Pregnancy Issues: भारतीय महिलाओं के लिए गर्भावस्था से जुड़े 5 प्रमुख जोखिमों पर एक नज़र

भारत ने पिछले साल मातृ मृत्यु दर(MMR) में कमी लाने में कुछ सफलता पाई। आंकड़ों से पता चला कि देश में प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं में से एक मातृ मृत्यु दर (MMR) में 22 प्रतिशत की गिरावट आई है।

आंकड़ों के मुताबिक, 2011-13 के दौरान यह 167 था जो 2014-2016 के दौरान गिरकर 130 पर आ गया। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय महिलाओं के लिए स्वस्थ और सुरक्षित प्रसवपूर्व और प्रसव के बाद की देखभाल के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है तब जाकर विकसित देशों में गर्भवती महिलाओं के बराबर की स्थिति हो पाएगी।

आइये भारत में महिलाओं के गर्भधारण में शामिल पांच प्रमुख जोखिमों पर नजर डालें और जानें कि उन्हें कैसे रोका जा सकता है।

1. पौष्टिक आहार का अभाव:- गर्भावस्था और प्रसव के दौरान रक्तस्राव (प्रसवोत्तर रक्तस्राव) मुख्य स्वास्थ्य जोखिमों में से एक है, जिसका महिलाओं को जन्म देते समय सामना करना पड़ता है। जीवन के लिए यह खतरनाक स्थिति कुपोषण से जुड़ी हुई है। यह स्थिति दोनों ही, ग्रामीण और शहरी महिलाओं के साथ है।

स्त्री रोग विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में शहरी और ग्रामीण महिलाओं के बीच स्वास्थ्य सेवा और जागरूकता तक पहुँच के मामले में अंतर हो सकता है, लेक़िन दोनों वर्गों को एक समान समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जिसे ‘कुपोषण’ कहते हैं।

महिलाओं को ज्यादातर एनीमिक होता है, जिसके कारण अक्सर प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होता है। प्रॉपर हेल्थकेयर से वंचित रहने के कारण कई बार महिलाओं की मौत हो जाती है। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में महिलाएं जागरूक हैं। वे सप्लीमेंट लेती हैं और रेगुलर चेकअप करवाती रहती हैं।

पोषण की इस स्थिति से निपटने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) गर्भावस्था के दौरान रोज़ाना आयरन और फोलिक एसिड की खुराक की सिफारिश करता है। भारत में सरकार ने लक्ष्य समूह के लिए एक रणनीति, एनीमिया मुक्त भारत, या गहन राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल तैयार की है, जिसमें प्रजनन आयु की महिलाएं शामिल हैं।

पांच में से केवल एक महिला इस सलाह का पालन करती है। रक्तस्राव पैदा करने के अलावा, एनीमिया महिलाओं में थकान और कमजोरी भी पैदा करता है। गर्भवती महिलाओं के लिए एक ही रास्ता है कि वे संतुलित आहार लें।

एक स्वस्थ माँ महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अपने अजन्मे बच्चे के लिए एक इनक्यूबेटर है। यदि एक महिला गर्भावस्था के दौरान पौष्टिक आहार खाती है, तो भ्रूण का मस्तिष्क विकास अच्छा होता है। यह भी सुनिश्चित करता है कि जन्म दोष में कमी हो और बच्चे का वजन भी स्वस्थ हो।

2. संक्रमण:- स्त्रीरोग विशेषज्ञ गर्भावस्था के समय भारतीय महिलाओं के लिए सरकारी सुविधाओं में संक्रमण और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा कुशलता की कमी की चेतावनी देते हैं। एक और बड़ा जोखिम सेप्सिस (संक्रमण) है, जो खराब स्वच्छता के कारण प्रसव के दौरान होने वाली 10 प्रतिशत मौतों का कारण है।

ग्रामीण बेल्ट में घर पर डिलीवरी की अवधारणा अभी भी है। यह कभी-कभी संक्रमण जैसी जटिलताओं का कारण बनता है और इसी तरह की कुछ सरकारी सुविधाओं में हालात है जहां स्वास्थ्य कार्यकर्ता पर्याप्त पेशेवर नहीं हैं और गर्भवती महिला को शारीरिक आघात देते हैं।

दाइयों (Midwives) को डिलीवरी करने का बुनियादी ज्ञान तो है, लेकिन ऑपरेशन करने का तरीका नहीं मालूम है। डॉक्टरों की कमी के कारण सरकारी अस्पतालों के लेबर रूम में अव्यवस्था भी गर्भवती महिलाओं के लिए बहुत तनाव का कारण है। विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि प्रसव और प्रसवोत्तर देखभाल के दौरान स्वच्छता बनाए रखना सभी स्तरों पर अनिवार्य किया जाना चाहिए।

