Bakri Eid : जानिए, बकरीद के दिन बकरे की ही क्यों दी जाती है कुर्बानी

आज देशभर में भारत के मुसलमान भाई बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ ईद-उल-अजहा यानी बकरीद मना रहे है। मुस्लिम त्यौहारों में बकरीद का अपना ही एक अलग महत्व होता है। ईद-उल-फित्र यानी मीठी ईद के ठीक 2 महीने बाद आने वाला यह त्यौहार मुस्लिम समुदाय का सबसे बड़ा त्योहार होता है। यह तो हम सब जानते है कि इस दिन इस्लामिक मान्यता और प्रचलन के अनुसार मुस्लिम भाई अल्लाह के प्रति अपने प्रेम और अटल विश्वास को जताने के लिए बकरे की कुर्बानी देते है।
मुस्लिम भाई बकरीद के दिन सबसे पहले नमाज अदा करते है। इसके बाद बकरे या फिर अन्य जानवर की कुर्बानी दी जाती है। कुर्बानी के बकरे के गोश्त को तीन हिस्सों करने की शरीयत में सलाह है। गोश्त का एक हिस्सा गरीबों में तकसीम किया जाता है, दूसरा दोस्त अहबाब के लिए और वहीं तीसरा हिस्सा घर के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन क्या आप यह जानते है कि आखिर इन दिन बकरे की ही कुर्बानी क्यों देते है? बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी देने का क्या महत्व है? इस प्रचलन का कारण क्या है और इसकी शुरुआत कब हुई? चलिए जानते हैं…
इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, एक पैगंबर थे हजरत इब्राहिम और माना जाता है कि इन्हीं के जमाने से बकरीद की शुरुआत हुई। वह हमेशा बुराई के खिलाफ लड़े। उनका ज्यादातर जीवन जनसेवा में बीता।
90 साल की उम्र तक उनकी कोई औलाद नहीं हुई तो उन्होने खुदा से इबादत की और उन्हें चांद से बेटा इस्माईल मिला। उन्हें सपने में आदेश आया कि खुदा की राह में कुर्बानी दो। पहले उन्होंने ऊंट की कुर्बानी दी। इसके बाद उन्हें सपने आया कि सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दो। इब्राहिम ने सारे जानवरों की कुर्बानी दे दी। उन्हें फिर से वही सपना आया, इस बार वह खुदा का आदेश मानते हुए बिना किसी शंका के बेटे के कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी हाजरा से बच्चे को नहला-धुलाकर तैयार करने को कहा।
इब्राहिम जब वह अपने बेटे इस्माईल को लेकर बलि के स्थान पर ले जा रहे थे तभी इब्लीस (शैतान) ने उन्हें बहकाया कि अपने जिगर के टुकड़े को मारना गलत है। लेकिन वह शैतान की बातों में नहीं आए और उन्होंने आखों पर पट्टी बांधकर कुर्बानी दे दी। जब पट्टी उतारी तो बेटा उछल-कूदकर रहा था तो उसकी जगह बकर यानी बकरे की बली खुदा की ओर से कर दी गई। हजरत इब्राहिम ने खुदा का शुक्रिया अदा किया। इब्राहिम की कुर्बानी से खुदा खुश होकर उन्होंने पैगंबर बना दिया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि जिलहिज्ज के इस महीने में जानवरों की बलि दी जाती है। इसलिए बकरीद पर बकरे की कुर्बानी दी जाती है।
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