Activist arrest: 4 सितंबर तक जवाब दे केंद्र, अगली सुनवाई तक अंडर हाउस अरेस्ट रहेंगे गिरफ्तार हुए लोग- सुप्रीम कोर्ट

पुणे पुलिस ने 28 अगस्त, मंगलवार को कथित माओवादी संबंध होने के आधार पर 5 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। पुणे के जॉइंट पुलिस कमिश्नर शिवाजी बोड़खे ने कहा कि, ” 6 जून को गिरफ्तार किए गए 5 कार्यकर्ताओं के पास से जांच पड़ताल के दौरान पाए गए दस्तावेजों और संदिग्ध साक्ष्य के आधार पर हमने ये गिरफ्तारियां की है। प्राप्त दस्तावेजों में आज गिरफ्तार किए गए लोगों के नाम हैं।” बता दें कि पुणे पुलिस ने 28 अगस्त को कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घर पर छापेमारी की और पी वरवर राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नौलखा, वेर्नोन गोंसाल्वेस तथा अरुण फेरिरा को गिरफ्तार किया।

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने गौतम नौलखा और पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सुधा भारद्वाज के पुणे पुलिस द्वारा ट्रांसिट रिमांड को नकारते हुए उन्हें अल्पकालिक राहत दे दी। अब जबकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जा चुका है ऐसे में इन गिरफ्तारियों को लेकर राजनीतिक गलियारे में घमासान मचा हुआ है। हर कोई अपने-अपने सुविधानुसार औऱ बौद्धिक क्षमता के अनुसार मामले की समझ को पेश कर रहा है। कई बुद्धिजीवियों ने इस मामले को लेकर मोदी सरकार की निरंकुशता की परिभाषा भी गढ़ डाली।

इससे पहले श्रीमती थापर, देवकी जैन, प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे और माजा दारूवाला ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी उनकी तरफ से पेश हुए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि 6 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई तक गिरफ्तार किए गए लोगों को अंडर हाउस अरेस्ट रखा जाय।

वहीं दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने 4 सितंबर तक इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और उसके पुलिस को नोटिस जारी की है। कोर्ट ने कहा कि, “असंतोष लोकतंत्र की सुरक्षा वाल्व है। अगर आप इसे अनुमति नहीं देते हो तब यह फट जाएगा। महाराष्ट्र सरकार ने याचिका की रखरखाव का विरोध किया है। महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि ‘स्ट्रेंजर’ उन कार्यकर्ताओं के लिए राहत की तलाश नहीं कर सकते जो पहले से ही हाईकोर्ट पहुंच चुके हैं।

इन गिरफ्तारियों में मानक संचालन प्रक्रिया को नहीं किया गया लागू- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(NHRC)

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(NHRC) ने महाराष्ट्र सरकार और राज्य पुलिस प्रमुख को नोटिस जारी की है। आयोग ने कहा है कि यह ‘प्रतीत’ होता है कि इन गिरफ्तारियों में मानक संचालन प्रक्रिया को उचित ढंग से लागू नहीं किया गया है। इससे उनके मानवाधिकार का उल्लंघन होता है। महाराष्ट्र चीफ़ सेक्रेटरी और डीजीपी से 4 हफ़्ते के अंदर इस मामले में ‘तथ्यात्मक रिपोर्ट’ (Factual report) जमा करने के लिए कहा गया है।

कौन हैं वो 5 कार्यकर्ता और क्या है गिरफ्तारी का आधार

गिरफ़्तार:-

1. पी. वरवरा राव (हैदराबाद):- 78 वर्षीय लेखक और कवि राव मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता के मोर्चे पर सक्रिय रहे हैं। इन्होंने लगातार सरकारों को आड़े हाथों लिया है।

2. सुधा भारद्वाज(फरीदाबाद):- सुधा एक कार्यकर्त्री रही हैं। इन्होंने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी है। सुधा भारद्वाज नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली में विजिटिंग प्रोफेसर और PUCL में नेशनल सेक्रेटरी भी हैं।

