सुपर 30 रचने वाले सुपर ह्यूमन आनंद कुमार की सुपर कहानी

ऋतिक रोशन को अब तक हमने पर्दे पर काल्पनिक सुपर हीरो की भूमिकाएं निभाते देखा है। लेकिन जल्द ही वह अपनी एक नई फिल्म में रियल लाइफ सुपर हीरो की भूमिका में नजर आने वाले हैं। असल जिंदगी के यह हीरो कोई और नहीं बल्कि बिहार के पटना में रहने वाले आनंद कुमार हैं। विश्व भर में अपने सुपर-30 के लिए पहचाने जाने वाले आनंद कुमार के अथक संघर्ष और उसके उपरांत उन्हें प्राप्त सफलता की कहानी कहती यह फ़िल्म जल्द सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली है। हम फ़िल्मी पर्दे के हीरो ऋतिक रोशन के बारे में तो हजार बातें जानते हैं लेकिन हमारा रियल लाइफ हीरो आनंद कुमार के बारे में जानना भी बहुत जरूरी है। दरअसल, आनंद कुमार की शख्सियत हमें यह सिखाती है कि

शिकायत मत करो कि

उनके पास कितना ज्यादा है और तुम्हारे पास कितना कम है।

सवाल तो अब यह है कि

ग़र जमीन नहीं है पैरों तले, तो तुम्हारी उड़ान में कितना दम है।

2002 में ऐसी ही एक उड़ान भरी थी बिहार के आनद कुमार ने। जब घर में आर्थिक तंगी और पिताजी के असामयिक मृत्यु के चलते मेधावी आनंद कुमार को मौका मिलने के बावजूद वह पढ़ने के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी नहीं जा पाए थे। दरअसल, ग्रेजुएशन के दौरान उन्होंने नंबर थ्योरी में पेपर सब्मिट किए जो मैथेमेटिकल स्पेक्ट्रम और मैथेमेटिकल गैजेट में पब्लिश हुए। इसके बाद आनंद कुमार को प्रख्यात कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से एडमीशन के लिए बुलाया गया लेकिन पिता की मृत्यु और तंग आर्थिक हालात के चलते कैंब्रिज जाकर पढ़ने का उनका सपना साकार नहीं हो सका।

जिस ग़ुरबत के चलते पटना, बिहार के आनंद कुमार अपने सपने पूरे नहीं कर पाए। पिछले लगभग 16 सालों से वह उसी ग़ुरबत की गली में घूमते हुनरमंद बच्चों को फर्श से अर्श तक पहुँचाने का काम कर रहे हैं। आनंद कुमार यह काम अपने कोचिंग संस्थान “सुपर 30” के जरिए गरीब मेधावी छात्रों को आईआईटी में दाखिला दिलाकर कर रहे हैं। अपने सपनों के परों को गरीबी से पैदा हुई परिस्थितियो के पैरों तले कुचलता देखने के बाद आंनद कुमार ने यह निश्चय किया कि वे बच्चे जिनके सपने पैसों की कमी के चलते उनके पिता की तरह असामयिक मौत का शिकार हो जाते हैं उन्हें निःशुल्क पढ़ाकर सपनों के आसमान में ऊचाइयों तक उड़ना सिखाएंगे।

पिछले लगभग 16 सालों से वह उसी ग़ुरबत की गली में घूमते हुनरमंद बच्चों को फर्श से अर्श तक पहुँचाने का काम कर रहे हैं।  

पटना स्थित आनंद कुमार के सुपर 30 में उन गरीब हुनरमंद बच्चों को चुना जाता है जिनका परिवार उन्हें पढ़ा सकने में सक्षम नहीं होता है। ऐसे बच्चो को आनंद कुमार न सिर्फ अपने संस्थान में मुफ्त शिक्षा देते हैं बल्कि उनके रहने और खाने तक की व्यवस्था करते हैं। सुपर 30 में पढ़ने वाले बच्चों के माता पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि कोई अंडे बेचकर अपना घर चलाता है तो कोई चाय बेचकर। आर्थिक और सामजिक रूप से दबे कुचले तबके से आए इन बच्चों के दर्द को इतनी नजदीकी से महसूस करने का कारण आनंद की अपनी जिंदगी का वह अतीत है, जिसमें उन्होंने खुद गली-गली सायकल पर घूमकर पापड़ बेच अपना घर चलाया है।

