कन्या भ्रूण हत्या: पैदा होने के बाद जो छीनना है छीन लेना, लेकिन कम से कम पैदा होने का हक तो मत छीनो

आज हम भ्रूण हत्या पर बात करेंगे। कन्या भ्रूण हत्या कहना ज्यादा सही होगा। क्यों? अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो सुना होगा। लेकिन अगले जनम मोहे बेटा ना कीजो की गुहार सुनी है? यही भेजू संदेश म्हारी लाड़ो, तू ना आना इस देश म्हारी लाड़ो सुना होगा। लेकिन किसी मां को लाड़ो की जगह लड़के से इस दुनिया में न आने का अनुरोध करते सुना है? नहीं ना। इसलिए हम भ्रूण हत्या नहीं बल्कि कन्या भ्रूण हत्या पर बात करेंगे।

हत्या करना पाप है। इसके खिलाफ सख्त से सख्त कानून भी है। लेकिन क्या आप जानते हैं हर हत्या के लिए फांसी या आजीवन कारावास की सजा नहीं होती। क्रूरतम से क्रूरतम मामलों में ही हत्यारे को फांसी की सजा दी जाती है। 30 साल के आदमी द्वारा 30 साल के आदमी को मारना क्रूर तो है, लेकिन ज्यादा क्रूर है 30 साल के आदमी द्वारा 3 साल के बच्चे को मारना और उसने भी ज्यादा क्रूर 3 महीने के बच्चे को मारना। यानी जान जितनी नन्हीं और नाजुक उनकी हत्या का जुर्म उतना ही क्रूर और जघन्य। उसको लेकर समाज में उतनी ही ज्यादा नफरत और घृणा। साथ ही कानून द्वारा उतनी ही कठोरतम सजा। लेकिन फिर सवाल उठता है कि उस जान की कीमत का क्या जिसने अभी तक जन्म ही नहीं लिया? उसको मारने का अपराध कितना बड़ा अपराध होगा?
परमाणु बम का अविष्कार जितना घातक जापान के हिरोशिमा और नागासाकी जैसे दो शहरों के लिए साबित हुआ। एमिनो सिंथेसिस( भ्रूण परीक्षण पद्धति) का अविष्कार भी कन्या भ्रूण हत्या के इतिहास के पन्नों पर उतना ही खतरनाक और खलनायक बनकर उभरा। ऐसा कहने के पीछे कारण है। कुछ वर्ष पहले अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘द लैन्सेट’ में छपे एक शोध का यह दावा था कि पिछले 3 दशक के दौरान भारत में कम से कम 40 लाख बच्चियों की भ्रूण हत्या कर दी गई। उनका यहां तक कहना था कि यह आंकड़ा अंदाजन 1 करोड़ 20 लाख से भी ज्यादा हो सकता है। क्या इन आंकड़ों ने आपके शरीर मे सिहरन पैदा नहीं की? अगर नहीं, तो एक काम कीजिए उन लाखों अजन्मी बच्चियों के खून से लथपथ भ्रूण की कल्पना कीजिए। अब अगर इस ख्याल भर से आपका पूरा शरीर कांप उठ जाए, तो समझिए कि आप भ्रूण हत्या की नृशंसता को थोड़ा बहुत समझने में सफल हो गए हैं।

महावीर, बुद्ध, गांधी इन नामों को जानते हैं आप? ये वो नाम हैं जिनके नाम से दुनिया आपको और आपके देश को जानती है। जानते हैं इन तीनों नामों में एक चीज क्या सामान्य है? वह है इन तीनों का हिंसा को सबसे बड़ा पाप बता लोगों से अहिंसा के मार्ग पर चलने की मांग करना। मतलब यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि बुद्ध और गांधी के देश भारत में पिछले तीन-चार दशकों में लाखों-करोड़ों बच्चियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया गया। माना जन्म ले लेने के बावजूद उसे पूरी जिंदगी मर-मरकर ही गुजारनी पड़ती, लेकिन तब जीना या मरना उस लड़की की पसंद होती। पैदा होने के बाद हमारे समाज को उससे चाहे जितने अधिकार छिनने हो छीन ले। लेकिन कम से कम उससे उसके पैदा होने के हक को तो न छीने।
कन्या भ्रूण हत्या को लेकर पहली वाली खबर की याद अभी दिमाग से पूरी तरह धुंधली भी नहीं होती है कि कन्या भ्रूण हत्या से जुड़े नए कांड की कहानी भी आ धमकती है। आए दिन अखबार के पन्नों पर प्लास्टिक में लिपटे कन्या भ्रूण के कभी किसी नाली तो कभी किसी कचरे के ढेर में मिलने की खबर छपती रहती है और ऐसी खबरें संवेदनशील लोगों के सीने को छलनी करती रहती हैं। जरा सोचिए, अगर आप अपनी छोटी बेटी के साथ खेलते हुए न्यूज चैनल लगाए। और उस पर यह खबर चल रही हो कि फलाने शहर के फलाने मंदिर की सीढ़ियों पर पड़े कन्या भ्रूण को कुत्ते सफ़ाचट कर गए। तो क्या आपका दिल दहल नहीं जाएगा? अगर आप एक बेटी की मां हैं तो आपका कलेजा मुंह को आना तो बनता है। सोचिए कितना हृदय विदारक है यह सब कुछ। फिर भी होता है यह सब। और ऊपर बात चुका हूं कि पिछले 3-4 दशक में लाखों बार हो चुकी है कन्या भ्रूण हत्या।

