Inspiration: बचपन में ही खो दी थी आँखों की रोशनी, किसान के बेटे ने क्रैक की यूपीएससी एग्जाम

इंसान की हार तब होती है जब उसका विल पॉवर कमजोर हो जाता है। इस दुनिया में हमने कई ऐसे उदाहरण देखे हैं, जिन्होंने अपनी फिजिकल लिमिटेशंस को मात देते हुए सफ़लता के शिखर पर विजय पताका लहराई है। आपकी सफलता के लिए आपके पास संसाधनों का होना मायने नहीं रखता। अग़र आपके अंदर लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति है, तो फिऱ एक न एक दिन कामयाबी आपके क़दम जरूर चूमेगी।

उत्तर प्रदेश के एक किसान के बेटे के संघर्ष और जज़्बे की कहानी आपके रोम रोम में पॉजिटिव एनर्जी भर देगी। आपको भी लड़कर जीतने का हौसला देगी। हम आपको यूपीएससी एग्जाम में ऑल इंडिया 714वां रैंक हासिल करने 27 वर्षीय सतेंदर सिंह के संघर्ष की कहानी बताने जा रहे हैं। सतेंदर सिंह उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के रहने वाला है। वह एक PhD स्टूडेंट है। उसने भारत में आयोजित होने वाले सबसे टफ एग्जाम में से एक, यूपीएससी को क्रैक किया है।

सतेंदर की यह सफ़लता उस वक़्त बेहद दिलचस्प नजऱ आती है जब हम उसके बचपन के आंगन में झांकते हैं। जी हाँ, सतेंदर के आँखों की रोशनी चली गई है। आंख ही तो होता है, जिससे हम दुनिया के उजाले को देख पाते हैं। लेक़िन बचपन मे ही सतेंदर के जीवन के उजाले पर अंधेरे का साया पड़ गया था।

बचपन में ग़लत इंजेक्शन लगने से चली गई आंखों की रोशनी

सतेंदर जब महज़ डेढ़ साल का था, तब उसे न्यूमोनिया हो गया था। उसके माता-पिता इलाज के लिए उसे एक लोकल हॉस्पिटल में लेकर गए। दुर्भाग्यवश, उसे एक गलत इंजेक्शन लगा दिया गया, जिससे उसकी रेटिना और ऑप्टिकल नर्व्स को गंभीर नुकसान पहुंचा।

सतेंदर धीरे-धीरे बड़ा होने लगा था। वह बहुत ही चंचल स्वभाव का लड़का था। वह अक्सर आस-पड़ोस के बच्चों के साथ झगड़े किया करता था। सतेंदर के माता-पिता किसान थे। उनके पास वे आवश्यक संसाधन नहीं थे जिससे वे अपने बेटे को गाइड कर सकें। सतेंदर को वहाँ ऐसा माहौल नहीं मिल रहा था जिससे वह अपने अंदर की एनर्जी को चैनलाइज कर सके।

सतेंदर अपने कुछ दोस्तों के साथ बैठकर, स्कूल में पढ़ाए जाने वाले गणित और अंग्रेजी के लेशन्स को मेमोराइज करके अपना दिन निकालता था। सतेंदर यह सिद्ध करना चाहता था कि वह अपनी फिजिकल लिमिटेशंस के बावजूद अपने इलाके के बच्चों से बेहतर सीख सकता है।

अंकल ने की हेल्प, दिल्ली के गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल में दिलाया दाखिला

सतेंदर के अंकल मिस्टर जानम सिंह ने क़्वालिटी एजुकेशन एक्सेस करने में सतेंदर की हेल्प की। जानम सिंह उस समय दिल्ली में काम करते थे। वहाँ उन्हें किंग्सवे कैम्प एरिया में ब्लाइंड बॉयज के लिए एक गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल मिला।