अपनी प्रतिभा के बल पर आनंद कुमार ने कैंब्रिज में सीट तो पा ली थी किंतु कैंब्रिज जाने, वहां रहने और पढ़ाई करने के लिए आनंद के पास पैसे नहीं थे। 

आनंद कुमार के पिता भारतीय डाक विभाग में चिठ्ठी छांटने का काम करते थे। नतीजतन घर की आमदनी इतनी नहीं थी कि आनंद को किसी अच्छे निजी स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा जा सके। इसलिए उनकी बचपन की पढाई सरकारी स्कूल में हिंदी मीडियम से ही हुई। अब क्योंकि आनंद बचपन से ही गणित के मेधावी छात्र थे और इस विषय में अपनी पकड़ को समय के साथ वह और ज्यादा मजबूत करते चले गए। परिणामतः स्नातक स्तर की पढ़ाई के दौरान ही कुमार ने संख्या सिद्धांत पर अपने दस्तावेजों को प्रस्तुत किया। जो ‘गणितीय स्पेक्ट्रम’ और ‘द गणितीय गैजेट’ में प्रकाशित हुआ। आनंद की इसी गणितीय प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय की तरफ से अपने यहां आकर पढाई करने का प्रस्ताव मिला था। लेकिन पिता जी की हृदयाघात से असामयिक मृत्यु के बाद घर की सारी जिम्मेदारी का बोझ आनंद कुमार के कंधो पर आ जाने के बाद उन्हें अपने क़दमों को अपने सपनों की सड़क पर जाने से रोकना पड़ा। दरअसल, अपनी प्रतिभा के बल पर आनंद कुमार ने कैंब्रिज में सीट तो पा ली थी। किंतु कैंब्रिज जाने, वहां रहने और पढ़ाई करने के लिए आनंद के पास पैसे नहीं थे।

आनंद कुमार को पिता के निधन के बाद डाक विभाग में काम करने का अवसर मिला था। आनंद कुमार के शब्दों में,”अगर नौकरी कर लूंगा तो गणित में प्रतिभा दिखाने का मौका नहीं मिल पाएगा।” इस वजह से डाक विभाग की नौकरी ठुकरा कर अपनी गणितीय प्रतिभा को निखारने के लिए उन्होंने रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमैटिक्स नामक एक क्लब खोला। यहां वे अपने प्रोफेसर की मदद से मैथ के छात्रों को ट्रेनिंग दिलाते थे और एक भी पैसा नहीं लेते थे। इसके साथ ही घर की आजीविका चलाने के लिए वह माँ द्वारा बनाए गए पापड़ को सायकल चलाकर घर-घर जाकर बेचा करते थे।

आनंद ने उसी क्षणसुपर 30″ जैसी संकल्पना को साकार करने का फैसला लिया।

जैसे-तैसे चलती जिंदगी को आर्थिक रफ़्तार और अपनी गणितीय प्रतिभा को धार देने के उद्देश्य से आनंद ने रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमैटिक्स में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराना शुरू किया। शुरूआत में तो सिर्फ 2 बच्चे आए लेकिन देखते ही देखते बच्चों की संख्या बढ़कर 500 हो गई। इन्हीं बच्चों में से एक दिन एक ऐसा बच्चा आनंद के पास आया जिसने आनंद की जिंदगी को बदलकर रख दिया। लड़के ने आनंद से कहा कि सर हम गरीब हैं, हम आपके यहां कोचिंग करना तो चाहते हैं लेकिन हमारे पास ट्यूशन के फ़ीस देने के पैसे नहीं हैं। उस लड़के की आंखों में आनंद ने पैसों की कमी के चलते अपने दम तोड़ चुके सपनों का अंश देखा। फिर क्या था, आनंद ने उसी क्षण “सुपर 30” जैसी संकल्पना को साकार करने का तय गया .

