Strugle Story: रात भर में नहीं बदलती कहानी, समर्पण, कड़ी मेहनत और दृढ़ता की होती है जरूरत

जिंदगी में हर कोई सफल होना चाहता है। अपने सपने को पूरा करना चाहता है। लेकिन बहुत कम लोग ही होते हैं, जो बुरे हालात से गुजरते हुए अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते हैं और एक दिन कामयाबी की कहानी लिख जाते हैं।

इंशा बशीर (Inshah Bashir) नाम की एक लड़की की दिनचर्या सुबह के 6 बजे शुरू हो जाती है। वह एक ब्लू बैग लेती है और उसके साथ ही एक बैग अलग से भी लेती है, जिसमें वह इस दुनिया में अपना सबसे पसंदीदा चीज रखती है। इस चीज का नाम है ‘बास्केटबॉल’।

वह एक स्कूल में जाती है, जहां वह प्राइमरी क्लास में बच्चों को पढ़ाती है। जैसे ही आख़िरी घंटी बजती है और स्कूल की छुट्टी होती है वह पास के ही एक कोर्ट में जाती है। उस कोर्ट में वह यूनाइटेड स्टेट्स में अपने आगामी स्पोर्ट्स विजिटर प्रोग्राम के लिए प्रैक्टिस करती है।

वह विदेश जाने को लेकर थोड़ा नर्वस तो दिखती है मग़र उसी पल वह वहां जाने को लेकर एक्साइटेड भी होती है। इंशा बशीर कहती है, “मेरे लिए अपनी कहानी साझा करना बहुत बड़ा अवसर है लेकिन हवाई जहाज से यात्रा करने में मुझे डर सा लगता है।”

स्टील की तरह ठोस और दृढ़ इच्छा शक्ति के माध्यम से ही उसके जीवन में बदलाव आया

प्रैक्टिस के बाद वह लौटकर हॉस्टल में जाती है। वहां वह उन युवा लड़कियों को परामर्श देती है जो अपने संघर्ष को दूर करने और उसकी तरह खेलने की इच्छा रखती हैं। उसका दिन उन सभी चीजों की याद दिलाने के साथ समाप्त होता है, जिनके लिए उसे आभारी होना चाहिए। उसे सुदृढीकरण करना चाहिए ताकि वह आज से बेहतर कल बना सके।

एक समय वह भी था जब वह खुद से बेसिक कामकाज नहीं कर पाती थी। स्टील की तरह ठोस और दृढ़ इच्छा शक्ति के माध्यम से ही उसके जीवन में बदलाव आया। इंशा बशीर (Inshah Bashir) जम्मू और कश्मीर की पहली फीमेल व्हीलचेयर बास्केटबॉल प्लेयर है। उसने नेशनल लेवल पर खेला है और अब वह अपनी कहानी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने के लिए तैयार है।

बशीर के जिंदगी में मोड़ तो उस वक़्त आया था जब वह 15 साल की थी। जम्मू और कश्मीर के बडगाम जिले में अपने अंडर कंस्ट्रक्शन हॉउस के थर्ड फ्लोर से नीचे गिर गई। जिसके बाद उसे व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ गया।

उसके मेरुदंड (Spinal Cord) में गंभीर चोट आई। सुविधाओं और मेडिकल गाइडेंस की कमी के कारण उसके ये चोट हमेशा के लिए उसके पास रह गए। भले ही डॉक्टरों ने कहा था कि 6 महीने में वह ठीक हो जाएगी मग़र उसे अब व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ता है।

उसके कई प्रोफेशनल और पर्सनल सपने थे जो पल भर में टूट कर बिखर गए

एक महज़ 15 साल की लड़की को यह कह पाना कि वह अब जिंदगी में कभी नहीं चल पाएगी, बड़ा ही मुश्किल होता है। जब बशीर के परिवार ने उसे इस बारे में बताया तब वह पूरी तरह से टूट गई। उसके कई प्रोफेशनल और पर्सनल सपने थे जो पल भर में टूट कर बिखर गए।

शारिरिक कष्ट के बावजूद उसने MBBS एंट्रेंस टेस्ट के लिए तैयारी जारी रखी। वह उसके योग्य भी थी, लेक़िन एक पथरीले पठार पर परीक्षा केंद्र में आने-जाने की यात्रा करना एक प्रतिबद्धता थी, जिसके लिए वह तैयार नहीं थी। फिर भी, उसके परिवार ने उसे मानविकी (Humanities) में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रोत्साहित किया। उसने अपनी बीए और बी.एड. की पढ़ाई पूरी कर ली।

योग्यताओं के बावजूद, एक अच्छी नौकरी ढूंढना बशीर के लिए एक असंभव काम था। इस बीच, उसके रिश्तेदारों के लगातार ताने-बाने ने उसके भावनात्मक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया। वह न केवल शारीरिक रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी अपने परिवार पर निर्भर थी। उसके एक रिश्तेदार ने तो उससे यह भी कह दिया था कि उसे दुर्घटना में मर जाना चाहिए था। हर दरवाजा उसके लिए बंद था। वह डिप्रेशन के जाल में बुरी तरह फंस गई थी।

