377 किसानों ने की आत्महत्या और मुआवजा मिला सिर्फ 147 किसानों को…

इस खबर को लिखते है दांत गुस्से से कटकटा रहे हैं, आँखें गम में गीली है, दिमाग ‘कुछ बदल क्यों नहीं रहा?’ सवाल सोच-सोचकर झल्ला रहा है और चेहरा ‘कुछ बदल नहीं रह है!’ की बेबसी के अहसास से उदास है। क्योंकि खबर किसान की है और इस बार भी आत्महत्या से ही जुड़ी है। मार्केट में आंकड़ो की एक नई किश्त आई है। जिसके मुताबिक़ इस साल 11 महीने में सिर्फ उत्तर महाराष्ट्र में 377 किसानों ने मौत को गले लगा लिया है।

अव्वल तो सरकार की यह कोशिश होनी चाहिए कि किसान के सामने ऐसी स्थिति का निर्माण ही ना हो कि वह आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाए। और दूसरा, किसान द्वारा मजबूरन ऐसा कदम उठा लेने के बाद सरकार आर्थिक रूप से किसान के परिवार की मदद करें। लेकिन हैरानी की बात है कि सरकार अपने दोनों ही कामों में फिस्सडी साबित हुई है। क्योंकि जिन 377 किसानों ने आत्महत्या की, उनमें से सिर्फ 147 किसानों के परिवारों को ही सरकार की तरफ से मुआवजा दिया गया।

यानी उत्तर महाराष्ट्र में आत्महत्या करने वाले कुल 377 किसानों में से सिर्फ 39 फीसदी किसानों के परिवारों की ही सरकार ने आर्थिक रूप से मदद की। सरकार के इस रवैये से किसान, किसान के परिवार और किसान हितैषी संगठन बेहद नाराज है। इनके मुताबिक कोई भी किसान अपनी आदमी अपनी खुशी से आत्महत्या नहीं करता है।

आत्महत्या के कारण अलग-अलग जरूर हो सकते हैं, लेकिन मूल कारण एक ही होता है खेती में मुनाफ़ा न होना, नुकसान होना। इसी के बाद परिवार में झगड़े भी होते हैं लेकिन अलग अलग कारण बताकर 61 फ़ीसदी किसानों को मुआवजा न देना उनके परिवार के साथ अन्याय है। और इनका आरोप है कि स्थानीय स्तर के अधिकारी जानबूझकर किसानों के साथ ऐसा अन्याय कर रहे हैं। इसलिए सरकार को इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है।

आंकड़ों के मुताबिक जलगांव में हुई आत्महत्याओं में से अधिकांश को खेती में हुए नुकसान के कारण दिखाया गया है , जहां कुल 132 किसान आत्महत्या किये जिनमें से 51 मृतक परिवार मुआवजे के लिए योग्य हैं, जो कपास की खेती किए थे। नाशिक में कुल 99 किसानों ने आत्महत्या की और खेती संकट के कारण 34 आत्महत्याएं दिखाई गई। अहमदनगर में 78 किसानों ने आत्महत्या 31 खेती के कारण दिखाया गया।

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