सीरिया की सियासत बनी आम लोगों की आफत। 

पिछले सात साल से सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध में अब तक एक अनुमान के अनुसार साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। सात साल से लगातार चल रहे इस खूनी संघर्ष में ऐतिहासिक से लेकर अत्याधुनिक शहर तबाह हो गए। इस खून-खराबे के बीच लाखों की संख्या में लोग अपना घर-बार छोड़कर किसी अनाजने देश मे शरणार्थियों का नारकीय जीवन जीने को विवश हो गए।

इतना ही नहीं, 15 लाख लोग ऐसे हैं जो इस गृहयुद्ध की चपेट में आकर स्थायी रूप से विकलांग हो गए। इनमें से 86 हजार लोगों के हाथ या पैर काटने पड़े। इसके अलावा 60 हजार से अधिक लोग ऐसे हैं जिनके बारे में यह भी नहीं पता है कि वे जिंदा हैं या मर गए। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस समस्या का अब तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है और ना ही निकट भविष्य में किसी तरह के समाधान की कोई तस्वीर नजर आ रही है।

सीरिया गृहयुद्ध के चलते पैदा हुई इस भयावह तस्वीर को देखने के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उभरता है कि आखिर यह युद्ध चल क्यों रहा है? इस युद्ध में कौन-कौन से देश और संगठन शामिल हैं ? कौन-सा देश किसके समर्थन में और कौन-सा देश किसके विरोध में है? आखिर वो कौन है जो सीरिया में हो रहे जनसंहार के लिए जिम्मेदार है?

दरअसल, साल 2011 में जब अरब स्प्रिंग के बाद लोकतंत्र की हवा सीरिया पहुंची। तब वहां के राष्ट्र प्रमुख बसर अल असद के विरोध में लोगों के बीच विद्रोह का बवंडर खड़ा हो गया। इस विरोध को दबाने के लिए असद ने सीरियन आर्मी का इस्तेमाल किया। लेकिन सीरियन आर्मी का एक धड़ा खुद असद के विरोध में खड़ा हो गया और वह असद सरकार के खिलाफ खड़े लोगों के साथ हो गया। आर्मी के इस विद्रोही धड़े को सीरियन रेबेल कहा गया।

अब हुआ ऐसा कि लोकतंत्र लाने के नाम पर शुरू हुए गृहयुद्ध में अफगानिस्तान और इराक युद्ध के लगभग ख़त्म हो जाने के चलते बेरोजगार हो गए। आतंकियों के समूह भी असद के खिलाफ जारी जंग में शामिल हो गए। चूँकि, जंग शिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बशर अल असद के खिलाफ चल रही थी। तो सुन्नी समर्थक सऊदी अरब ने भी शिया असद के खिलाफ इन विद्रोहियों की जमकर आर्थिक मदद करना शुरू कर दिया। सीरिया के मामले ने जब शिया-सुन्नी संघर्ष का रूप धारण कर लिया तब नतीज़तन शिया देश ईरान भी असद के समर्थन में सीरिया के गृहयुद्ध में कूद पड़ा। विद्रोहियों के खिलाफ असद को लड़ाई में सहयोग देने के लिए ईरान ने भी अपने संगठन हिजबुल्ला को सीरिया भेज दिया।

मतलब सीरिया के गृहयुद्ध में अब प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मिडिल ईस्ट के शिया-सुन्नी समर्थक देश अपने लिए सुविधाजनक साइड लेकर कूद पड़े थे। इतना कम नहीं था तो वर्षों से कुर्दिस्तान की मांग करने वाले कुर्दिश लड़ाके भी असद को कमजोर होते देख कुर्दिस्तान पर अपनी स्थिति मजबूत करने का ख़्वाब लिए सरकार के खिलाफ हथियार लेकर मैदान-ए-जंग में उतर गए। इसके बाद अब तक इन सारे मामलों से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखने वाले अमेरिका ने भी इस मामले में यह कहकर अपनी नाक घुसेड़ दी कि असद सरकार अपने लोगों पर केमिकल हथियारों का इस्तेमाल कर रही है।

अमेरिका के हथियार और सऊदी अरब के पैसों से अलकायदा इतना फलफूल गया कि उससे अलग होकर एक नए धड़े का जन्म हो गया।