उस स्कूल में शुरुआती दिनों में सतेंदर मैथेमेटिक्स के लिये Taylor’s Frames पर प्रैक्टिस किया करता था। Taylor’s Frames पर आप विभिन्न संख्याओं को बनाते, महसूस करते और पहचानते हैं। वहां सतेंदर को पहली बार ब्रेल लिपि का अनुभव प्राप्त हुआ।

लेकिन दिल्ली में बिताया गया समय और लर्निंग टूल्स से जूझ रहे सतेंदर घर वापस जाने के लिए मजबूर हो गया। फॉर्चुनेटली, एक बार जब वह इन संसाधनों में महारत हासिल करने लगा, तो चीजें अच्छी लगने लगीं। 2009 में उसने महज 10 साल के भीतर सीनियर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी की।

बोर्ड एग्जाम में सतेंदर को अच्छे अंक मिले थे। उसने नई दिल्ली में प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज में BA प्रोग्राम के लिए एनरोल किया। हालांकि, उसके रास्ते में एक बड़ी बाधा खड़ी थी। वह इंग्लिश में कॉन्सेप्ट्स को बोलने और समझने में असमर्थ था। इससे पहले उसने हिंदी मीडियम के स्कूल में पढ़ाई की थी। शुरुआत के कुछ सप्ताह में कॉलेज का माहौल उसके लिए अजनबी सा था।

कुछ क्षण के लिए चीज़ें कठिन दिखने लगीं और उसकी उम्मीद दम तोड़ने लगी थी

वहां पर लोग ऐसी भाषा बोल रहे थे जिसे सतेंदर जानता तो था मग़र वह ठीक से बोल नहीं पाता था। यहाँ तक कि उसे समझने में भी डिफिकल्टी होती थी। कई तरह के एक्सेंट्स का इस्तेमाल किया जा रहा था, जिसे समझना सतेंदर के लिए मुश्किल होता था। वह भी वैसा बनना चाहता था मग़र उसे डर भी लगता था।

कुछ क्षण के लिए चीज़ें कठिन दिखने लगीं और उसकी उम्मीद दम तोड़ने लगी थी। उसके कुछ दोस्तों ने उसे सलाह दी कि उसे यह प्लान ड्राप करके दूसरा कोर्स करना चाहिए। लेक़िन, वह अपने फ़ैसले से डिगा नहीं औऱ उसने कड़ी मेहनत की। पथप्रकाशक शिवशंकर मेनन जैसे योग्य और अनुभवी प्रोफेसरों से सीखने के अलावा उसे कॉलेज में खुले हाथों से स्वीकार किया गया और गले लगाया गया। एक साल के भीतर उसने बड़े पैमाने पर बातचीत करते हुए साथी छात्रों और शिक्षकों की सहायता से खुद को अंग्रेजी सिखाई।

सेंट स्टीफन कॉलेज में उसके भीतर काफ़ी बुनियादी बदलाव आया। अपने अंदर आये बदलाव के लिए उसके पास वो तरीक़े भी नहीं थे कि वह उन्हें धन्यवाद कर सके। संस्था का एक और पहलू पाठ्येतर गतिविधियाँ थीं, जिसने वास्तव में उसकी मदद की। वह खुशनसीब था कि उसे ऐसी समझ और दयालु प्रकृति के शिक्षक मिले।

TBI से बात करते हुए सतेंदर ने कहा, मेरे स्थानीय संरक्षक, श्री हरीश कुमार गुलाटी ने मुझे एक कंप्यूटर खरीदने में मदद की, जिसका उपयोग मैं ई-बुक्स पढ़ने के अलावा ऑडियो रिकॉर्डिंग्स को याद करने हेतु पाठ पढ़ने के लिए करता था। स्क्रीन-रीडिंग सॉफ़्टवेयर प्राप्त करना एक गेम-चेंजर था। यह स्क्रीन पर जो कुछ भी दिखाई देता है उसे पढ़ताा है। मैं इंटरनेट से पीडीएफ या ई-बुक डाउनलोड करता और अपने स्क्रीन-रीडिंग सॉफ्टवेयर के माध्यम से पढ़ता था। समाचार पत्रों के लिए मैं ई-पेपर की सदस्यता लेता। बाकी का ख्याल सॉफ्टवेयर रखता। यह प्रक्रिया काफी आसान थी।”

