समय के साथ किसान और किसानी में हुए आमूलचूल परिवर्तन

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आधुनिकता और परम्परा के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया से भारत में कृषि के क्षेत्र में परिवर्तन की प्रक्रिया में नाटकीय संघर्ष जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं और सुलह-समझौते तथा समन्वय की जो जटिल प्रणाली तैयार हुई वैसी दुनिया में कहीं और नजर नहीं आती।

भारत में आधुनिक टेक्नोलॉजी का कृषि पर भारी असर पड़ा है। पुराने समय से ही भारतीय किसानों को सिंचाई टेक्नोलॉजी की काफी अच्छी जानकारी थी। ब्रिटिश शासनकाल में सिंचाई वाले क्षेत्र में काफी बढ़ोत्तरी हुई हालाँकि ब्रिटिश शासकों ने बार-बार पड़ने वाले अकालों को ध्यान में रखकर काफी देरी से सिंचाई की सुविधा में विस्तार के कदम उठाए। सिंचाई की सुविधाएँ बढ़ने से उपज बढ़ी, विशेष रूप से वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन बढ़ा ब्रिटिश शासनकाल में ही 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में रॉयल कृषि अनुसंधान परिषद के गठन और कई कृषि महाविद्यालयों के खुलने से कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिक ज्ञान की नींव पड़ी। इन संस्थानों ने बेहतर किस्म के बीज विकसित किए तथा फसलों की अदला-बदली करके बोने जैसे कई वैज्ञानिक तौर-तरीकों का प्रचार कर बड़ी अच्छी शुरुआत की।

Image result for पारंपरिक खेतीलेकिन इस पहल के बावजूद इन सब प्रयासों के व्यापक और दूरगामी परिणाम सामने नहीं आए। कारण यह था कि औपनिवेशिक सरकार ने कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में पर्याप्त पूँजी निवेश नहीं किया। जो भी अनुसंधान हुआ वह वाणिज्यिक महत्त्व की फसलों पर हुआ और वह भी सिंचाई वाले इलाकों तक सीमित रहा। आधारभूत ढाँचे वाले और टेक्नोलॉजी सम्बन्धी इन कमियों की वजह से ही कृषि के क्षेत्र में विकास का स्तर नीचा रहा। लेकिन इस क्षेत्र में गतिशीलता की कमी का प्रमुख कारण संस्थागत बाधाएँ भी थीं, जिनकी वजह से नई टेक्नोलॉजी का प्रसार अवरुद्ध हो गया। इन बाधाओं में खेती की पट्टेदारी प्रथा, बेनामी-जमींदारों की जकड़न और काश्तकारों पर कर्ज के बढ़ते बोझ की समस्या सबसे ज्यादा हानिकारक साबित हुई। कृषि के क्षेत्र में पूरी तरह विकास न हो पाने का एक अन्य कारण सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्र का बहुत कम होना भी था। इसके अलावा साधन विहीन बंधुआ खेतिहर मजदूरों की वजह से कृषि के क्षेत्र में पूँजी निवेश की कमी रही। इसी तरह बाजार और ऋण सम्बन्धी बुनियादी ढाँचे में कमियों ने कृषि क्षेत्र का पर्याप्त विकास नहीं होने दिया।

आजादी के बाद इन समस्याओं के समाधान के लिये गम्भीरता से प्रयास किए गए। हालाँकि भूमि-सुधार की दिशा में प्रयास पूरे मन से नहीं किए गए लेकिन इनसे देश के कुछ इलाकों को छोड़कर अधिकतर भागों में बिचौलियों को समाप्त करने में काफी मदद मिली। अधिकतम भूमि सम्बन्धी कानूनों पर अमल न होने पाने से जमीन का एक समान वितरण भी सम्भव नहीं हो सका है। फिर भी बिचौलियों के समाप्त हो जाने से कृषि के विकास के रास्ते में एक सबसे बड़ी बाधा दूर हो गई है। भूमि के वितरण की कमियों के कारण कृषि के पूँजीवादी तरीके से असमान विकास की पृष्ठभूमि भी तैयार हुई है। टेक्नोलॉजी सम्बन्धी बाधाओं को दूर करने सम्बन्धी नीति की दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सिंचाई, बिजली तथा आधारभूत ढाँचे से सम्बन्धित अन्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूँजी निवेश किया गया। एक तरह से यह ब्रिटिश शासकों द्वारा शुरू किए कार्य को ही आगे बढ़ाने का प्रयास था। लेकिन योजना में बड़े पैमाने पर पूँजी निवेश के कारण ग्रामीण आधारभूत ढाँचे, विशेष रूप से बिजली की उपलब्धता में गुणात्मक सुधार हुआ और सिंचित क्षेत्र में भी बढ़ोत्तरी हुई।