अब सवाल उठता है कि भ्रूण हत्या होती क्यों है? वो कौन से कारण हैं जिनके चलते खुद एक लड़की एक अजन्मी लड़कों का कत्ल कर देती है। अनचाहा गर्भ भ्रूण हत्या का एक कारण हो सकता है। खासकर उन इलाकों में जहां के नौजवानों को सुरक्षित यौन संबंध को लेकर ज्यादा जानकारी नहीं होती। जिसके चलते शादी से पहले पेट में गर्भ ठहरने के बाद लोक-लाज के डर से उसे गिरा देना आम बात है। बच्चा नहीं चाहिए कहकर भी लोग अक्सर कानून द्वारा निर्धारित 20 हफ़्तों से कम के भ्रूण को डॉक्टर की देख रेख में गिरवा देते हैं। लेकिन बात जब कन्या भ्रूण हत्या की आती है, तब एक और एक मात्र कारण होता है; ‘हमें लड़की नहीं चाहिए।’ कहने का मतलब कन्या भ्रूण हत्या के मामलों के पीछे अगर कोई सबसे ज्यादा जिम्मेदार है तो वह समाज जो लड़कियों की तुलना में लड़कों को ज्यादा वरीयता देता है।
दरअसल, हमारे पुरुषप्रधान समाज में ऐसे कई काम हैं जिसके लायक या फिर कहें जिसका एकाधिकार लड़कों के पास है। अब चाहे वह वंश बढ़ाने जैसा दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कार्य हो या घर चलाने जैसी जरूरी जिम्मेदारी। इनका बोझ सिर्फ लड़कों के कंधे ही उठा सकते हैं। इस मामले में लडकियां थोड़ी पिछड़ी जाती हैं। क्योंकि जिन्हें समाज खुद घर पर बोझ समझता हो वह भला क्या घर का बोझ उठा पाएंगी। लड़का पैदा होगा तो वह घर में लक्ष्मी लाएगा। यह लक्ष्मी टू इन वन होती है। घर की तिज़ोरी भी भरती है और घर की सफाई भी करती है। लेकिन लड़की पैदा हुई तो उसके पैदा होने के बाद उसके शादी का सरदर्द और फिर शादी के बाद खुद भी चली जाती है और दहेज के चक्कर में तिरोजी भी खाली कर जाती है। कहने का मतलब अब ऐसी सामाजिक सोच और व्यवस्था में लड़की पैदाकर घाटा कौन मोल ले।
उपर्युक्त कारणों के चलते ही अगर हम 1951 के लिंगानुपात की तुलना 2011 के लिंगानुपात से करें तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि 1951 की तुलना में 2011 में लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 946 महिला से घटकर 943 रह गया। यानी जब भारत दिन-ब-दिन खुद के आधुनिक होने का दावा कर रहा था तब परदे के पीछे आधा भारत दिन-ब-दिन सिकुड़ता जा रहा था। 1951 में भारत में प्रति 1000 पुरुषों पर 946 महिलाएं थीं, जो 1961 में घटकर 941, 1971 में और ज्यादा घटकर 930, 1981में थोड़ा बढ़कर 934, 1991में एक बार फिर लुढककर 927, 2001 में चढ़कर 933 और फिर 2011 तक यह बढ़कर 943 हो गया। कहने का मतलब पिछले 60 सालों के दरम्यान उतार-चढ़ाव के बावजूद लिंगानुपात अब तक उतनी ही खराब है जितनी 60 साल पहले थी। कितने दुर्भाग्य की बात है कि 60 साल में देश में क्या-क्या नहीं बदला, देश कहां-से-कहां पहुंच गया। लेकिन कितनी शर्मिंदगी की बात है कि लिंगानुपात अब भी वही का वही अटका पड़ा है।
अगर आपको लगता है कि यह आकंड़े सबसे बुरे हैं। तो आपके लिए बुरी खबर है। क्योंकि यह वो बड़े और बच्चों दोनों का लिंगानुपात था। लेकिन अगर हम बड़े को किनारे कर सिर्फ बाल लिंगानुपात की बात करें तो शायद आप उस बात पर यकीन भी ना करना चाहें। लेकिन मुंह मोड़ लेने से हकीकत बदल जाती तो क्या गम था। 1951में भारत में बाल लिंगानुपात था 983, यानी प्रत्येक 1000 लड़कों पर 983 लड़कियां।अब कायदे से होना तो यह चाहिए था कि जैसे-जैसे लोग शिक्षित होते, जागरूक होते, आधुनिक होते वैसे वैसे लड़कियों को लेकर उनकी सोच ज्यादा समृद्ध होती और लिंगानुपात बढ़ता। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। एकदम उलट। जो बाल लिंगानुपात 1951 में 983 था वो 2011 में लुढ़ककर 918 पर आ गया। और यह एकदम से नहीं हुआ। बल्कि 60 साल की हर पीढ़ी ने कन्या और कन्या भ्रूण के साथ छल किया। चलिए दशक दर दशक बाल लिंगानुपात में होने वाली कमी को आंकड़ो के जरिए समझते हैं। साल 1951 में बाल लिंगानुपात था 983, जो 1961 में घटकर हो गया 976, 1971 में यह लुढ़ककर हो गया 964, 1981 में 962 तो 1991 में गर्त में गोता लगाते हुए पहुंचा 945 पर। इसके बाद 2001 और 2011 में बाल लिंगानुपात घटते-घटते क्रमशः लुढ़ककर 933 और 918 तक पहुंच गया। अगर शुरू में कन्या भ्रूण हत्या को लेकर ‘द लैंन्सेट’ के आंकड़ो पर शक हुआ होगा, तो शायद इन आंकड़ो को देखने के बाद वह खत्म हो गया होगा।
अब सवाल उठता है कि अगर भ्रूण हत्या एक बीमारी है, तो फिर इसका इलाज क्या है? इलाज के दो तरीक़े हैं। पहला रोकथाम और दूसरा दंडात्मक उपचार। रोकथाम हम सामाजिक जनजागृति के जरिए कर सकते है। सरकार द्वारा अपनी नीतियों के जरिए। लड़कियों के लिए एक सुरक्षित सामाजिक माहौल तैयार करना। समाज में बच्चियों के सर्वांगीण विकास के लिए न सिर्फ कागजी योजनाएं बनाना बल्कि उनका क्रियान्वयन धरातल पर भी करना। ताकि समाज में लड़कियों को सम्मान से देखा जाए। दहेज जैसी कुप्रथा हो या बलात्कार जैसी घटनाएं इनपर किसी भी हालत में नकेल कसना होगा। क्योंकि जब तक लड़कियों के लिए एक आजाद ख्याल समाज का निर्माण नहीं होगा, तब तक लडकियां आजाद नहीं हो पाएंगी। लड़कियों को लड़कों की तरह पालने की पहल अच्छी तो है लेकिन सकारात्मक नहीं। इससे होगा यह कि लड़की खुद लड़की होने के बजाय लड़का दिखाना/होना ज्यादा पसंद करेगी। यह भी एक तरह की कन्या हत्या ही हुई। लड़की को लड़की की तरह स्वीकार करना होगा।

