सोशल मीडिया: यह सोचना कितना भीषण है

यह सोचना
कितना भीषण है

कि
अपनी
तुम्हारी
और बाकी सभी की
दुनिया में
जो मैं हूँ वह सिर्फ मैं ही हूँ
कोई और नहीं

और ये न जान पाना
कि जीना कोई हठ है
कि सिर्फ़ आदत
या
कोई विचारधारा

और ये जान लेना
कि तुम्हें ही जाकर बताना होगा सबको
कि मैं शून्य से लटक गया हूँ
औऱ
मुझे ये भी नहीं पता
कि मैं रस्सी हूँ या सांप
और पूछने से बचना
कि मुझे ‘हुए’ रहना है
या अब ‘बस्स’ कह देना है
या चुपचाप इंतिजार करना है

पर सबसे भीषण है
उस माँ का अंतिम तौर पर चले जाना
जिसे तुमने अभी जानना ही शुरू किया था

और उस दुनिया में रहना
जो अब भी चुटकुलों पर हंस रही है

आर. चेतन क्रांति की फेसबुक वाल से साभार

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