3. गौतम नौलखा(दिल्ली):- ये पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स से जुड़े हुए हैं। पत्रकार गौतम नौलखा छत्तीसगढ़ के माओवादी-ग्रसित इलाकों में काम करते रहे हैं।

4. वेर्नोन गोंसाल्वेस(मुंबई):- वेर्नोन एक पूर्व व्याख्याता(lecturer) हैं। इन्हें 17 मामलों का सामना करना पड़ा है। सिर्फ़ एक मामले को छोड़कर उन्हें हर मामले में बरी किया गया है। साल 2013 में उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया था। अंडर ट्रायल के रूप में उन्हें जेल की सलाखों में 5 साल बिताना पड़ा।

5. अरुण फेरिरा(ठाणे):- नागपुर पुलिस के नक्सल-विरोधी दस्ते ने मई 2007 में पहली बार अरुण फेरिरा को गिरफ्तार किया था। उनके खिलाफ़ लगभग 10 मामले थे और 5 साल के करीब जेल में भी बिताया। उन्हें सभी मामलों में बरी कर दिया गया था।

इनके यहाँ भी हुई छापेमारी:-

1. आनंद तेलतुंबड़े(गोवा):- आनंद तेलतुंबड़े गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर हैं। ये अंबेडकर के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याताओं में से एक हैं।

2. स्टेन स्वामी(राँची):- जनजातीय अधिकार के लिए कार्यरत हैं। इस साल झारखंड में जनजातियों द्वारा जमीन प्राप्त करने के लिए पथलगढ़ी कैंपेन को उकसाने के आरोप का उन्हें सामना करना पड़ा है।

किस कानून के तहत क्या-क्या लगे हैं आरोप?

1. भारतीय दंड संहिता(IPC) के सेक्शन 153-A (शत्रुता को बढ़ावा देना), 120-B (आपराधिक साजिश) के तहत आरोप तय किये गए हैं।

2. गैरकानूनी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम(UAPA) के सेक्शन 13(गैरकानूनी गतिविधि), सेक्शन 16 (आतंकवादी हमले) सेक्शन 20 (आतंकवादी गैंग या संस्था का सदस्य होने), सेक्शन 40 (आतंकवादी संगठनों के लिए धन जुटाने) के तहत आरोप तय किए गए हैं।

दिसंबर 2017 एल्गर परिषद से शुरू हुई कहानी

◆ 31 दिसंबर 2017 को भीमा-कोरेगांव युद्ध के 200वें सालगिरह के पूर्व संध्या पर एल्गर परिषद का आयोजन किया गया।

◆ दलित ब्रिटिश टुकड़ी के हिस्सा थे जिन्होंने पेशवा पर विजय हासिल की थी।

◆ 1 जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगांव विजय स्तंभ के पास दलितों और मराठों में संघर्ष हुआ। इन दौरान 1 की मौत हुई।

◆ इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हुआ। कथित तौर पर हिंसा भड़काने के आरोप में मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े को गिरफ़्तार करने की मांग होने लगी।

◆ मर्डर का 1 और दंगे का 2, कुल मिलाकर 3 केस बने। मर्डर के आरोप में 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

◆ एल्गर परिषद के दौरान भड़काऊ भाषण के लिए जिग्नेश मेवानी और उमर खालिद के खिलाफ़ 4 जनवरी को FIR दर्ज किया गया। भडकाऊ भाषण के लिए 8 जनवरी को एक और FIR दर्ज किया गया।

◆ 17 अप्रैल को कबीर कला मंच के सदस्यों के घर पर छापेमारी की गई। जैसा कि जांच में माओवादियों का परिषद से संबंध बताया गया है।

◆ जून महीने में 5 गिरफ्तारियां की गईं। इस दौरान एक्टिविस्ट रोना विल्सन, वकील सुरेंद्र गडलिंग, एक्टिविस्ट महेश राउत, एक्टिविस्ट सोमा सेन और एल्गर परिषद के सह-संयोजक सुधीर धवले को गिरफ्तार किया गया।

◆ ये सभी येरवडा जेल में बंद हैं। अब तक इस मामले में 5 अन्य को भी आरोपी बनाया गया है। मंगलवार, 28 अगस्त को 5 नई गिरफ्तारियां हुई हैं।

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