कभी-कभी, गर्भाशय सिकुड़ता नहीं है और खून बहता रहता है। इस स्थिति में, हमें गर्भवती महिला को दवा देने की जरूरत होती है। सरकारी सुविधाओं और यहां तक ​​कि अस्पतालों में क्लीन सैनिटरी नैपकिन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराए जाने चाहिए क्योंकि कुछ महिलाएं गंदे कपड़े का उपयोग करती हैं जो गंभीर संक्रमण का कारण बनता है।

3. गर्भावस्था की तैयारी:- सेक्सुअल और रिप्रोडक्टिव राइट्स एक्टिविस्ट अक्सर इस बात को उजागर करते हैं कि एक महिला को अपने शरीर पर पूर्ण अधिकार होना चाहिए। इस संबंध में, स्त्रीरोग विशेषज्ञ महिलाओं को समय पर गर्भावस्था के महत्व को इंगित करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण सलाह यह है कि सही उम्र में गर्भधारण करना चाहिए।

गर्भधारण को 30 और 35 वर्ष की उम्र से अधिक विलंबित नहीं किया जाना चाहिए। डॉक्टर प्री-काउंसिलिंग का परामर्श देते हैं। इससे डॉक्टर बच्चे को होने वाली किसी भी बीमारी, बच्चे को होने वाले किसी भी आनुवंशिक दोष की पहचान कर सकेंगे। तदनुसार, निर्णय, परीक्षण लिए जा सकते हैं।

डॉक्टरों ने भारतीय महिलाओं में देर से गर्भधारण की बढ़ती प्रवृत्ति को भी नोटिस किया है। 20 से 30 प्रतिशत महिलाओं ने 35 साल की उम्र के बाद गर्भधारण का विकल्प चुना है। इसके अतिरिक्त, महिलाएं प्रसवपूर्व जांच के लिए भी नहीं जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे जोखिम कारकों से अनजान रहती हैं।

भारतीय महिलाएं प्री-एक्लेमप्सिया और एक्लम्पसिया भी विकसित करती हैं, जो ब्लडप्रेशर से संबंधित है। इससे जीवन को खतरा हो सकता है। महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान कम से कम तीन जांचों को करना चाहिए, जिसमें सभी आवश्यक जांच शामिल होते हैं।

4. प्रसवोत्तर अवसाद ( Postpartum depression ):- प्रसवोत्तर अवसाद एक अत्यंत दुर्बल मनोदशा विकार है। महिलाओं को प्रसव के बाद अक्सर इस जोखिम का सामना करना पड़ता है। चिंता, निराशा, थकान, क्रोध, अक्सर मिजाज का बदल जाना इसके लक्षणों में शामिल हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साथ मिलकर 2017 में किए गए एक अध्ययन, ‘पोस्टपार्टम डिप्रेशन इन इंडिया’ ने एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में मूड डिसऑर्डर को काफी विस्तार से समझाया।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के जोखिम कारकों में वित्तीय कठिनाइयां, घरेलू हिंसा, मां में मानसिक बीमारी का पिछला इतिहास और वैवाहिक संघर्ष, बीमार बच्चे या जन्म के समय बच्चे की मृत्यु शामिल हैं।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन से निपटने के लिए किसी को यह समझने की आवश्यकता है कि यह प्रसवपूर्व अवसाद हो सकता है, जो अगर जारी रहता है, तो प्रसव के बाद दो सप्ताह से तीन महीने तक स्थायी हो सकता है। इसके लिए कोई निर्धारित समयावधि नहीं है। इसके उपचार के प्रभावी तरीकों में परामर्श और दवा शामिल है।

5. बच्चों में संक्रमण:- जन्म के तुरंत बाद शिशुओं में संक्रमण को रोकने के लिए और सुरक्षित और स्वस्थ मातृत्व के लिए, स्तनपान एक और महत्वपूर्ण कारक है।

स्तनपान महत्वपूर्ण है क्योंकि स्तन के दूध में एंटीबॉडी होते हैं जो बच्चे की रक्षा करते हैं, विशेष रूप से पहले तीन दिनों के स्तन के दूध को जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है। इसके अलावा, यह सही तापमान पर सही PH संतुलन पर पोषण है।

कोलोस्ट्रम में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होता है औऱ संतुलित मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है। स्तन के दूध को संक्रमण को रोकने के लिए भी माना जाता है और यह स्वास्थ्यकर होता है। यह गैस्ट्रिक संक्रमण की कम संभावना को अनुमति देता है।

पिछले साल सितंबर में, न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैकिंडा अर्डर्न ने अपने बच्चे को संयुक्त राष्ट्र महासभा में लाकर उसे स्तनपान कराकर इतिहास बनाया, जिससे दुनिया भर में इस मुद्दे पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया।

~Shravan Pandey

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