#MeToo मूवमेंट के तहत विलेन बने आलोकनाथ को कोर्ट से मिली राहत

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कहते हैं जब सच अपने जूतों के फ़ीतें बांध रहा होता है तब तक झूठ दुनिया का आधा चक्कर लगा लेता है। और इससे होता यह है कि शुरुआती समय में लोग झूठ को ही सच मान लेते है। लेकिन, झूठ के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि एक न एक दिन झूठ भी झूठा साबित हो जाता है। वो अलग बात है कि झूठ के झूठा साबित होने तक सच को लोगों की नजरों में झूठा बने रहने का अपमान झेलना पड़ता है। सच और झूठ के बीच के इस बारीक फर्क को आज आपकों हम इसलिए बता रहे हैं क्योंकि #MeToo अभियान के तहत कई ऐसे लोग रहे जिन्हें लोगों ने सिर्फ इसलिए खलनायक बना दिया क्योंकि उनपर किसी ने छेड़छाड़ या दुष्कर्म का ‘आरोप’ लगा दिया था। और हम लोगों ने सिर्फ आरोप के आधार पर ही उन्हें अपराधी मान लिया।

#MeToo अभियान के तहत जिन लोगों पर दुष्कर्म के आरोप लगाए गए उनमें एक नाम बॉलीवुड के ‘संस्कारी’ एक्टर आलोकनाथ का भी था। आलोकनाथ पर राइटर और डायरेक्टर विंता नंदा में अपने साथ बलात्कार करने का आरोप लगाया था। विंता नंदा द्वारा आरोप लगाए जाने के बाद मीडिया ने #MeToo मूवमेंट की भावनाओं में बहते हुए सिर्फ आरोप के आधार पर ही आलोकनाथ को किसी अपराधी की तरह पेश करना शुरू कर दिया। लेकिन आरोपों का सामना कर रहे बॉलिवुड ऐक्टर आलोकनाथ को कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। मामले में आलोक नाथ को अग्रिम जमानत देने वाले 15 पेज के ऑर्डर में सेशन कोर्ट ने कहा है कि इन संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरोपी को गलत तरीके से इस अपराध में फंसाया गया है।

कोर्ट के मुताबिक इन सभी तथ्यों के आधार पर यह संभावना हो सकती है कि आरोपी को गलत तरीके से इस क्राइम में खींचा गया हो। घटना के 20 साल बाद एफआईआर दर्ज कराने पर कोर्ट ने कहा कि सेक्शन 376 (रेप) और 377 (अप्राकृतिक यौन अपराध) के लिए केस दर्ज कराने की कोई समय-सीमा नहीं है लेकिन इस मामले में ऐसे भी कोई रिकॉर्ड नहीं हैं जो साबित कर सकें कि आरोपी आलोकनाथ ने नंदा को केस दर्ज न कराने को लेकर धमकाया हो। बता दें कि नंदा ने अक्टूबर 2018 में मीटू मूवमेंट के दौरान ऐक्टर आलोकनाथ पर आरोप लगाए थे कि 19 साल पहले उन्होंने उनके साथ रेप किया था। यह बात ध्यान देने वाली है कि नंदा को पूरी घटना के बारे में पता है लेकिन उन्हें यह बात याद नहीं कि यह घटना किस महीने और किस तारीख को घटी।

कोर्ट ने कहा, चूंकि आरोपी और शिकायतकर्ता दोनों ही शादी-शुदा (अलग-अलग) हैं इसलिए पीड़िता का मेडिकल टेस्ट कराने का कोई मतलब नहीं है। इसके अलावा घटना शिकायतकर्ता के घर पर हुई ऐसे में आरोपी द्वारा सबूत मिटाने की भी कोई संभावना नहीं है। वहीं देर से एफआईआर दर्ज कराने को लेकर शिकायतकर्ता ने कोर्ट को बताया है कि उन्होंने इस बारे में अपने दोस्तों से सलाह ली थी लेकिन उन्होंने आरोपी के बड़े ऐक्टर होने की बात कही और बताया कि उनकी ‘कहानी’ पर कोई भी यकीन नहीं करेगा। इस वजह से वह केस फाइल नहीं कर सकीं। कोर्ट ने आलोकनाथ को राहत देते हुए यह भी कहा कि मामले की जांच के लिए ऐक्टर के कस्टोडियल इंटरोगेशन की जरूरत नहीं है। इस फैसले के बाद आलोक ने अपनी पत्नी आशु का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “वह मेरे लिए शक्ति स्तंभ रही हैं। मैं ईश्वर का आभारी हूं कि मेरी इस पूरी यात्रा में वह मेरी सहयात्री रहीं।”

आलोक ने कहा, ”माननीय अदालत और मेरे वकीलों ने मुझे अभी पूरी तरह से चुप रहने की सलाह दी है। वास्तव में, मैं पूरे समय शांत रहा हूं। हो सकता है, कुछ शब्द मेरे मुंह से गुस्से में निकल गए हों। अन्यथा, मैं 3 महीने से पूरी तरह शांत रहा हूं। मेरे लिए फिलहाल कोई टिप्पणी करना सही नहीं है, लेकिन हां, हमें (आलोक और उनके वकीलों की टीम) अग्रिम जमानत मिल गई है और हम इसके लिए बहुत आभारी हैं। जब भी मैं बोलने की स्थिति में होउंगा, मैं ईमानदारी से आपसे बात करूंगा। मैं अभी कुछ भी नहीं बता सकता हूं, लेकिन एक बात मैं आपको बता सकता हूं। यह लड़ाई अपने उचित निष्कर्ष तक पहुंच जाएगी और सच्चाई, जो कुछ भी है, वह सामने आ जाएगी।”

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