Section 124 A: क्या है राजद्रोह क़ानून जिसे कांग्रेस ने हटाने का वादा किया है?

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए कांग्रेस ने अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया है। इस घोषणा पत्र में कई वादे किए गए हैं। इन्हीं वादों में से एक है- औपनिवेशिक काल के राजद्रोह कानून को हटाना। जब महात्मा गांधी पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया था तब उन्होंने सोचा नहीं होगा कि आजादी के 70 साल बाद भी भारतीय उसी कानून के तहत जी रहे होंगे।

देश पर क़रीब 50 वर्षों तक राज करने वाली कांग्रेस ने इस क़ानून की सुध ली है। कांग्रेस ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनी तो विवादित राजद्रोह कानून को हटा दिया जाएगा। कांग्रेस ने 2 अप्रैल 2019 को अपना घोषणा पत्र जारी किया है। इसमें लिखा गया है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो पार्टी भारतीय दंड संहिता के Section 124 A को हटा देगी जो राजद्रोह को परिभाषित करता है।

कांग्रेस ने कई कानूनों, विनियमों और नियमों को हटाने और संशोधन करने का वादा किया है जो या तो नागरिकों की स्वतंत्रता को प्रभावित कर रहे हैं या फ़िर निरर्थक हैं। इसमें औपनिवेशिक काल का राजद्रोह क़ानून भी शामिल है।

क्या है राजद्रोह का क़ानून Section 124 A

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124 A भारत के सबसे कठोर कानूनों में से एक है। इसे औपनिवेशिक काल के दौरान ब्रिटेन द्वारा प्रस्तुत किया गया था। यह आजादी के बाद भी हमारे देश में लागू रहा है। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और अरबिंदो घोष को दंडित करने के लिए जिस कानून का इस्तेमाल किया गया था, वह आज नियमित रूप से कार्यकर्ताओं, लेखकों, कार्टूनिस्टों और नागरिक समाज के अन्य सदस्यों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है।

Section 124 A कहता है: “जो कोई भी, शब्दों के द्वारा, या तो बोला या लिखा हुआ, या संकेतों द्वारा, या दृश्य प्रतिनिधित्व द्वारा, या अन्यथा, घृणा या अवमानना ​​में लाने के लिए प्रयास करता है, या उत्तेजित करता है या क़ानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति असंतोष को उत्तेजित करने का प्रयास करता है, उसे [आजीवन कारावास] के साथ दंडित किया जा सकता है, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकता है, या कारावास के साथ जो तीन साल तक बढ़ सकता है, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकता है, या जुर्माना हो सकता है।”

यह सेक्शन खुले तौर पर “सरकार के प्रति असहमति को उत्तेजित करने के प्रयास” को अपराध बताता है। देश या राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ नहीं, बल्कि निर्वाचित सरकार के खिलाफ। यह एक गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण और खतरनाक रूप से ढीला कानून है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1958 में Section 124 A को असंवैधानिक पाया जबकि सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने बार-बार इस सेक्शन के दायरे और राजद्रोह की परिभाषा को भी बाधित किया है। कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को राजद्रोह कानून के दुरुपयोग के लिए फटकार लगाई है। बड़ी बात तो ये है कि जिन अंग्रेजों ने हमें Section 124 A दिया है, उन्हीं ने अन्य कानूनों को बरकरार रखा है मग़र इस कानून को हटा दिया है।

Section 124 A का संक्षिप्त इतिहास

1837 में थॉमस मैकॉले द्वारा ड्राफ्ट भारतीय दंड संहिता में Section 124 A लागू किया गया था। हालांकि 1860 में आईपीसी लागू किए जाने के दौरान राजद्रोह को अपराध के रूप में शामिल नहीं किया गया था। भारतीय उपमहाद्वीप में वहाबी चरमपंथ पर बढ़ते डर ने Section 124 A को 1870 में आईपीसी में शामिल करने में सक्षम बनाया।

Section 124 A के तहत पहला रिकॉर्ड किया गया स्टेट ट्रायल 1892 में हुआ था। हालांकि, 1898 का ​​मामला अधिक महत्वपूर्ण है। यह मामला Queen Empress v. Bal Gangadhar Tilak था। यह ऐसा मामला था जिसने पहली बार राजद्रोह को परिभाषित किया और धारा 124 के दायरे का खतरनाक रूप से विस्तार किया।

पूरे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान Section 124 A का इस्तेमाल फ़्री प्रेस और स्वतंत्रता सेनानियों को क़ैद कर उनपर अंकुश लगाने के लिए किया गया था। इनमें से सबसे उल्लेखनीय महात्मा गांधी थे, जिन्होंने इस धारा को “भारतीय दंड संहिता के राजनीतिक वर्गों के बीच राजकुमार” कहा था जो नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनाया गया था।

जवाहरलाल नेहरू ने इसे “आपत्तिजनक और घृणित” कहा था। हालांकि तथ्य यह भी है कि उन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए इसे संशोधित या हटाया नहीं था, जिसे आपत्तिजनक और घृणित कहा जाता है। कोई भी यह तर्क दे सकता है कि औपनिवेशिक शासकों के हाथों देशद्रोह की बात समझ में आती है क्योंकि उन्हें भारत में फ़्री स्पीच को बढ़ावा देकर कुछ हासिल नहीं हो सकता था।

~Shravan Pandey

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