नीति-निर्माताओं ने इन बाधाओं को दूर करने के लिये तीसरी जिस बात पर जोर दिया वह थी- बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पूँजी निवेश। नीति-निर्माताओं ने ब्रिटिश शासकों द्वारा निर्मित अनुसंधान सम्बन्धी छोटे ढाँचे से शुरुआत की और बड़े पैमाने पर पूँजी निवेश तथा प्रयासों से इसका विस्तार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को (जिसका पुरातन नाम रॉयल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च था) ऊँचा दर्जा दिया गया और बड़ी संख्या में कृषि विश्वविद्यालय खोले गए। बीजों की नई प्रजातियों के विकास और फसलों की बीमारियों की रोकथाम की दिशा में सार्थक अनुसंधान कार्य किया गया। यहाँ पर इस बात का विशेष रूप से उल्लेख करना जरूरी है कि आधारभूत ढाँचे के विकास और टेक्नोलॉजी में गुणात्मक सुधार सिंचित इलाकों तक सीमित रहे। साठ के दशक के मध्य में बीज और उर्वरक सम्बन्धी नई टेक्नोलॉजी के सफल उपयोग से इस पूँजी निवेश के फायदे सामने आने लगे।

नई नीति की एक अन्य विशेषता यह थी कि इसके तहत 1965 में कृषि मूल्य आयोग का गठन कर किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने के लिये अनुकूल माहौल तैयार किया गया। मूल्य नीति तथा नई टेक्नोलॉजी के बीच तालमेल से उत्पादन में व्यापक बढ़ोत्तरी हुई। लेकिन इस विकास का लाभ कुछ उत्तर-पश्चिमी राज्यों तक सीमित रहा। समय के साथ-साथ देश के पूर्वी तथा दक्षिणी इलाकों में भी इसका प्रसार हुआ। लेकिन सिर्फ उत्तर-पश्चिमी राज्यों में ही नई टेक्नोलॉजी से किसानों की आमदनी और जीवन-स्तर में महत्त्वपूर्ण सुधार हो सका। कृषि के क्षेत्र में व्यापक क्षेत्रीय असमानताओं तथा किसानों के बीच बढ़ते अंतर से इस क्षेत्र के पूँजीवादी तरीके से विकसित होने का पता चला है। साठ के दशक के मध्य में तो यह बात विशेष रूप से देखी जा सकती है।

Image result for पारंपरिक खेतीपरम्परा और आधुनिकता के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया को उत्पादन के तरीके से निर्धारित होने वाले बुनियादी ढाँचे और नई मूल्य व्यवस्था के क्रमिक विकास से निर्धारित व्यापक ढाँचे के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जहाँ तक उत्पादन के तरीके का सम्बन्ध है यह कहा जा सकता है कि देश में जहाँ एक ओर उत्पादन का पूँजीवादी तरीका प्रचलित हो रहा है वहीं कुछ भागों में अर्द्धसामंत उत्पादन सम्बन्धों के अवशेष अब भी विद्यमान हैं। जैसा कि स्वाभाविक है इन इलाकों में ग्रामीण समाज में तनाव और वर्ग संघर्ष काफी मुखर होकर उभरा है। जैसा कि पहले भी उल्लेख किया जा चुका है, विकास की दूसरी विशेषता यह है कि आधुनिक टेक्नोलॉजी देश के सभी क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाई है। कृषि के विकास में क्षेत्रीय असमानताओं के गम्भीर परिणाम सामने आए हैं। जिन इलाकों में कृषि विकास तीव्र और एक समान रहा है वहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी मिटाने की दिशा में अच्छी सफलता मिली है। दूसरी ओर देश के अधिकांश भागों में जहाँ यह बदलाव नहीं आया है। ग्रामीण आबादी का काफी बड़ा हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहा है।