अमेरिका ने सीरिया पर सीधे कार्रवाई करने की बजाय असद सरकार के खिलाफ विरोध का बिगुल फूंकने वाले विद्रोहियों को पैसे और हथियार देकर उनकी मदद करना शुरू कर दिया। विडंबना देखिए, जिस अलकायदा ने अमेरिका के ट्विन टॉवर को गिराया, जिसके खिलाफ लगभग एक दशक तक अमेरिका अफगानिस्तान में लड़ता रहा उसी अलकायदा को अमेरिका सीरिया में असद की सरकार गिराने के लिए सहायता प्रदान करने लगा।

अमेरिका के हथियार और सऊदी अरब के पैसों से अलकायदा इतना फल-फूल गया कि उससे अलग होकर एक नए धड़े का जन्म हो गया। उसका नाम आईएसआईएस (ISIS) रखा गया। आइएसआइएस ने थोड़े ही समय में इतना उत्पात मचाया कि उसके जन्म के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार अमेरिका खुद उसे खत्म करने के लिए उस पर बम बरसाने लगा। इस दौरान असद को चारों तरफ से घिरता और अमेरिका को इस युद्ध में पड़ता देख रूस भी असद की ओट लेकर इस सारे फ़साद में शामिल हो गया।

इन सबके चलते सीरिया युद्ध किसी खिचड़ी की तरह हो गया। इस कारण यह समझ पाना बहुत मुश्किल हो गया कि यहां कौन किसके खिलाफ है और कौन किसके साथ। असद के विरोध में सीरियन रेबेल आर्मी, आईएसआईएस और कुर्दिश लड़ाके लड़ रहे। अमेरिका असद के खिलाफ इन सभी की मदद कर रहा है। लेकिन कुर्दिश लड़ाकों के विरोध मे अमेरिका का दोस्त तुर्की खड़ा है। अब अमेरिका असद के खिलाफ कुर्दिश लड़ाकों को भी हथियार दे रहा है और कुर्दिश लड़ाकों के खिलाफ लड़ रही तुर्की सेना को भी हथियार सप्लाई कर रहा है। कुर्दिश लड़ाके अमेरिका के हथियारों से अमेरिका के दोस्त तुर्की से भी लड़ रहे है और अमेरिका के दुश्मन असद सरकार से भी। अब आप तय कीजिए कि अमेरिका दोनों में से किसके खिलाफ है और किसके साथ।

सीरियन रिबेल यानी सीरियन आर्मी के वो लोग जो सीरियन आर्मी से भी लड़ रहे हैं और आईएसआईएस से भी लड़ रहे हैं अमेरिका उनको भी हथियार दे रहा है। लेकिन उधर सीरियन आर्मी कुर्दिश लड़ाकों, सीरियन रेबेल के साथ साथ अमेरिका के दुश्मन आईएसआईएस के खिलाफ भी लड़ रही है इसलिए अमेरिका सीरियन आर्मी को भी अपना समर्थन दिए हुए है। कहने का मतलब असद सरकार के खिलाफ लड़ने के लिए अमेरिका असद विरोधी सीरियन रेबेल और आईएसआईएस के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए असद समर्थक सीरियन आर्मी दोनों को एक साथ हथियारों की सप्लाई कर रही है।

सऊदी अरब तुर्की के जरिए सीरियन रिबेल और आईएसआईएस को फंडिंग कर रहा है। यह सारा पैसा सऊदी अरब के पास अमेरिका से आ रहा है। यानि अमेरिका का पैसा सऊदी के जरिए तुर्की होते हुए आईएसआईएस के पास जा रहा है। इसका मतलब आईएसआईएस के खिलाफ सीरियन आर्मी की मदद करने वाला अमेरिका सऊदी अरब के जरिए उसी की मदद कर रहा है। कहने का मतलब आईएसआईएस अमेरिका के पैसों और हथियारों के बल पर अमेरिका से ही लड़ रहा था। है ना अजीब!