कुछ इस तरह आगे के संघर्षों पर पाया काबू

एमए की डिग्री प्राप्त करने के बाद सतेंदर ने जेएनयू में एमफिल के लिए दाखिला लिया।एमफिल के दौरान उसने दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री अरबिंदो कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया। जबकि सिविल सेवा परीक्षा में बैठने का भी फैसला किया। वह पहली बार 2016 में परीक्षा के लिए उपस्थित हुए, लेकिन अन्य शैक्षणिक प्रतिबद्धताओं के कारण चीजें उनके खिलाफ रहीं।

अगले वर्ष बाधाएं और भी जटिल हो गईं, जो किसी भी व्यक्ति की आशाओं और आकांक्षाओं को नष्ट कर सकती थीं। अक्टूबर 2017 में मेन्स पेपर लिखने से एक या दो महीने पहले वह आंतों के एक गंभीर संक्रमण से पीड़ित हो गया। लंबे समय तक अस्वस्थ रहने के कारण तैयारी न हो सकी।

सतेंदर की ज़िंदगी जब ढलान पर थी तब उसके एक दोस्त सचिन चंदेल ने कहा था कि हिम्मत न हार यार, यही वो कहानियां होंगी जो एक दिन एग्जाम क्रैक करने के बाद तू शेयर करेगा। उस समय उसे नहीं लगा कि वह इन कठिनाइयों को गले लगा सकता है। लेकिन वह दृढ़ संकल्प के साथ लगा रहा और एम.फिल को खत्म करने के साथ-साथ जेएनयू से पीएचडी की पढ़ाई भी शुरू की, जिसमें साइबर स्पेस में संप्रभुता के मुद्दों पर ध्यान दिया।

गर्लफ्रैंड ने किया सपोर्ट, अच्छा गया साल

नसीब से अगला साल उसके लिए बहुत अच्छा रहा। इस दौरान उसकी गर्लफ्रैंड ने उसे बहुत सपोर्ट किया। उसकी गर्लफ्रैंड दिल्ली में एक स्कूल टीचर है। हालांकि वह एक छात्रावास में रह रहा था फिऱ भी उसकी गर्लफ्रैंड ने यह सुनिश्चित किया कि वह अच्छी तरह से खाये और शांतचित्त से रहे। उसकी गर्लफ्रैंड ने इन सभी कष्टों से उसका साथ दिया। सतेंदर ख़ुद को उसका बहुत एहसानमंद मानता है।

दृढ़ संकल्प के परिणाम अब सबके सामने हैं, जिसे हर कोई देख सकता है। सतेंदर के माता पिता कई विषम परिस्थितियों से होकर गुजरे थे। इसलिए यह सबसे अच्छा दौर था जो सतेंदर अपने माता पिता को दे सकता था। माता पिता की आवाज़ में गर्व के साथ अपनी उपलब्धि की बात सुनकर उसे बहुत ख़ुशी होती है।

यूपीएससी के उम्मीदवारों के लिए सतेंदर के पास कुछ सरल सुझाव हैं:

– विश्वास रखें और खुद से प्यार करें।

-अपने सिर को नीचे रखें और काम करें।

-रिवाइज, रिवाइज एंड रिवाइज। दस किताबों को एक बार पढ़ने के बजाय, एक किताब को दस बार पढ़ें।

-आख़िर, अपनी तैयारियों के अनुरूप हो।

यदि आप इन बातों को ध्यान में रखते हैं, तो आपको अपनी क्षमताओं पर आश्चर्य होगा। सफलता और असफलता जीवन में बड़े लक्ष्यों का साधन मात्र हैं। यूपीएससी को क्रैक करना अंतिम लक्ष्य नहीं है, लेकिन अधिक से अधिक चीजों की ओर बढ़ने का साधन है।

~Shravan Pandey

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