इस लेख का उद्देश्य परम्परा और आधुनिकता के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया के समाज वैज्ञानिक पहलुओं की पड़ताल करना नहीं है। फिर भी यह बात माननी पड़ेगी कि आजादी के बाद भारत दुनिया के उन चंद देशों में एक हो गया है जिन्होंने पश्चिमी तरह की उदार लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया है और जो धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समतामूलक (समाजवादी) समाज के निर्माण की बात करते हैं। भारत को सत्ता और शासन की परम्परागत प्रणाली विरासत में मिली है, इनमें से अधिकांश अवधारणाएँ विदेशी हैं। हजारों वर्षों के अर्द्ध-सामंती दौर में कला, संस्कृति, वास्तुशिल्प और दर्शन शास्त्र जैसे क्षेत्रों में महान उपलब्धियों के बावजूद भारत बुनियादी तौर पर बहुत ही अलोकतांत्रिक और निरंकुश समाज भी रहा है। हालाँकि भारत में ग्राम पंचायत प्रणाली रही है, लेकिन पंचायतों के अधिकार तथा उनकी भूमिका काफी सीमित रही है। जाति-प्रथा की वजह से ग्राम पंचायतों के अधिकार और उनकी भूमिका और भी सीमित हो गई है। वयस्क मताधिकार की अवधारणा सीखने में भी हमें काफी समय लगा है। भारत की अनेक समस्याएँ हैं। जात-पात और धर्म जैसी बातें चुनावों में बड़ा असर डालती हैं। अक्सर अपने कबीले और जाति के प्रति परम्परागत प्रतिबद्धताएँ लोकतांत्रिक व्यवहार के बुनियादी तौर तरीकों के आड़े आती हैं।

Image result for आधुनिक खेतीअन्य मूल्यों के बारे में भी परम्परा और आधुनिकता के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया से संघर्ष की गम्भीर स्थिति उत्पन्न होती है। सदियों तक भारतीय समाज पितृ सत्तात्मक रहा है लेकिन अब महिलाएँ समान अधिकारों की माँग कर रही हैं। इससे समाज में कई तरह के तनाव उत्पन्न हुए हैं। यही बात अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बारे में भी सच है। हालाँकि संविधान ने उन्हें अन्य नागरिकों के समान अधिकार प्रदान किए हैं। लेकिन अक्सर न सिर्फ उनका शोषण किया जाता है बल्कि उन्हें अपमान जनक जीवन जीते रहने को मजबूर किया जाता है।

ये समस्याएँ और तनाव परम्परा और आधुनिकता के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया की स्वाभाविक परिणति है। लेकिन सत्ता से जुड़े विशिष्ट वर्ग के कुछ लोगों के सड़े-गले विचारों की वजह से यह कटुता बढ़ती ही जा रही है। अगर हम कट्टरपन, धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, रुढ़िवादी सोच आदि की ताकतों पर नजर डालें तो जो तस्वीर उभरती है वह बड़ी ही चिंताजनक है। लेकिन हमें जनता, विशेष रूप से युवाओं, कामगारों, अनुसूचित जातियों के लोगों और महिलाओं में उभर रही नई चेतना की जबरदस्त ताकत को कम करके नहीं आंकना चाहिए। ये लोग इस ताकत के बल पर समान अधिकार, लोकतंत्र और समतामूलक समाज के बुनियादी मूल्यों पर आधारित नए समाज के निर्माण के लिये प्रयत्नशील हैं।

 

साभार- India Water Portal

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