बाकी रही बात कानून की तो वह अपना काम तब करेगी, जब कुछ गलत होगा या ऐसा होने की प्रबल संभावना होगी। भारतीय दंड संहिता के तहत धारा 313, धारा 314 और धारा 315 के अंतर्गत भ्रूण हत्या से जुड़े मामलों में सजा का प्रावधान है।
धारा 313 – स्त्री की मंजूरी के बगैर गर्भपात करवाने की स्थिति में गर्भपात कराने वाले को आजीवन कारावास या/और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
धारा 314 – इसके अंतर्गत गर्भपात करने के उद्देश्य से किए गए क्रियाकलापों में लिप्त पाए जाने पर दष वर्ष का कारावास या/और जुर्माने दोनों से दंडित किया जा सकता है। अगर यह सब कुछ महिला की सहमति के बिना हो रहा होगा तो आजीवन कारावास का भी प्रावधान है।
धारा 315 – इसके अंतर्गत शिशु को जीवित पैदा होने से रोकने या जन्म के पश्चात्‌ उसकी मृत्यु करने के आशय से किया गया कार्य से संबंधित यदि कोई भी अपराध होता है, तो इस प्रकार के कार्य करने वाले को दस वर्ष की सजा या जुर्माना दोनों से दण्डित किया जा सकता है।
कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति, उसके कारण, उसके निराकरण सबको एक कोने में, सरकार अंत में, मेरी आपसे दोबारा यह अपील होगी कि पैदा होने के बाद आप लड़कियों से जो चाहे छीन लेना, लेकिन कम से कम लड़कियों से पैदा होने का हक तो मत छीनिए।
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