Interim Budget 2019: मोदी बनाम मनमोहन, FDI और विदेशी मुद्रा भंडार में कौन बेहतर

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लोकसभा चुनाव 2019 से पहले आज पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली NDA सरकार अपना आख़िरी बजट पेश कर रही है। आज हम वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA 2 सरकार के बीच तुलना करेंगे और देखेंगे कि इन दोनों सरकारों में से बेहतर कौन है।
जब UPA 2 साल 2009 में सत्ता में आई तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ( India’s foreign exchange reserve ) 2,80,000 मिलियन डॉलर था। मनमोहन सिंह सरकार के अगले 5 सालों में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार ( India’s foreign exchange reserve ) में उतार-चढ़ाव देखा गया, लेकिन विकास में वृद्धि हुई।
पहले साल यानी 2010 के अंत में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ( foreign exchange reserves ) 3,00,000 मिलियन डॉलर को पार कर गया। यहां से, भंडार में अगले दो वर्षों में गिरावट देखी गई और 2014 में UPA 2 शासन के अंत तक, विदेशी मुद्रा भंडार 3,03,674 मिलियन डॉलर था।
इसका मतलब यह है कि UPA 2 सरकार के पांच वर्षों में विदेशी मुद्रा भंडार में 8.45 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA-2 की तुलना में, नरेंद्र मोदी सरकार में विदेशी मुद्रा भंडार ( foreign exchange reserves )
में 2014 और 2019 के बीच 16.86 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।
2014 में जब मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला था, तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ( foreign exchange reserves ) 3,40,000 मिलियन डॉलर था। विदेशी मुद्रा भंडार का ग्राफ ऊपर की ओर देखा गया, जो 4,20,000 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया और फिर वर्तमान में गिरकर 3,97,352 मिलियन डॉलर हो गया।
मनमोहन के अधीन FDI और मोदी के अधीन FDI में तुलना
मनमोहन सरकार के अधीन प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( FDI ) में वृद्धि और गिरावट देखी गई। UPA 2 सरकार के पहले वर्ष में, एफडीआई 17,966 मिलियन डॉलर था। अगले वर्ष में, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( FDI ) लगभग 11,834 मिलियन डॉलर तक गिर गया। यूपीए सरकार के तीन साल के कार्यकाल में FDI में दो गुना वृद्धि देखी गई, जबकि यह आंकड़ा 22,061 मिलियन डॉलर था। UPA 2 के अंत तक, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( FDI ) 21,564 मिलियन डॉलर था।
UPA 2 के पांच वर्षों की तुलना में, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( FDI ) में 20.02 प्रतिशत की समग्र वृद्धि देखी गई।
इसके मुकाबले मोदी सरकार के पहले साल में भारत का FDI 31,251 मिलियन डॉलर था। मोदी सरकार के दूसरे वर्ष में यह बढ़कर 36,021 मिलियन डॉलर हो गया। मोदी सरकार के चार साल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( FDI ) 30,286 मिलियन डॉलर था।
यह उस आंकड़े से कम था जिससे मोदी सरकार ने शुरू किया था। मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में 3.08 प्रतिशत की गिरावट देखी।
NPAs पर मोदी बनाम मनमोहन
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की गैर निष्पादित संपत्ति ( NPAs ) भारत के बैंकिंग क्षेत्र की एक बड़ी समस्या रही है। यह समस्या नरेंद्र मोदी सरकार के लिए कोई अनोखी बात नहीं है।
जब मनमोहन सिंह ने 2009 में UPA 2 सरकार शुरू की, तो NPAs 1 लाख करोड़ रुपये था। UPA 2 के पांच वर्षों में, NPAs 1 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2.63 लाख रुपये हो गया। यह 163 फीसदी की वृद्धि थी।
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA 2 के कार्यकाल के समान ही मोदी सरकार में NPAs बढ़ता रहा। 2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे, तब NPAs 3 लाख करोड़ रुपये था। अगले पांच वर्षों में एनपीए में तेजी देखी गई। मौजूदा समय में एनपीए 10,36,187 करोड़ रुपये है।
गैर निष्पादित संपत्ति ( NPAs ) में यह 245 प्रतिशत की वृद्धि थी।
यह जरूरी नहीं कि सरकार के प्रदर्शन पर एक खराब प्रतिबिंब हो। यह स्पाइक इसलिए है क्योंकि बैंकों से कहा गया है कि वे खराब ऋणों को परिसंपत्तियों के रूप में आगे न बढ़ाएं। नए शासन के तहत, 90 दिनों तक सेवित नहीं किया गया कोई भी ऋण स्वचालित रूप से गैर-निष्पादित परिसंपत्ति में बदल जाता है। इसलिए, अधिक बुरे ऋणों को अब एनपीए घोषित किया गया है। यह प्रणाली में पारदर्शिता लाता है और वास्तव में नरेंद्र मोदी सरकार की एक सकारात्मक उपलब्धि है।
~Shravan Pandey

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