साल 2008 से लेकर साल 2010 के दरम्यान तो लगातार तीन सालों तकसुपर 30′ के सभी यानी  90 छात्र आईआईटी में प्रवेश पाने में सफल रहे

2002 के बाद से हर साल मई में रामानुजम स्कूल ऑफ मैथमैटिक्स में 30 छात्रों का चयन करने के लिए एक प्रतियोगी परीक्षा होती है। “सुपर 30” कार्यक्रम के लिए कई छात्र परीक्षा में उपस्थित होते हैं और अंत में वे आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों से तीस बुद्धिमान छात्रों को एक वर्ष के लिए ट्यूटर्स, अध्ययन सामग्री, आवास और भोजन की सुविधा निःशुल्क प्रदान करते हैं। वह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा के लिए उन्हें तैयार करते हैं। उनकी माँ जयंती देवी छात्रों के रहने और खाने का इंतजाम करती हैं और उनके भाई प्रणव कुमार पूरी व्यवस्था के प्रबंधन का काम संभालते हैं। अपने इस संस्थान के माध्यम से आनंद कुमार साल 2003 से लेकर साल 2017 के दरम्यान अपने यहां पढ़ने वाले 450 बच्चों में से 391 बच्चों को आईआईटी में प्रवेश दिलाने में सफल रहे हैं। साल 2008 से लेकर साल 2010 के दरम्यान तो लगातार तीन सालों तक ‘सुपर 30’ के सभी यानी 90 छात्र आईआईटी में प्रवेश पाने सफल रहे।

आनंद के काम को अब घरघर तक पहुंचाने का काम अभिनेता ऋतिक रोशन जल्द ही अपनी आने वाली फिल्म के जरिए करने वाले हैं 

आनंद कुमार के चमत्कार को जल्द ही दुनिया भी नमस्कार करने लगी। इसी का नतीजा रहा कि  वर्ष 2010 में आनंद को ‘टाइम पत्रिका’ ने ‘द बेस्ट ऑफ एशिया’ में शामिल किया था। ‘न्यूजवीक’ पत्रिका ने सुपर-30 को विश्व के चार प्रयोगधर्मी विद्यालयों में शामिल किया था। वर्ष 2009 में पूर्व जापानी ब्यूटी क्वीन और अभिनेत्री नोरिका फूजिवारा ने सुपर 30 इंस्टीट्यूट पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई थी। इतना ही नहीं उसी वर्ष नेशनल जियोग्राफिक चैनल द्वारा भी आनंद कुमार के सुपर 30 का सफल संचालन एवं नेतृत्व पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई गई थी। मार्च 2009 में डिस्कवरी चैनल ने सुपर 30 पर एक घंटे का कार्यक्रम प्रसारित किया, और अर्ध पेज द न्यूयॉर्क टाइम्स में आनंद कुमार और ‘सुपर 30’ के द्वारा किए जा रहे उनके अविश्वसनीय कार्य को समर्पित किया गया। आनंद के काम को अब घर-घर तक पहुंचाने का काम अभिनेता ऋतिक रोशन जल्द ही अपनी आने वाली फिल्म के जरिए करने वाले हैं।

No Comments Yet

Leave a Reply

Your email address will not be published.

युवा देश से जुड़ी समाजिक सरोकार रखने वाली खबर, आम आदमी से जुड़े खास मुद्दों के करीब, बेवज़ह और बेतुके के ड्रामे से दूर, हवा हवाई बातों के इतर जमीनी हकीकत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए सब्सक्राइब करे हमारा चैनल युवायु। Contact us: info@uvayu.com