हम क्यों करते हैं सरस्वती माता की पूजा ?

सरस्वती माता हिन्दू धर्म की तीन पौराणिक महानायिकाओं या तीन प्रमुख देवियों – लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती माता में से एक हैं। लक्ष्मी जहां धन, वैभव और ऐश्वर्य की और दुर्गा शक्ति की देवी हैं वहीं सरस्वती माता को विद्या और कलाओं की अधिष्ठात्री देवी का दर्ज़ा हासिल है। देवी सरस्वती माता को शारदा, शतरूपा, वीणावादिनी, वीणापाणि, वाग्देवी, वागेश्वरी, भारती आदि कई नामों से भी पुकारा जाता है। वे शुक्लवर्ण, श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणावादनतत्परा तथा श्वेतपद्मासना हैं। कुछ पुराण उन्हें ब्रह्मा की मानसपुत्री मानते हैं, लेकिन देवी भागवत के अनुसार वे ब्रह्मा की पत्नी हैं। सदियों से माघ शुक्ल पंचमी को देवी सरस्वती माता की पूजा की परिपाटी चली आ रही है। यह सरस्वती माता का पौराणिक रूप भर है। देवी सरस्वती माता वस्तुतः प्राचीन सरस्वती नदी का मानवीकरण और वैदिक भारत में विद्या, बुद्धि, साहित्य और संगीत के क्षेत्र में हुई प्रगति का एक प्रतीक मात्र है।

हमारी प्राचीन आर्य सभ्यता और संस्कृति का केंद्र उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत हुआ करता था। आज की विलुप्त सरस्वती तब इस क्षेत्र की मुख्य और विशालतम नदी हुआ करती थी। पहाड़ों को तोड़कर निकली यह नदी मैदानों से होती हुई अरब सागर में विलीन हो जाती थी। यह सदानीरा थी अर्थात सर्वदा जल से भरी रहती थी। ऋग्वेद में नदी के रूप में ही जगह-जगह सरस्वती के प्रति श्रद्धा-निवेदन किया गया है। ऋग्वेद में इसका अन्नवती तथा उदकवती के रूप में भी वर्णन आया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त के एक मंत्र में सरस्वती नदी को ‘यमुना के पूर्व’ और ‘सतलुज के पश्चिम’ में बहती हुई बताया गया है। प्रयाग के निकट तक आकर यह गंगा तथा यमुना में मिलकर त्रिवेणी बन गई थी। उत्तर वैदिक ग्रंथों ताण्डय और जैमिनीय ब्राह्मण में सरस्वती नदी को मरुस्थल में सूखा हुआ बताया गया है। महाभारत में भी सरस्वती नदी के मरुस्थल में ‘विनाशन’ नामक जगह पर विलुप्त होने का वर्णन आता है। मनुसंहिता से स्पष्ट है कि सरस्वती और दृषद्वती के बीच का भूभाग ही ब्रह्मावर्त कहलाता था। महाभारत में सरस्वती नदी के प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति, वेदवती आदि कई नाम हैं। महाभारत, वायुपुराण आदि में सरस्वती माता के विभिन्न पुत्रों के नाम और उनसे जुड़े मिथक प्राप्त होते हैं। देवी के रूप में सरस्वती माता की वेदों में कोई चर्चा नहीं है। नदी का यह मानवीकरण परवर्ती ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों की देन है।

तत्कालीन आर्य-सभ्यता के सारे गढ़, नगर और व्यावसायिक केंद्र सरस्वती के किनारे बसे थे। सरस्वती के रास्ते अरब सागर होकर ही आर्य व्यापारियों का दुनिया के दूसरे हिस्सों से समुद्र व्यापार होता था। उस युग की तमाम शिक्षण संस्थाएं, ऋषियों की तपोभूमि और आचार्यों के आश्रम सरस्वती माता के तट पर ही स्थित थे। ये आश्रम अध्यात्म, धर्म, कला, संगीत, चिकित्सा और विज्ञान की शिक्षा और अनुसंधान के केंद्र थे। वेदों, उपनिषदों और अनेक स्मृति-ग्रंथों की रचना इन्हीं आश्रमों में हुई थी। वैदिक काल में सरस्वती माता को परम पवित्र नदी माना जाता था क्योंकि इसके तट पर निवास कर तथा इसके जल का सेवन करते हुए ऋषियों ने वेद रचे औ‍र वैदिक ज्ञान का विस्तार किया। ऋग्वेद के एक सूक्त के अनुसार – ‘प्रवाहित होकर सरस्वती माता ने जलराशि ही उत्पन्न नहीं की, समस्त ज्ञानों का भी जागरण किया है।’ सरस्वती माता को ज्ञान के लिए उर्वर अत्यंत पवित्र नदी माना जाता था।

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कई हजार साल पहले सरस्वती माता में आई प्रलयकारी बाढ़ और विनाश-लीला से अधिकांश नगर और आश्रम नष्ट हो गए थे। तमाम प्राचीन ग्रंथों में इस भयंकर जलप्रलय की चर्चा आई है। सबकुछ नष्ट हो जाने के बाद आर्य सभ्यता धीरे-धीरे गंगा और जमुना के किनारों पर स्थानांतरित हो गई। कालांतर में सरस्वती माता विलुप्त हो गई, फिर भी लोगों की धारणा है कि प्रयाग में वह अब भी अंत:सलिला होकर बहती है। सरस्वती माता के तट से आर्यों के विराट पलायन के बाद भी जनमानस में सरस्वती माता की पवित्र स्मृतियां बची रहीं। प्रकृति की कल्याणकारी शक्तियों पर देवत्व आरोपित करने की हमारी सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप कालान्तर में ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों में सरस्वती माता नदी को देवी का दर्जा दिया गया। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो हर तरफ मौन पसरा हुआ था। ब्रह्मा की सघन तपस्या से वृक्षों के बीच से एक अद्भुत चतुर्भुजी स्त्री प्रकट हुई जिसके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर-मुद्रा थी। जैसे ही उस स्त्री ने वीणा का नाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी, जलधारा को कोलाहल और हवा को सरसराहट मिल गई। ब्रह्मा ने उसे वाणी की देवी सरस्वती माता कहा।

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