हैं? देश भर में महिलाओं को कई तरह के रीति-रिवाजों से जोड़ा गया है। फिर भी पुरुष विवाहित हैं या नहीं, उनपर इस तरह की कोई बंदिश नहीं होती।

एक महिला के लिए अपनी “विवाहित होने” को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना इतना महत्वपूर्ण क्यों है? किसी की नारीत्व को साबित करने के लिए कुछ मानदंडों का पालन करना क्यों आवश्यक है?

उस महिला का मानना ​​है कि विवाह दो व्यक्तियों के बीच एक प्रतिबद्धता है, जो प्रेम और समर्पण के वादों से एक-दूसरे से बंधे हैं। वह समझती है कि कुछ रीति-रिवाजों से जुड़ी कुछ भावनाएँ हैं, लेकिन फिर उन्हें नारीत्व के मानदंड के रूप में स्थापित करना केवल पितृसत्ता को पुष्ट करता है!

और सबसे महत्वपूर्ण बात, आपकी गर्भावस्था या वैवाहिक स्थिति के बारे में पड़ोसी चाचीओं द्वारा आपसे किए गए सवालों ने पितृसत्ता को इस हद तक आंतरिक कर दिया है कि इन महिलाओं को ऐसा लगता है जैसे इन सख्त रीति-रिवाजों को महिलाओं पर थोपना या बांधना एक अंतर्निहित कार्य है, जो वे निभाती हैं।

ऐसी महिलाएं हो सकती हैं जो एक दुखी वैवाहिक जीवन से गुजर रही हैं या एक उचित वर की तलाश में असफल हैं। ऐसी महिलाएं हो सकती हैं जो वर्तमान में बच्चा नहीं चाहती हैं या प्रजनन उपचार से गुजर रही हैं! हम इन परिस्थितियों को लेकर सवाल क्यों उठाते रहते हैं?

हम क्यों नहीं जीते और दूसरों को जीने नहीं देते? जीवन एक यात्रा है जहाँ अंत में आपको पछतावे के साथ नहीं, बल्कि एक संतुष्ट दिल और आत्मा के साथ मरना चाहिए! आप उस तरह क्यों नहीं जीते जैसे जीना पसंद है?

~Shravan Pandey

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