रूस और ईरान सीरियन आर्मी का समर्थन कर रहे हैं। लेकिन जब एक रूसी विमान को तुर्की की सेना द्वारा मार गिराया गया तब से रूस ने तुर्की के खिलाफ जंग कर रहे कुर्दिश आर्मी को भी हथियार देना शुरू कर दिया। यानि अब रूस सीरियन आर्मी और कुर्दिश आर्मी दोनों का एक साथ अपने हथियार दे रही है। लेकिन मुसबीत यह है कि दोनों आपस में लड़ रह थे। अब रूस सीरियन आर्मी के साथ है या खिलाफ? इस आसान से सवाल का जवाब आप तय कीजिए। क्योंकि कुर्दिश लड़ाके रूस से हथियार लेकर उसके सहयोगी सीरिया से भी लड़ रहे हैं और उसके विरोधी तुर्की से भी लोहा ले रहे हैं।

इस युद्ध की अनोखी बात यह है कि यहां अमेरिका और रूस दोनों देश  प्रत्क्षय रूप से अपने लिए और अप्रत्यक्ष रूप से अपने खिलाफ लड़ रहे सभी गुटों को अपने हथियार दे रहे थे। कुल मिलाकर सबके पास एक दूसरे का दिया पैसा और हथियार दोनों थे। इस युद्ध में सब एक दूसरे का साथ भी दे रहे थे और सब एक दूसरे के खिलाफ भी लड़ रहे थे।

यह सब तो रहे सीरियाई गृहयुद्ध के “संभावित” कारण और “कथित” जिम्मेदार देशों की दास्तान। लेकिन चलिए अब आँकड़ों के आईने में झांककर देखते है कि श्मशान बन चुके सीरिया को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी है।

फिलहाल पूर्वी गुटा में जारी संघर्ष में शहर की 93 फीसदी इमारतें तबाह हो चुकी हैं। विद्रोहियों से इस इलाके को खाली कराने के लिए सरकार द्वारा जारी बमबारी के बीच 393,000 लोग जंग के बीच फंसे हुए हैं।

सात साल से जारी इस गृहयुद्ध में सीरिया स्थित 6 यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। सीरिया में घायलों की मदद करने के लिए तत्पर मेडिकल कर्मी तक जंग में चली गोलियों का शिकार हो रहे हैं। फिजिशियन फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के अनुसार, 330 मेडिकल ठिकानों पर दिसंबर 2017 तक 492 हमले हो चुके हैं। इन हमलों में 847 मेडिकल कर्मियों के मारे जाने की बात कही जा रही है। युद्ध के हालात में सबसे बड़ी समस्या शरणार्थियों की होती है।

जीने के लिए सुरक्षित स्थान की तलाश में मजबूरन लोग अपना घरबार छोड़कर  किसी दूसरे जगह पर पलायन करने के लिए विवश हो जाते हैं। 2011 के बाद से सीरिया की आधे से अधिक आबादी विस्थापित हो चुकी है।

यूएनएचसीआर की रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 61 लाख सीरियाई नागरिक देश के भीतर विस्थापित हो चुके हैं। इसके अलावा 56 लाख लोग ऐसे हैं जिन्होंने देश के बाहर जाकर शरण ली हुई है। सीरिया से विस्थापित हुए ज्यादातर लोगों ने पड़ोसी देश तुर्की, लेबनान, मिस्र, जॉर्डन, इराक जैसे इलाकों में शरण ली है। इसके अलावा यूरोप में जर्मनी, स्वीडन, हंगरी, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रिया, फ्रांस जैसे देशों में भी सीरिया के पलायन कर गए लोगों ने पनाह ले रखी है।

साढ़े तीन लाख से ज्यादा मौत, 60 हजार से ज्यादा लापता लोग, 15 लाख से ज्यादा घायल, आधी आबादी का शरणार्थी बन जाना, शहर के शहर का बमबारी के चलते श्मशान बन जाना। इतना सब कुछ झेलने के बावजूद तबाही थमने का कोई आसार नजर नही आ रहा है। क्योंकि उधर यूएन समर्थित वार्ताओं के 9 राउंड की बातचीत पूरी हो जाने के बावजूद नतीजा ढाक के तीन पात रहा और इधर सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद भी विपक्ष से सीधी बातचीत करने से लगातार इनकार करते नजर आ रहे हैं।

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