पुणे के इस बेरोजगार व्यक्ति ने अपनाई खेती, शिमला मिर्च से कमाता है लाखों

आधुनिक भारत यानी टेक्नोलॉजी पर आश्रित भारत में बेरोजगारी एक विकराल समस्या है। मनुष्य ने मशीन को अपना सहायक बनाया था मग़र आज मनुष्य मशीन का नौकर बन गया है। कागज़ पर देश तरक्की की तरफ़ अग्रसर तो है मग़र ज़मीन पर तस्वीरें उस कागज़ को फाड़ फेंकने के लिए तैयार हो जाती हैं। खासकर, आज का युवा वर्ग पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश में दर-दर की ठोकर खा रहा है। इन सबमें एक ऐसा भी व्यक्ति है जिसे नौकरी नहीं मिली तो उसने खेती करना शुरू कर दिया।

पुणे के इंदापुर तालुका का कड़बनवाडी दो वज़हों से जाना जाता है। पहला, यह एक आदर्श गांव है और दूसरा, वह व्यक्ति भजनदास पवार जो इस गांव को सूखे से राहत दिलाने में लगा हुआ है। एक समय यह गांव महाराष्ट्र के 300 सूखे प्रवण गांवों में गिना जाता था, जहां पीने का पानी भी एक लक्जरी था। आगे चलकर कड़बनवाडी में 100 खेत के तालाब, तीन परिसंचरण टैंक, 27 सीमेंट नाला बंड और 110 मिट्टी के बंडों का निर्माण हुआ। यह सब एक सेवानिवृत्त शिक्षक के अनवरत प्रयासों की देन है।

अपने गांव की उन्नति, कृषि और पर्यावरण के प्रति भजनदास का यह वही प्यार और जुनून था जिसे उन्होंने अपने बेटे विजयराव में भर दिया। बड़े होकर विजयराव ने उसी स्कूल में पढ़ाई की जहाँ से उनके पिताजी भजनदास पढ़ाते थे।

एग्रीकल्चर में बीएससी करने के बाद विजयराव ने महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन में प्रवेश लेने का फ़ैसला किया

लेक़िन पुणे में साल 2010 में कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर से एग्रीकल्चर में बीएससी करने के बाद विजयराव ने महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन में प्रवेश लेने का फ़ैसला किया। एग्रीकल्चर ने बैकसीट लिया, और उस युवा व्यक्ति ने महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ में इसके लिए अध्ययन करने का फैसला किया।

दो साल गुजर चुके थे मग़र कई राउंड के इंटरव्यू अटेंड करने के बावजूद विजयराव दो नौकरियों के बीच में अटके रहे यानी उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी। हताश, निराश होकर वह अपने गांव लौट आये। कुछ समय के लिए उन्होंने एक पेट्रोल पंप पर काम किया। लेक़िन उस समय उन्हें एहसास हुआ कि ऐसा करके वह अपने एग्रीकल्चर डिग्री को बेकार कर रहे थे।

विजयराव याद करते हैं, “मैं जानता था कि मैं परम्परागत कृषि नहीं कर सकता था क्योंकि यह आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं था। मैंने नियंत्रित खेती के बारे में पढ़ा था, जिसे पॉलीहाउस फार्मिंग के नाम से भी जाना जाता है। एग्रीकल्चर की डिग्री होने के बावजूद मैंने तब तक असल में पद्धतियों का इस्तेमाल नहीं किया था।”

इस पड़ाव पर बातचीत में उन्होंने कॉलेजों में बीएससी कृषि पाठ्यक्रम कैसे पढ़ाया जाता है, इसकी विडंबना का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा, “बैच की टॉपर मेरी सहपाठी ने मुझसे एक बार कहा था कि उन्होंने कभी भी खेतों में अपना पैर नहीं लगाया या यहां तक ​​कि अपने हाथों को गंदा भी नहीं किया। तो, यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है।”

लेक़िन ये सब चीजें उस नौजवान को इस चुनौती को स्वीकार करने से नहीं रोक पायीं। वो कहते हैं, “नई पीढ़ी के किसान तभी सफ़ल हो सकते हैं जब तक पढ़े हुए सिद्धांत का इस्तेमाल व्यवहारिक रूप से न हो।” और उन्होंने वही किया जो करना चाहिए था।

क्या है पॉलीहाउस फार्मिंग? पारंपरिक खेती के मुकाबले क्यों है सुरक्षित और लाभदायक? 