माना कि वह रोज हजारों बार मरती थी लेक़िन उसके अंदर ऐसा कुछ था जिसने उसे जीवित रखा और हालात से लड़ने की हिम्मत दी। उसके पिता उसके लिए एक मजबूत स्तंभ थे। मग़र जब उन्हें पार्किंसंस रोग का पता चला, तो यह उसके लिए ताबूत में आख़िरी कील साबित हुई।

उसके पिता के बिगड़ते स्वास्थ्य ने उसे ख़ुद की जिम्मेदारी संभालने के लिए मजबूर कर दिया।

इसलिए, बशीर ने अपने कंडीशन को रिसर्च करना शुरू कर दिया कि वह अपने लिए क्या कर सकती है? वह श्रीनगर में Shafqat Rehabilitation Center पर गई। Shafqat Rehabilitation Center ने उसे 6 महीने की फिजियोथेरेपी दी। हालाँकि, इंशा के माता-पिता उसके रहने के बारे में आशंकित थे। उन्होंने उसे इस शर्त के तहत कार्यक्रम में नामांकित किया कि उसके भाई-बहन उसका साथ देंगे।

सभी की उम्मीदों के खिलाफ इंशा ने अपनी बहन को दूसरे दिन ही घर लौटने के लिए कह दिया। इंशा याद करती है, “मैं अपने दम पर तैयार नहीं थी, लेकिन मुझे उठने के लिए कई तरह के पतन की ज़रूरत थी। शुरुआती दिन शारीरिक रूप से थकान भरे थे, लेकिन उन्होंने मुझे अपने ट्रॉमा से बाहर निकलने में मदद की।”

फिजियोथेरेपी क्लासेस के दौरान बशीर की मुलाक़ात मेन्स व्हीलचेयर बाउंड बास्केटबॉल टीम से हुई। उसने वहां देखा कि वह टीम उससे भी दयनीय स्थिति में थी। बचपन से ही स्पोर्ट्स के प्रति उसकी दीवानगी की ही देन थी कि उसने उन लोगों से रिक्वेस्ट किया कि उसे टीम में शामिल कर लिया जाए। अगले 6 महीने तक बशीर ने कड़ी ट्रेनिंग की और सभी मुश्किलों से पार पा ली।

बास्केटबॉल को नेट में डालने के बाद उसे सुकून मिला और नेगेटिव थॉट्स हवा हो गए

इंशा बशीर को पहली बार सुकून मिला जब उसने बास्केटबॉल को नेट में डाला। ऐसा करते ही उसके सभी नेगेटिव थॉट्स हवा हो गए। जब भी वह गेंद को ड्रिबल करती है तो उसे लगता है कि वह जीवित है।

चूंकि जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की टीम नहीं थी, इसलिए इंशा ने हैदराबाद की यात्रा की और राष्ट्रीय चैम्पियनशिप के लिए क्वालीफाई किया। यह उसकी सबसे पोषित यादों में से एक है जिसे वह साझा करती है। इंशा द बेटर इंडिया से बातचीत में कहती है, “हर खिलाड़ी को दिए गए दस अवसरों में से कम से कम तीन को शूट करना था। मैं सात अंक बनाने में कामयाब रही, और यह मेरे जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था।”

मैच के बाद वह दिल्ली शिफ्ट हो गई। इस बार भी उसके पैरेंट्स उसे उसके भरोसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। इसको लेकर घर में ढेर सारा इमोशनल ड्रामा हुआ लेक़िन इंशा के डिटरमिनेशन ने उसे दिल्ली पहुंचा ही दिया। हाल ही में इंशा बशीर ने दिल्ली में एक साल पूरा कर लिया और वह हर रोज़ अमर ज्योति स्कूल जाती है।

इंशा बशीर कहती है, “जम्मू-कश्मीर की डिफरेंटली-एबल्ड लड़कियां अपनी पहचान बनाना चाहती हैं, और मैं उनकी मदद करना चाहती हूं। मैं विकलांगों के लिए अवसरों के बारे में जागरूकता फैलाना चाहती हूं।” इंशा का जीवन आत्म-संदेह, आत्मघाती विचारों, अवसाद और शारीरिक चुनौतियों से युक्त रोलरकोस्टर की सवारी से कम नहीं रहा है।

लेक़िन हर बार जब भी एक दरवाजा बंद हुआ तो उसने दूसरे दरवाजे के रुख किया। उसकी हिम्मत और इच्छाशक्ति अब उसकी जगह ले रही है! इंशा कहती है, “रात भर में कहानी नहीं बदलती है। इसके लिए समर्पण, कड़ी मेहनत और दृढ़ता की आवश्यकता होती है। मैं कई बार नाकाम रही और खुद रोकर सो गई। लेकिन यह वही जीवन एक बहुत ही प्रभावी शिक्षक रहा है।”

~Shravan Pandey

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