Section 377 पर ऐतिहासिक फैसला देने वाले CJI दीपक मिश्रा के अन्य प्रमुख फैसले उनकी एक साफ़-सुथरी छवि को प्रदर्शित करते हैं। भारतीय दंड संहिता(IPC) की Section 377 को रद्द करने वाली संवैधानिक खंडपीठ की अध्यक्षता करने वाले भारत के मुख्य न्यायाधीश(CJI) दीपक मिश्रा ने इतिहास लिख डाली है।
LGBT समुदाय की गरिमा के लिए लड़ी जा रही लड़ाई गुरुवार को सकारात्मक मुकाम पर पहुंच गई। अब सहमत वयस्कों के बीच समलैंगिक यौन संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं रहा। दिलचस्प बात यह है कि CJI दीपक मिश्रा कई महत्वपूर्ण फैसलों के पीछे एक प्रेरक शक्ति रहे हैं। उन्होंने न्यायपालिका और ‘बेहतर दिनों’ में हमारा विश्वास बहाल किया है।
◆ कॅरियर:
CJI दीपक मिश्रा के उड़ीसा उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक का सफ़र।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को जनवरी 1996 में उड़ीसा उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त किया गया था। एक साल बाद उनका स्थानांतरण मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में कर दिया गया। उसी साल वह एक स्थायी न्यायाधीश बन गए। साल 2011 में उनकी पदोन्नति करके उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बना दिया गया। अगस्त 2017 में वह भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त किए गए। इसी साल 2 अक्टूबर को उनका कार्यकाल पूरा हो रहा है।
◆ Section 377:
Section 377 पर CJI दीपक मिश्रा के शब्द ताज़ा और बहुत जरूरी हैं।
ऐतिहासिक निर्णय देते हुए CJI मिश्रा ने समाज में विविधता को आवश्यक बताया है। मिश्रा ने कहा कि, “हमारे समाज के कुछ वर्ग बहिष्कार के बंधनों में रह रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि, “जीवन की स्वतंत्रता जीवन का चेहरा है। पहचान का रखरखाव एक संवाहक है। कोई भी खुद को परिभाषित करता है। इससे कोई भी नहीं बच सकता कि वह कौन है।” दीपक मिश्रा के शब्द “मैं वही हूँ जो मैं हूँ” लाखों लोगों के साथ घिरा हुआ है।
◆ कर्नाटक असेंबली:
यह दीपक मिश्रा ही थे जिन्होंने कर्नाटक चुनाव के बाद लोकतंत्र को बचाया था।
इस साल जून महीने में आधी रात को सुनवाई करते हुए दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कर्नाटक गवर्नर वजुभाई वाला के फैसले को रद्द कर दिया था। गौरतलब है कि वजुभाई वाला ने बीएस येदियुरप्पा को बहुमत सिद्ध करने के लिए 15 दिनों का समय दिया था। येदियुरप्पा फ्लोर टेस्ट जीतने में असफल हो गए। अन्ततः जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस ने गठबंधन करके सरकार बनाई। इसके बावजूद, कांग्रेस उनके कार्यकाल की आलोचना करते हुए उनके खिलाफ़ महाभियोग ला रही थी।
हादिया केस:
हादिया के पक्ष में फैसला देते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने केरल उच्च न्यायालय की आलोचना की।
लव जिहाद के सभी सिद्धांतों को बेजुबान करते हुए मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सैफीन जहां के साथ हदिया के निक़ाह के पक्ष में फैसला दिया था। गौरतलब है कि केरल उच्च न्यायालय ने निक़ाह को बनावटी बताया था। लेक़िन सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने देखा कि निचली अदालत ने विवाह और धर्म परिवर्तन जैसे मुद्दों में ख़ुद को सम्मिलित करते हुए अपनी सीमा को लांघ दिया था। उच्च न्यायालय के आदेश की आलोचना करते हुए CJI दीपक मिश्रा ने कहा कि यह ‘परम आवश्यक’ था।
◆ याकूब मेमन:
मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मेमन की फांसी सुनिश्चित की।
साल 2015 में आतंकवादी याकूब मेमन की दया याचिका को ख़ारिज करने वाली सर्वोच्च न्यायालय के खंडपीठ की अगुवाई दीपक मिश्रा ने ही की थी। याकूब को 1993 के मुंबई ब्लास्ट में शामिल होने के कारण दोषी करार दिया गया था। बता दें कि ऐसा पहली बार ही था जब आधी रात को कोर्ट में सुनवाई हुई। उसके बाद, CJI मिश्रा को एक धमकी भरा पत्र भी मिला था। उस पत्र में उनकी ‘हत्या’ की बात कही गई थी। कुछ भी हो मग़र उन्होंने न्याय दिया!
◆ निर्भया केस:
मिश्रा ने माना कि निर्भया के बलात्कारियों को फाँसी होनी चाहिए।
निर्भया के साथ हुए क्रूरतम सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश को एकजुट किया। CJI दीपक मिश्रा ने भी इस मामले की महत्ता को समझा। उन्होंने उस खंडपीठ की अध्यक्षता की जिसने दोषियों की याचिका को ख़ारिज कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि, “अगर कभी किसी केस के लिए फाँसी की जरूरत थी, तो वह यह था।”
दिलचस्प बात यह है कि CJI मिश्रा यह समझते हैं कि कला को छुआ नहीं जाना चाहिए। ये वही दीपक मिश्रा हैं जिन्होंने ‘पद्मावत’ पर प्रतिबंध लगाने वाली याचिका को ख़ारिज कर दी थी। गौरतलब है कि, संजय लीला भंसाली के इस फ़िल्म की सामग्री ने कई लोगों में अप्रसन्नता पैदा की थी। हाल ही में उन्होंने उस याचिकाकर्ता को फटकार लगाई है जिसने दावा किया था कि एक फ़िल्म में प्रिया वारियर का आँख मारना अपमानजनक था। न्यायमूर्ति मिश्रा निश्चित रूप से न्याय प्रदान करते हैं।

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