पॉलीहाउस फार्मिंग एक तरह का नियंत्रित और सुरक्षित कृषि पद्धति है जिसमें एक ढांचे के भीतर कई प्रकार के फूल और सब्जियां उगाई जाती हैं। पारंपरिक कृषि और पॉलीहाउस फार्मिंग में फ़र्क यह है कि पारंपरिक कृषि में खुले आसमान में खड़े फ़सल विपरीत परिस्थितियों जैसे कि भारी बारिश, तपती धूप या हाड़ कंपाती ठंड का सामना नहीं कर पाते जबकि पॉलीहाउस फार्मिंग इन बातों का ख़तरा नहीं होता।

पॉलीहाउस के भीतर उगने वाली फ़सलें इन परिस्थितियों से बची रहती हैं क्योंकि फसल की वृद्धि को सुविधाजनक बनाने के लिए वातावरण को मोटर जनित स्क्रीन और वेंटिलेटर के साथ कृत्रिम रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा, संरचना पर पड़ी हुई पॉली फिल्म बारिश की बूंद को संरचना के अंदर प्रवेश नहीं करने देती।

हालांकि, पॉलीहाउस सेट अप की प्रारंभिक लागत अधिक है। यह फसल के जीवन चक्र को बढ़ाती है, बेहतर उपज पैदा करती है और यह जल-कुशल है। इस स्ट्रक्चर के भीतर ज्यादातर ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जाता है। खीरे, टमाटर, स्ट्रॉबेरी, लौकी, गोभी और शिमला मिर्च जैसी सब्जियों से लेकर गुलदाउदी, गुलाब और कार्नेशन जैसे उच्च-गुणवत्ता वाले सजावटी फूलों तक को भी पॉलीहाउस में उपजाया जा सकता है।

पुणे में बागवानी प्रशिक्षण केंद्र में एक सप्ताह की कार्यशाला में भाग लिया, राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के तहत बैंक से 30 लाख रुपये के ऋण के लिए आवेदन किया

TBI से बातचीत में विजयराव ने कहा, “मैंने पुणे में बागवानी प्रशिक्षण केंद्र में एक सप्ताह की कार्यशाला में भाग लिया। उसके बाद, मैंने राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के तहत बैंक से 30 लाख रुपये के ऋण के लिए आवेदन किया। मेरे ऋण को मंजूरी मिलने के बाद, मैंने शेल्गांव में 1 एकड़ भूमि में एक पॉलीहाउस स्थापित किया।” यह फरवरी 2018 में हुआ। उन्होंने कच्चे माल के लिए दस लाख रुपये खर्च किए जिनमें मिट्टी, ड्रिप सिंचाई, रस्सियां ​​और अन्य सुविधाएं शामिल थीं।

उनके बाजार अनुसंधान से पता चला था कि रंगीन शिमला मिर्च ने अच्छे रिटर्न अर्जित किए हैं। इसलिए उन्होंने अनोखे सब्जी की पीले और लाल किस्मों को विकसित करने का फैसला किया। पहली फसल अप्रैल के मध्य में हुई, जहां उसे 35-40 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से खरीदा गया। शुरुआत में तो रिटर्न बहुत लाभदायक नहीं लग रहा था, मग़र आज विजयराव इन रंगीन शिमला मिर्च से 170 रुपये प्रति किलो कमाते हैं।

पुणे के अलावा, वह दिल्ली और मुंबई में भी इन शिमला मिर्चों का निर्यात करते हैं। पिछले 10 महीनों में इस युवा किसान ने 13 लाख रुपया कमाया है। इसके अलावा, पॉलीहाउस में उनके प्रभावशाली काम का निरीक्षण कृषि विभाग के सरकारी अधिकारियों ने भी किया। जिससे उन्हें 18 लाख रुपये की सब्सिडी मिली।

पॉलीहाउस स्थापित करना शुरुआत में एक महंगा निवेश की तरह लग सकता है

विजयराव कहते हैं, “एक पॉलीहाउस स्थापित करना शुरुआत में एक महंगा निवेश की तरह लग सकता है। लेकिन समय के साथ, यह न केवल आपको अपने प्रारंभिक निवेश को पुनर्प्राप्त करने में मदद करता है बल्कि अच्छे मुनाफे भी कमाता है।”

जब पूछा गया कि वह कीटों को कैसे दूर रखते हैं तब विजयराव ने जवाब दिया, “मैं बायो-कीटनाशकों और रासायनिक कीटनाशकों के बीच 50-50 का अनुपात बनाए रखता हूं। रासायनिक कीटनाशक या उर्वरक फसलों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और महत्वपूर्ण बैक्टीरिया को मार सकते हैं जो मिट्टी की उर्वरता में सुधार करता है। लेकिन कई कीट और फसल रोग हैं जिन्हें अकेले कार्बनिक कीटनाशकों से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। इसलिए, मैं संतुलन बनाए रखता हूँ।”

विजयराव का पॉलीहाउस पूरे जिले से कई किसानों को आकर्षित करता है। वे मॉडल को दोहराने के बारे में मार्गदर्शन और जानकारी लेने के लिए उनके पास आते हैं। विजयराव भी अपने पिता की तरह ही उन सभी की मदद करने के लिए स्वतंत्र रूप से सहमत होते हैं जो उनके पास आते हैं।

यदि आपके पास पॉलीहाउस खेती के बारे में कोई सवाल है, तो आप pawarso12@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।
Credit: TBI
Writer: Shravan Pnadey

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